
केंद्र सरकार ने भले ही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) का नाम बदलकर 'विकसित भारत-जी राम जी' (VB- G RAM G) कर दिया हो, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी भ्रष्टाचार के पुराने दलदल में धंसी हुई है. आजतक की पांच राज्यों में की गई एक्सक्लूसिव पड़ताल ने मनरेगा के उस कमजोर और खामियों से भरे सिस्टम को उजागर किया है, जहां मुर्दे मजदूरी कर रहे हैं, तालाब सिर्फ फाइलों में खोदे जा रहे हैं और बिचौलिये मजदूरों के पसीने की कमाई पर दावत उड़ा रहे हैं.
उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड से सामने आई तस्वीरें बताती हैं कि योजना का असली लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पा रहा. इस योजना को लेकर केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि MGNREGA का नाम बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के कारण बदला गया. उन्होंने मजदूरों की जगह मशीनों का इस्तेमाल, मजदूरों की जगह ठेकेदारों का इस्तेमाल, बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए अनुमान, एक ही काम को बार-बार करना और नकली जॉब कार्ड जैसी गड़बड़ियों का ज़िक्र किया और कहा कि MGNREGA के तहत करप्शन खत्म कर दिया गया है.
ऐसे में सवाल उठता है कि केंद्र ने नाम बदलकर 'जी राम जी' (G RAM G) तो कर दिया, लेकिन क्या सिर्फ नाम बदलने से लूट का यह पुराना खेल रुक पाएगा? क्योंकि आजतक की विशेष पड़ताल में सरकारी तिजोरी में सेंधमारी और गरीबों के हक पर डकैती का एक ऐसा डरावना सच सामने आया है, जिसने पूरी व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है. जिसे रोजगार की 'गारंटी' कहा गया, वह भ्रष्टाचार की 'गारंटी' बन गई है.
मंत्रालय के हालिया एक ऑडिट ने भी मनरेगा में भारी अनियमितताओं को चिन्हित किया था. रिपोर्ट के अनुसार, चालू वित्त वर्ष के मात्र 8 महीनों (अप्रैल 2025 से नवंबर 2025) में 302 करोड़ रुपये की वित्तीय गड़बड़ी पाई गई थी. इसके बाद भी पांच राज्यों में की गई पड़ताल में चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है.

उत्तर प्रदेश: महाराजगंज में कागजों में काम, मौके पर सन्नाटा
उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले में जी-राम-जी हो चुकी मनरेगा योजना में बड़ी अंधेरगर्दी का मामला सामने आया है. 'आजतक' की टीम ने सिसवा ब्लॉक के शिकारपुर गांव का रियलिटी चेक किया तो रोजगार गारंटी योजना के तहत दिखाए जा रहे कामों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए. मनरेगा कार्यस्थल पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, टिंकू श्रीवास्तव के खेत से नाले तक मिट्टी भराई और उसी नाले की सफाई के काम में 13 मस्टर रोल के तहत 100 से अधिक मजदूरों को काम करते हुए दिखाया गया था.
हैरानी की बात यह है कि जब आजतक की टीम मौके पर पहुंची, तो वहां सन्नाटा पसरा था. कार्यस्थल पर एक भी मजदूर मौजूद नहीं मिला. इतना ही नहीं, वहां ऐसे कोई निशान भी नहीं दिखे जिससे यह पता चल सके कि उस दिन वहां कोई काम किया गया है.
इस बारे में सवाल किए जाने पर ग्राम प्रधान के प्रतिनिधि रामदयाल ने दावा किया कि काम हुआ था, लेकिन त्योहार होने की वजह से मजदूर जल्दी चले गए. हालांकि यह दलील कई सवाल खड़े करती है. यदि त्योहार के चलते मजदूर काम पर नहीं थे, तो फिर उसी दिन काम दर्ज क्यों किया गया? इस दौरान पंचायत प्रतिनिधि कैमरे से बचते नजर आए और माइक्रोफोन हटाने की कोशिश करते दिखे. उन्होंने यह भी कहा कि करीब 50 मजदूरों ने काम किया था, लेकिन मस्टर रोल से जुड़ी जानकारी होने से इनकार कर दिया.
वहीं रिकॉर्ड में दर्ज एक मजदूर संतराज ने बताया कि काम तो हुआ था, लेकिन वह यह स्पष्ट नहीं कर सका कि वास्तव में कितने मजदूर वहां काम कर रहे थे.
इस गंभीर मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए मनरेगा के जिला समन्वयक गौरवेंद्र सिंह ने कहा कि कागजों पर काम दिखने और मौके पर मजदूर गायब होने की जानकारी मिली है. इस पूरे प्रकरण की गहन जांच कराई जाएगी और दोषियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी. फिलहाल, लोकायुक्त पुलिस भी इस मामले की जांच कर रही है और जल्द ही बड़ी कार्रवाई की उम्मीद है.

