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किसी ने लिया लोन तो किसी ने लगाया रिटायरमेंट का पैसा, अब यूक्रेन से बिना डिग्री वापस लौटे बच्चे

Russia Ukraine War: एयरपोर्ट पर बच्चों को लेने पहुंचे कुछ परिवारों से बातचीत कर समझ आ रहा था कि उन्होंने आखिर किस तरह संसाधन जुटाकर अपने बच्चों को विदेश पढ़ने भेजा होगा.

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Delhi एयरपोर्ट पर बच्चों को लेने पहुंचे अभिभावक.
Delhi एयरपोर्ट पर बच्चों को लेने पहुंचे अभिभावक.
स्टोरी हाइलाइट्स
  • यूक्रेन में फंसे नागरिकों के लिए सरकार चला रही 'ऑपरेशन गंगा'
  • केंद्रीय मंत्रियों को दिया है छात्रों को वापस लाने का जिम्मा

समय: रात के लगभग 10:30 बजे. स्थान: दिल्ली एयरपोर्ट का टर्मिनल नंबर-3. यहां अभी तक बैठे हुए लोग अब खड़े हो चुके हैं. लगभग सभी की निगाहें गेट की तरफ टिकी हुई हैं. पिछले 7 दिन से अपने बच्चों को जिन हालातों में परिवार देख सुन रहे थे, वो बच्चे अब यूक्रेन से सुरक्षित वतन लौट आए हैं. उनकी फ्लाइट लैंड कर चुकी है. यहां मौजूद अधिकतर लोग आपको सामान्य परिवारों के लगते हैं. ऐसे परिवार जिन्हें देखकर ही आप समझ जाएंगे कि विदेश में बच्चे को पढ़ाने के लिए फीस का इंतजाम करना उनके लिए आसान नहीं था. हमने कुछ पेरेंट्स से बात की.

भानू प्रताप सिंह अपनी पत्नी और छोटे भाई के साथ एयरपोर्ट पहुंचे हैं. भानू प्रताप अलीगढ़ में प्रॉपर्टी डीलिंग का काम करते हैं. इनकी बेटी उर्वशी राजपूत संकटग्रस्त यूक्रेन में मेडिकल दूसरे वर्ष की छात्रा है. वह अब दिल्ली लौट आई है. पिता भानू प्रताप बताते हैं कि बेटी के एक साल का 9.5 लाख रुपये का खर्चा है. इसके अलावा बेटी के रहने खाने का महीने का खर्चा 30 हज़ार है.  एक बेटा है, वह भी फार्मासिस्ट की पढ़ाई कर रहा है, उसकी भी मोटी फीस भरनी होती है. उन्होंने बताया कि बेटी होशियार है, इसलिए उसकी पढ़ाई से कोई समझौता नहीं किया. पढ़ाई के लिए काफी पैसा जोड़ रखा था फिर भी बेटी के लिए रिश्तेदारों से पैसे उधार लेने पड़े. हालांकि, अब बिटिया डॉक्टर कैसे बनेगी? इस सवाल पर भानु प्रताप शांत हो जाते हैं. वहीं उनकी पत्नी कहती हैं कि बिटिया सुरक्षित घर आ जाए यही बहुत है.

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बुजुर्ग शैलजा ग़ाज़ियाबाद की रहने वाली हैं. उनका इकलौता बेटा मानस यूक्रेन में युद्ध के बीच फंसा हुआ था. वह अपने भतीजे के साथ आज मानस को लेने एयरपोर्ट आई हैं. शैलजा बताती हैं कि वह और उनके पति दोनों सरकारी नौकरी से रिटायर हुए हैं. मानस इकलौता बेटा है, इसलिए उसकी पढ़ाई के लिए पैसों का इंतज़ाम करने में कोई खास दिक्कत नहीं हुई. हालांकि, रिटायरमेंट में मिले पैसों से ही मानस की पढ़ाई हो रही है. 

यूक्रेन में मानस एमबीबीएस के तीसरे वर्ष का स्टूडेंट है. उसकी पढ़ाई पर अब तक 25 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं. हर महीने रहने खाने और खर्च के लिए मानस को 50 हज़ार भेजे जाते हैं. रकम छोटी नहीं है, लेकिन फिर भी आज शैलजा संतुष्ट हैं कि उनका बेटा वापस सुरक्षित आ रहा है. भविष्य के सवाल पर वो कहती हैं कि सरकार से उम्मीद है, इतने सारे स्टूडेंट हैं कुछ न कुछ तो हल निकलेगा. मदद मिली तो अच्छा, नहीं तो फिर देखा जाएगा. 

 

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