bihar voter list names removed supreme court Supreme Court Hearing SIR: बिहार में SIR को लेकर आज 'सुप्रीम' फैसला आ गया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SIR की प्रक्रिया में कोई खामी नहीं है और यह प्रक्रिया पूरी तरह संवैधानिक है. इस फैसले के साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया है कि चुनाव आयोग की जो शक्तियां हैं वह बरकरार हैं.
असल में याचिकाओं में पहले दावा किया गया था कि संविधान के अनुच्छेद 326, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और उसके तहत बनाए गए नियमों के तहत चुनाव आयोग को इतने बड़े स्तर पर SIR कराने का अधिकार नहीं है.
इन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने 29 जनवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था. 27 मई 2026 बुधवार को फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SIR की प्रक्रिया पूरी तरह वैध और कानूनी है.
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SIR प्रक्रिया वैध है और इस पर कोई रोक नहीं लगाई जा सकती. अदालत ने माना कि चुनाव आयोग ने यह प्रक्रिया अपने संवैधानिक अधिकारों के तहत की है. कोर्ट ने कहा कि वोटर लिस्ट से नाम हटाने में नियमों का पालन किया गया और लोगों को नोटिस देने व अपनी बात रखने का मौका भी मिला. अदालत ने यह भी कहा कि कौन-कौन से दस्तावेज मान्य होंगे, यह तय करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास है. आधार कार्ड को भी कोर्ट के आदेश के बाद दस्तावेजों की सूची में शामिल किया गया और यह व्यवस्था मनमानी नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि SIR के दौरान चुनाव आयोग ने किसी की नागरिकता तय नहीं की, बल्कि सिर्फ यह देखा कि कोई व्यक्ति वोटर लिस्ट में शामिल होने के योग्य है या नहीं. अदालत ने कहा कि SIR प्रक्रिया से किसी को नागरिकता मिलती या छिनती नहीं है. कोर्ट ने निर्देश दिया कि जिन लोगों के नाम गैर-नागरिक होने के शक में हटाए गए हैं, उनके मामलों को चार हफ्ते के भीतर गृह मंत्रालय और विदेशी न्यायाधिकरण जैसी संबंधित एजेंसियों को भेजा जाए, ताकि नागरिकता पर अंतिम फैसला वही करें.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नागरिकता से जुड़ी जांच केवल मतदाता सूची में किसी व्यक्ति का नाम शामिल करने या हटाने के सीमित संदर्भ में ही की जा सकती है. अदालत ने साफ किया कि चुनाव आयोग ने भी इसी सीमित सवाल पर विचार किया है और ऐसी किसी भी जांच को कानून की निर्धारित सीमाओं के भीतर ही किया जाना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि यह आकलन केवल परिस्थितियों और उपलब्ध तथ्यों के संदर्भ में होगा. सुप्रीम कोर्ट ने माना कि चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची में नाम शामिल करने से इनकार करने का अधिकार है, लेकिन इस तरह की कार्रवाई को नागरिकता तय करने की प्रक्रिया नहीं माना जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने SIR को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि SIR की प्रक्रिया में पूरे नियमों का पालन हुआ है. SIR चुनाव आयोग का अधिकार है. चुनाव आयोग SIR करा सकता है. उसकी शक्तियां बरकरार हैं. SIR की प्रक्रिया में कोई खामी नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विवाद बिहार में SIR को लेकर जारी अधिसूचना से पैदा हुआ. याचिकाओं में चुनाव आयोग द्वारा कराए जा रहे SIR की वैधता को चुनौती दी गई है. अदालत को यह तय करना है कि क्या संविधान के अनुच्छेद 326, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और उससे जुड़े नियमों के तहत चुनाव आयोग को वर्तमान स्वरूप में SIR कराने का अधिकार है. इस मामले में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), PUCL समेत कई संगठनों के अलावा विपक्षी नेताओं Manoj Jha, Mahua Moitra, K. C. Venugopal, Pappu Yadav और आरजेडी सांसद Sudhakar Singh भी याचिकाकर्ताओं में शामिल हैं.
सुप्रीम कोर्ट बिहार मे SIR के खिलाफ दाखिल उन याचिकाओं पर फैसला सुनाना शुरू कर दिया है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच फैसला सुना रही है. याचिकाओं में चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट की SIR की वैधता को चुनौती दी गई है. कोर्ट को यह तय करना है कि क्या चुनाव आयोग को संविधान के आर्टिकल 326, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और उससे जुड़े नियमों के तहत वर्तमान स्वरूप में SIR कराने का अधिकार है. और क्या चुनाव आयोग को SIR कराने का अधिकार है. याचिकाकर्ताओं में एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, PUCL जैसे संगठनों के अलावा विपक्षी पार्टियों के नेता मनोज झा, महुआ मोइत्रा,के सी वेणुगोपाल,पप्पू यादव,आरजेडी MP सुधाकर सिंह शामिल हैं.