बिहार: भागलपुर में 20 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप
बिहार के भागलपुर जिले के जगदीशपुर प्रखंड की सैनो पंचायत में मनरेगा के तहत करीब 20 करोड़ रुपये के बड़े घोटाले का खुलासा हुआ है. आरोप है कि जमीन पर कोई काम नहीं हुआ, लेकिन कागजों में योजनाएं दिखाकर सरकारी धन की निकासी कर ली गई.
ग्रामीणों के मुताबिक, न तो सिंचाई के लिए बनाए जाने वाले नाले पर कोई काम हुआ, न ही तालाबों का जीर्णोद्धार किया गया और न ही खेतों का समतलीकरण हुआ. गांव में केवल योजनाओं के सूचनात्मक बोर्ड लगाए गए, जबकि वास्तविक काम नदारद रहा.
जांच के बाद जिला विकास आयुक्त ने पंचायत रोजगार सेवक को पद से हटा दिया है. जांच में यह भी सामने आया कि फर्जी वेंडरों के ज़रिये सरकारी धन की हेराफेरी की गई. आरोपित अधिकारी पर 13 अलग-अलग स्थानों पर ज़मीन खरीदने का आरोप है, जिनमें माता-पिता, पत्नी और नाबालिग बेटों के नाम पर संपत्तियां शामिल हैं, जिनकी अनुमानित कीमत 59 लाख रुपये से अधिक बताई जा रही है.
जांच एजेंसियों के अनुसार, ‘निशांत ट्रेडर्स’ नामक एक वेंडर से निकाली गई राशि आरोपित अधिकारी और उसकी पत्नी के संयुक्त खाते में जमा कराई गई. फिलहाल उसका अनुबंध समाप्त कर दिया गया है, हालांकि उसे 30 दिनों के भीतर अपील करने का अधिकार दिया गया है.
बिहार: मुंगेर में फसलों पर पानी, नहर सफाई पर उठे सवाल
इसी तरह बिहार के ही मुंगेर जिले के असरगंज प्रखंड की चौरगांव पंचायत में भी मनरेगा के तहत गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं. किसानों का कहना है कि नहर खुदाई के नाम पर तीन बार राशि निकाली गई, लेकिन जमीन पर कोई काम नहीं हुआ.
ग्रामीणों के मुताबिक, अचानक बांध से पानी छोड़े जाने के कारण खेत जलमग्न हो गए, जिससे गेहूं, मक्का सहित कई फसलें बर्बाद हो गईं. किसानों का आरोप है कि बीते 10 वर्षों से नहरों की सफाई नहीं हुई, जबकि मनरेगा के तहत इस मद में करोड़ों रुपये खर्च दिखाए गए.
इस मामले पर उपमंडलीय अधिकारी ने कहा है कि पूरे प्रकरण की जांच के आदेश दे दिए गए हैं. नुकसान का आकलन कर किसानों को मुआवजा दिया जाएगा और यदि अनियमितताएं पाई जाती हैं तो संबंधित अधिकारियों व कर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी.

झारखंड: साहिबगंज में बिचौलियों की कमाई का जरिया बनी योजना
झारखंड के साहिबगंज जिले के बरहरवा प्रखंड स्थित मिर्जापुर पंचायत में मनरेगा के तहत चलाई जा रही बकरी शेड निर्माण योजना में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए हैं. ग्रामीणों का कहना है कि योजना का लाभ दिलाने के नाम पर बिचौलियों ने इसे कमाई का जरिया बना लिया है.
ग्रामीणों के आरोपों के मुताबिक, लाभार्थियों से प्रति व्यक्ति 3,000 रुपये की अवैध वसूली की गई. कई मामलों में योजना किसी और के नाम से स्वीकृत कर दी गई, जबकि वास्तविक लाभार्थी को अधूरा निर्माण ही मिला. आरोप है कि शेड का निर्माण पूरा किए बिना ही पूरी राशि निकाल ली गई.
लाभार्थियों ने यह भी बताया कि भुगतान सुनिश्चित कराने के लिए दूसरे लोगों के नाम के बोर्ड लगाकर फोटो खींची गईं, जिन्हें दस्तावेज के तौर पर अपलोड कर दिया गया. इससे कागजों में काम पूरा दिखा दिया गया, जबकि ज़मीन पर हकीकत कुछ और थी.
मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए साहिबगंज के उप विकास आयुक्त (डीडीसी) ने कहा कि यह प्रकरण प्रशासन के संज्ञान में आया है और इसकी जांच शुरू कर दी गई है. जांच के बाद दोषियों के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई की जाएगी.
इस बीच, रांची में मनरेगा की जगह लागू की जा रही G RAM G योजना के बेहतर क्रियान्वयन को लेकर एक बैठक भी आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता मनोहर लाल खट्टर ने की. बैठक में बीजेपी नेताओं ने दावा किया कि नई योजना में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए फूलप्रूफ सुरक्षा प्रावधान किए गए हैं, ताकि इस तरह की गड़बड़ियों पर रोक लगाई जा सके.
छत्तीसगढ़: दो साल से बिना काम के पड़े जॉब कार्ड
छत्तीसगढ़ के मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) जिले की पसौरी पंचायत में मनरेगा की जमीनी हकीकत चिंताजनक तस्वीर पेश कर रही है. ग्रामीणों का कहना है कि उनके पास जॉब कार्ड तो हैं, लेकिन पिछले दो वर्षों से कोई काम नहीं मिला. सरकार द्वारा गारंटीड रोजगार के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 किए जाने के बावजूद दर्जनों जॉब कार्डधारकों को न तो रोजगार दिया गया और न ही बेरोजगारी भत्ता मिला.
ग्रामीणों के अनुसार, काम की मांग को लेकर पंचायत कार्यालय के कई चक्कर लगाए गए, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिला. महिलाओं और बुजुर्गों ने बताया कि रोजगार न मिलने से रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो गया है. बच्चों की पढ़ाई, इलाज और घरेलू खर्चों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है.
आजतक की पड़ताल के दौरान पंचायत और संबंधित अधिकारी कैमरे पर बोलने से बचते नजर आए. वहीं, मंत्री स्तर पर इस सवाल के जवाब में नई ‘G RAM G’ योजना लागू किए जाने का हवाला दिया गया. हालांकि, जमीनी स्तर पर अब तक इसका लाभ ग्रामीणों तक पहुंचता दिखाई नहीं दे रहा है, जिससे मनरेगा की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.

मध्य प्रदेश: झाबुआ में मुर्दों के नाम पर हो रही पेमेंट
मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में मनरेगा से जुड़ा भ्रष्टाचार वर्ष 2020 से अब तक जांच के घेरे में बना हुआ है. आरोप हैं कि मृत व्यक्तियों के नाम पर फर्जी भुगतान किए गए, वहीं कई ऐसे लोगों को मजदूरी दी गई, जिन्होंने कभी मनरेगा के तहत काम ही नहीं किया.
बार-बार शिकायतों के बावजूद जब स्थानीय स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई तो मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया. इंदौर खंडपीठ ने गंभीरता दिखाते हुए प्रकरण की जांच लोकायुक्त पुलिस को सौंपने के आदेश दिए.
एक शिकायतकर्ता ने जांच के दौरान अपने पिता का मृत्यु प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया, जिसमें दर्शाया गया कि उनके पिता की मृत्यु वर्ष 2017 में हो चुकी थी, जबकि मनरेगा रिकॉर्ड में उनके नाम पर 2020 में भुगतान दिखाया गया.
ऐसे ही आरोप जिले के चार विकासखंडों से सामने आए हैं, जिससे पूरे जिले में मनरेगा की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं. जांच के नतीजों का अब इंतजार किया जा रहा है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि इस कथित घोटाले के लिए जिम्मेदार कौन हैं और आगे क्या कार्रवाई होती है.
मनरेगा में आठ महीनों में 302 करोड़ की गड़बड़ी
गौरतलब है कि ग्रामीण विकास मंत्रालय की ऑडिट रिपोर्ट में अप्रैल 2025 से नवंबर 2025 के बीच 25 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 55 जिलों में 11.14 लाख मामलों में अनियमितताएं सामने आईं. जांच में 302.45 करोड़ रुपये की वित्तीय गड़बड़ी सामने आई, जिसमें से करीब 293 करोड़ रुपये की वसूली का दावा किया गया है. जिन प्रदेशों में ये गड़बड़ी सामने आई उनमें तमिलनाडु (10 जिले), आंध्र प्रदेश (4), केरल (6), पंजाब (5), उत्तर प्रदेश (2), हरियाणा, उत्तराखंड, गुजरात, जम्मू और कश्मीर, छत्तीसगढ़ और बिहार (हर राज्य का एक जिला) शामिल हैं. रिपोर्ट के मुताबिक कई जगह काम जमीन पर हुआ ही नहीं, लेकिन भुगतान पूरा कर दिया गया.
