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घरेलू कामों में हाथ बंटाते हैं 10% से भी कम भारतीय पुरुष: सर्वे

ये जगजाहिर है कि भारत में घर से लेकर हर दफ्तर तक में श्रम विभाजन को लेकर लैंगिक भेदभाव मौजूद है. हालांकि, ये अब भी तय करना मुश्किल है कि इसमें असमानताएं कितनी ज्यादा हैं.

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श्रम विभाजन को लेकर लैंगिक भेदभाव मौजूद (फोटो-Getty Images)
श्रम विभाजन को लेकर लैंगिक भेदभाव मौजूद (फोटो-Getty Images)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • देश में श्रम विभाजन को लेकर लैंगिक भेदभाव कायम
  • 84% महिलाओं को उनके काम का नहीं मिलता पेमेंट
  • 10% से भी कम भारतीय पुरुष घरेलू काम करते हैं

एक सर्वे में सामने आया है कि महिलाएं ज्यादातर उन कामों में लगी रहती हैं जिनके लिए उन्हें कोई भुगतान नहीं किया जाता. महिलाओं का करीब 84 फीसदी कामकाज का समय ऐसी गतिविधियों पर खर्च होता है जिनके लिए उन्हें भुगतान नहीं किया जाता. जबकि पुरुषों के मामले में इसका उल्टा है. पुरुष अपने काम के समय का 80 फीसदी उन गतिविधियों पर खर्च करते हैं, जिनके लिए उन्हें भुगतान किया जाता है.

ये जगजाहिर है कि भारत में घर से लेकर हर दफ्तर तक में श्रम विभाजन को लेकर लैंगिक भेदभाव मौजूद है. हालांकि, ये अब भी तय करना मुश्किल है कि इसमें असमानताएं कितनी ज्यादा हैं.

लोग अपना एक दिन का समय कैसे विभिन्न गतिविधियों में खर्च करते हैं, ये जानने के लिए दुनिया भर के देश टाइम यूज सर्वे का सहारा लेते हैं. भारत में पिछली बार ऐसा सर्वे 1999-2000 में हुआ था. उसके बाद जनवरी से दिसंबर 2019 के बीच राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने भारत में ऐसा सर्वे किया है. टाइम यूज इन ​इंडिया-2019 नाम के इस सर्वे के नतीजे पिछले महीने जारी किए गए.

इस सर्वे में छह साल से ज्यादा की उम्र के 4.5 लाख से अधिक लोगों को शामिल किया गया. इन लोगों से ये सवाल पूछे गए कि वे अपना दिन कैसे बिताते हैं.
 
पुरुष अपने दिन का ज्यादातर समय अपने रोजगार से जुड़े कामों में बिताते हैं, इसलिए वे उन घरेलू कामों में कम समय खर्च ​करते हैं जिनके लिए कोई पैसा नहीं मिलता. हालांकि, रोजगार के कामों की वजह से पुरुषों के पास समय कम बचता है, लेकिन समस्या सिर्फ कम समय की नहीं है.

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सिर्फ 6.1 फीसदी पुरुष ऐसे हैं जो खाना बनाने में भागीदारी करते हैं, भले ही वह वक्त एक दिन का हो या कुछ मिनट का हो, लेकिन 87 फीसदी पुरुष खाली समय बिताने वाले कामों में समय खर्च करते हैं. हालांकि, 15-59 वर्ष की आयु की महिलाओं का बड़ा बहुमत हर दिन खाना पकाने में समय खर्च करता है. घर की सफाई में सिर्फ 8 फीसदी पुरुष शामिल होते हैं और कपड़े धोने में तो सिर्फ 3 फीसदी पुरुष हिस्सा लेते हैं.

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अशोका यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर और नारीवादी लेबर अर्थशास्त्री अश्विनी देशपांडे कहते हैं, “हमारे समाज में श्रम विभाजन को लेकर सख्त पितृसत्तात्मक नियम काम करते हैं, ये मानदंड घर के भीतर भी मौजूद हैं. कई घरों में अगर पुरुष रसोई में जाता है तो उसे अजीब या गलत माना जाता है. यह ऐसा काम नहीं है जिसके बदले पैसा मिलता हो, इसलिए पुरुष घरेलू कामों में हिस्सा नहीं लेते.”
 
इन वजहों से महिलाओं के पास सामाजिकता, यहां तक कि नींद के लिए भी बहुत कम समय बचता है. 15-59 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाएं पुरुषों के मुकाबले औसतन हर रात 13 मिनट कम नींद ले पाती हैं, लेकिन वे दिन के समय झपकियां लेकर नींद की जरूरतें पूरी करती हैं. कामकाजी उम्र में महिलाओं को सामाजिकता, खाने-पीने, यहां तक कि नहाने और कपड़े पहनने के लिए भी कम समय मिलता है.

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ये भेदभाव छोटी उम्र से ही शुरू हो जाते हैं. 6-14 वर्ष की आयु के ज्यादातर लड़के अपनी बहनों की तुलना में अपने दिन का ज्यादातर समय खाली बिताते हैं या कुछ सीखते हैं, जबकि इस उम्र की लड़कियों को भाइयों की तुलना में ज्यादातर समय घरेलू कामों में बिताना पड़ता है. खाना बनाने, सफाई करने और कपड़े धोने जैसे रोजमर्रा के घरेलू कामों में लड़कों के शामिल होने की संभावना बहुत कम होती है.

 

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