ज्यादातर आपराधिक मामलों में ऐसा देखने को मिलता है जब आरोपी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का रुख करता है, तो कोर्ट पुलिस की छानबीन पर रोक लगाने का आदेश जारी कर देती हैं. लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाईकोर्ट्स को ऐसे आदेश नहीं देने चाहिए, क्योंकि ऐसा करना पुलिस के छानबीन के अधिकार के कानून के खिलाफ है. जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच ने ऐसे मामलों से कैसे निपटा जाए, इसे लेकर गाइडलाइंस जारी की हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कुछ मामलों को छोड़ दिया जाए, तो हाईकोर्ट्स को ऐसे आदेश नहीं देने चाहिए जिससे पुलिस छानबीन में कोई दखल पैदा हो. धोखाधड़ी के एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट को आरोपी के खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठाए जाने का आदेश नहीं देना चाहिए था. कोर्ट ने ये भी माना कि पुलिस को अपनी जांच पूरी करने की इजाजत होनी चाहिए.
बेंच ने कहा कि "एफआईआर कोई इनसाइक्लोपीडिया नहीं है, जो उसमें अपराध से जुड़े सारे फैक्ट्स और डिटेलिंग होनी चाहिए. इसलिए जब पुलिस की छानबीन जारी है, तो ऐसे में कोर्ट को एफआईआर में दर्ज आरोपों की सच्चाई पर नहीं जाना चाहिए. पुलिस को जांच करने की इजाजत होनी चाहिए."
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "सीआरपीसी के चैप्टर 18 में लिखा है कि किसी भी संज्ञेय अपराध में पुलिस को छानबीन करने का न सिर्फ अधिकार है, बल्कि कर्तव्य भी है. इसलिए कोर्ट को पुलिस को छानबीन करने से नहीं रोकना चाहिए." बेंच ने आगे कहा कि कोर्ट को पुलिस की एफआईआर पर सवाल उठाने से भी बचना चाहिए और एफआईआर रद्द करने से पहले संयम बरतना चाहिए. हालांकि कोर्ट ने ये भी कहा कि अगर किसी एफआईआर में संज्ञेय अपराध नहीं है या फिर आरोपी के अपराध के बारे में कोई जानकारी नहीं है, तो ऐसे मामलों में कोर्ट पुलिस को जांच करने से रोक सकती है.
कोर्ट ने आगे कहा, "आमतौर पर जब किसी मामले की जांच चल रही होती है, तो ऐसे में तथ्य धुंधले होते हैं. और अदालत के सामने भी केस से जुड़े पूरे सबूत या सामग्री नहीं होती. ऐसे में हाईकोर्ट्स को अंतरिम आदेश पारित कर आरोपी को गिरफ्तार न करने या उसके खिलाफ ठोस कदम न उठाने का निर्देश देने से बचना चाहिए." कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अदालतों को कोई आदेश पारित करने की बजाय आरोपी को अग्रिम जमानत की अर्जी दाखिल करने का सुझाव देना चाहिए.
हालांकि, कोर्ट ने ये भी साफ किया कि ऐसे मामले जिनमें न्याय की हत्या हो रही हो, तो ऐसे मामलों में कोर्ट को आदेश पारित करना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि "जब भी हाईकोर्ट कोई अंतरिम आदेश पारित कर ये निर्देश दे कि आरोपी के खिलाफ ये कदम नहीं उठा सकते, तो ऐसे में अदालतों को ये साफ करना जरूरी होगा कि पुलिस कौन से कदम नहीं उठा सकती. ताकि किसी भी तरह की गलतफहमी से बचा जा सके."