बिहार में SIR वैध या अवैध? इसे लेकर थोड़ी ही देर में फैसला आने वाला है. सुप्रीम कोर्ट में बेंच बैठ चुकी है. अभी फिलहाल अदालत में मेंशनिंग से जुड़े मामलों की सुनवाई की जा रही है. इसके बाद बिहार SIR मामले पर फैसला सुनाया जाएगा. याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि यह प्रक्रिया “NRC जैसी” है, जिसमें चुनाव आयोग नागरिकता की जांच कर रहा है, जबकि यह अधिकार केंद्र सरकार के पास है.एडीआर की ओर से पेश वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने SIR प्रक्रिया पूरी करने की समयसीमा पर सवाल उठाए थे. उन्होंने यह भी पूछा था कि 65 लाख मतदाताओं को मृत, पलायन कर चुके या दूसरे निर्वाचन क्षेत्रों में पंजीकृत कैसे घोषित किया गया.
बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम फैसले को अपनी बड़ी जीत करार दिया था. उन्होंने कहा था कि बिहार बंद हो, सड़क पर आंदोलन हो, सदन में बहस हो या सुप्रीम कोर्ट हो, हमने हर जगह लड़ाई लड़ी और आज उसका परिणाम लोकतंत्र की जीत के रूप में सामने आया है. तेजस्वी ने स्पष्ट किया कि वह SIR का विरोध नहीं कर रहे थे, बल्कि उसकी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे थे. उन्होंने कहा कि आज दूध का दूध और पानी का पानी हो गया है. सुप्रीम कोर्ट ने हमारी सभी मांगों पर मुहर लगाई है. आधार को जोड़ने का फैसला ऐतिहासिक है. सुप्रीम कोर्ट ने 65 लाख वोटरों के नाम बूथ स्तर पर देने और नाम हटाने का कारण बताने का निर्देश भी दिया है.
सुप्रीम कोर्ट ने पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए अगस्त 2025 में SIR पर अंतरिम आदेश दिए थे.
>मतदाता सूची से नाम हटाने का कारण स्पष्ट रूप से बताना.
>बूथ स्तर पर 65 लाख वोटरों के नाम और विवरण उपलब्ध कराना.
>आधार को मतदाता सूची से जोड़ने के फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए उचित प्रक्रिया का पालन करने पर जोर दिया.
बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट बुधवार सुबह 10:30 बजे फैसला सुनाएगा. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच यह तय करेगी कि मौजूदा स्वरूप में SIR कराने का अधिकार चुनाव आयोग के पास है या नहीं. याचिकाकर्ताओं ने चुनाव आयोग की शक्तियों और SIR प्रक्रिया की वैधता को चुनौती दी है. मामले में यह भी सवाल उठाया गया है कि क्या चुनाव आयोग नागरिकता से जुड़े पहलुओं की जांच कर सकता है, जिसे याचिकाकर्ताओं ने “NRC जैसी प्रक्रिया” बताया है.
चुनाव आयोग ने SIR के तहत प्रकाशित ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में 65 लाख लोगों के नाम हटाए जाने की जानकारी दी थी. आयोग के नोटिफिकेशन के मुताबिक, जिन मतदाताओं का नाम 2002 या 2003 की मतदाता सूची में नहीं था, उन्हें उस समय की सूची में दर्ज किसी व्यक्ति से पैतृक संबंध साबित करना था.
चुनाव आयोग ने SIR का बचाव करते हुए कहा था कि आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता.
याचिकाओं पर सुनवाई कर रही चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने 29 जनवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था. याचिकाकर्ताओं में गैर सरकारी संगठन एडीआर (Association for Democratic Reforms) भी शामिल है. बिहार में SIR प्रक्रिया पहले चरण में पूरी की गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 12 अगस्त से मामले में अंतिम सुनवाई शुरू की थी. उस दौरान अदालत ने कहा था कि मतदाता सूची में नाम जोड़ना या हटाना चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र में आता है.
बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट बुधवार को अपना फैसला सुनाने वाला है. याचिकाओं में दावा किया गया है कि संविधान के अनुच्छेद 326, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और उसके तहत बनाए गए नियमों के तहत चुनाव आयोग को इतने बड़े स्तर पर SIR कराने का अधिकार नहीं है.