जांच में सामने आया कि कई राज्यों में रोक के बावजूद ठेकेदारों से काम कराया गया. बड़े कामों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया गया ताकि निचले स्तर पर मंजूरी मिल सके. कई जगहों पर 80 साल से ज़्यादा उम्र के मजदूरों को MGNREGA के तहत काम करते हुए दिखाया गया. कई मामलों में एक ही वेंडर से बार-बार सामान खरीदा गया या एक ही टेंडर के खिलाफ पेमेंट किया गया. कुछ फाइलों में रॉयल्टी पेमेंट और GST से जुड़े दस्तावेज गायब थे.
ठेकेदार-अधिकारी और बैंक मैनेजर का गठजोड़
ऑडिट रिपोर्ट में 1,000 से ज़्यादा वर्क साइट्स का इंस्पेक्शन किया गया. 11,14,627 मामलों में अनियमितताएं पाई गईं, जिनमें खर्च दिखाए जाने के बावजूद ज़मीन पर काम का न होना, गैर-अनुमति वाले कामों को करना, वित्तीय अनियमितताएं और फंड का दुरुपयोग, मंजूरी पाने के लिए कामों को जानबूझकर छोटे-छोटे हिस्सों में बांटना और साफ मनाही के बावजूद ठेकेदारों और थर्ड पार्टियों को काम देना शामिल है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि इसमें अधिकारी, ठेकेदार और यहां तक कि बैंक मैनेजर भी शामिल थे. कई मामलों में, काम सिर्फ कागजों पर था, ज़मीन पर नहीं. सबसे ज्यादा मामले आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में पाए गए. गवर्नेंस और मॉनिटरिंग में भी गंभीर कमियां पाई गईं. नकली और इनएक्टिव जॉब कार्ड, बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए मस्टर रोल, अधूरे और खराब क्वालिटी के काम और स्थानीय जरूरतों के हिसाब से न बनाए गए एसेट्स को बार-बार दिखाया गया.
मिनिस्ट्री की जांच में यह भी पता चला कि शुरुआती सालों में MGNREGA के तहत मॉनिटरिंग और रिकॉर्ड-कीपिंग बहुत कमज़ोर थी. कई जगहों पर करोड़ों के काम सिर्फ़ कागजों पर दिखाए गए थे, लेकिन जमीन पर कोई सड़क, तालाब या बांध नहीं थे. कोई फोटो नहीं थे, कोई जियो-लोकेशन नहीं था और कोई सही रिकॉर्ड नहीं था. कई मामलों में, एक ही व्यक्ति के नाम पर कई जॉब कार्ड जारी किए गए थे. मरे हुए लोगों के नाम पर भी पेमेंट किया गया था. असली मजदूरों तक पैसे पहुंचने के बजाय सिस्टम में फैले बिचौलियों ने पैसे हड़प लिए.
जनवरी 2014 तक, MGNREGA रिकॉर्ड के साथ सिर्फ 76 लाख मजदूरों के आधार नंबर लिंक थे, जबकि इस स्कीम के तहत करोड़ों लोग रजिस्टर्ड थे. पंचायत लेवल पर रिकॉर्ड मैनेजमेंट बहुत खराब पाया गया. फील्ड स्टाफ को 22 से 29 अलग-अलग रजिस्टर रखने पड़ते थे, जिससे गलतियां, हेरफेर और दुरुपयोग होना तय था. इस गड़बड़ी की वजह से फर्जी मस्टर रोल और गलत पेमेंट हुए.
2014 के बाद के उपाय: आधार, जियो-टैगिंग और डायरेक्ट पेमेंट
2014 के बाद सिस्टम को बेहतर बनाने की कोशिशें की गईं. 2016 में MGNREGA के तहत बनाए गए एसेट्स की जियो-टैगिंग को जरूरी कर दिया गया. कामों की तस्वीरें और GPS लोकेशन सिस्टम में अपलोड की जाने लगीं. मजदूरों की पहचान को मजबूत करने के लिए आधार सीडिंग पर जोर दिया गया. आज 12 करोड़ से ज़्यादा एक्टिव मज़दूरों के आधार नंबर MGNREGA से जुड़े हुए हैं. अब पेमेंट सीधे बैंक खातों में आधार पेमेंट ब्रिज सिस्टम और नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड मैनेजमेंट सिस्टम के जरिए किए जाते हैं. ई-पेमेंट का हिस्सा, जो पहले 37% था, अब 100% हो गया है.
इनपुट: गोविंद कुमार (मुंगेर), राजीव सिद्धार्थ (भागलपुर), प्रवीण कुमार (साहिबगंज), धीरेंद्र विश्वकर्मा (एमसीबी), चंद्रभान सिंह भदौरिया (झाबुआ), अमितेश त्रिपाठी (महराजगंज)