भारत का गणतंत्र अपनी 77वीं सालगिरह का जश्न मनाने की तैयारी कर रहा है. भारत विश्व शक्ति बनने की ओर अग्रसर है और देश की अर्थव्यवस्था पांच ट्रिलियन बनने के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रही है. ये भारत आधुनिक तकनीक और एआई के क्षेत्र में भी विश्वास से प्रतियोगिता कर रहा है. भारत शानदार राष्ट्रीय राजमार्गों का जाल बिछा रहा है, ये भारत जमीन के साथ अंतरिक्ष में झंडा गाड़ रहा है. लेकिन इसी भारत में जहां एक तरफ जगमगाती गगनचुंबी इमारतें आधुनिक भारत का प्रतिबिंब बनी हैं तो वहीं इसी हिंदुस्तान में एक दूसरा भारत भी बसता है, जो किसी सरकार को दिखाई नहीं देता जिसका सरोकार जनता से होना चाहिए.
देश की राजधानी दिल्ली, जहां से करोड़ों हिंदुस्तानियों के लिए नीतियां तय होती हैं. जगमग करती दिल्ली की तस्वीरें हमने देखी है लेकिन आज हम आपको उस दिल्ली के बारे में बताने जा रही हैं, जिसकी तस्वीरें कोई देखना ही नहीं चाहता.
नई दिल्ली से मात्र 50 किलोमीटर की दूरी पर एक छोटा सा कस्बा है मुबारकपुर. इसी मुबारकपुर की शर्मा कॉलोनी में दिल्ली की वो तस्वीर दिखती है जो कोई देखना नहीं चाहता है. न मॉनसून है ना आसपास कोई नदी उसके बावजूद शर्मा एन्क्लेव या शर्मा कॉलोनी के सैकड़ों घर इतने गंदे पानी में जलमग्न हैं कि जीना तो छोड़िए सांस लेना भी मजबूरी लगती है.

बीते 7-8 महीने से शर्मा कॉलोनी के सैकड़ों हजारों लोगों की जिंदगी बेबसी में बीत रही है. घरों से निकलने वाले सीवेज हो या नाले का पानी सब कुछ कॉलोनी के बीच रुका हुआ है. हर गली गंदे पानी की वेनिस में तब्दील हो गई है. बदबू और गंदगी में एक पल खड़ा होना मुश्किल है. स्थानीय लोग बताते हैं कि बहुत से लोग इस नरक से निकलकर भाग गए और किराए के मकानों में रहने लगे हैं. गमबूट दिल्ली के पहनावे में असाधारण है लेकिन इन गलियों में बिना गमबूट चलना नामुमकिन है.
शर्मा कॉलोनी नरक बनी जब यहां पास पड़े ख़ाली DDA की जमीन पर मलबा भरना शुरू हुआ था. स्थानीय लोग बताते हैं कि भलस्वा में स्थित कूड़े के पहाड़ से मालवा यहां खाली मैदान में भरा जा रहा है जिसके चलते पानी की निकासी का द्वार संकरा होता जा रहा है और वही पानी इनकी गलियों में घरों में पिछले 8 महीनों से डेरा डाल चुका है.
एक अम्मा के घर में सारा सामान पानी में सड़-गल रहा है. मकान की ऊपरी मंजिल पर यह महिला अपने परिवार के साथ शिफ्ट हो गई है और वहीं पर जीवन बदबू में बीत रहा है. लोगों ने अपनी जेब से सैकड़ों हजारों रुपये खर्च करके गलियों में मलबा डाला है ताकि चलने फिरने की गुंजाइश रहे. ऐसा नहीं है कि इसकी शिकायत शासन या प्रशासन या नेताओं से नहीं की गई. लोग बताते हैं कि हर दरवाजे पर उन्होने याचना की लेकिन क्या बाबू क्या सरकार किसी को इनसे सरोकार ही नहीं रहा. ऐसी उपेक्षा देखकर ही लगता है कि मानो ये कॉलोनी सरकारी कागज पर मौजूद ही नहीं है.

गंदगी में महीनों से जी रहे लोगों को बीमारियों ने घेर रखा है बच्चों को स्कूल जाने में दिक्कत होती है और तो और पानी से निकलने वाले सांपों का डर भी डराता है. स्थानीय लोग बताते हैं कि स्थानीय विधायक से लेकर के पार्षद लियाम एसडीएमहर कोई चक्कर लगा चुका है लेकिन उन दौरों की खानापूर्ति के बाद कभी कोई कदम उठाए ही नहीं गए जिससे शर्मा कॉलोनी की तस्वीर में जरा सा भी सुधार हो सके.
दिल्ली सरकार के सूत्र कहते हैं कि जलभराव की समस्या से स्थायी राहत देने के लिए दो प्रमुख ट्रंक ड्रेनों का विकास कर रही है. 4.5 किलोमीटर लंबा किराड़ी–मुंडका हॉल्ट सप्लीमेंट्री ड्रेन, जिसकी लागत 220.93 करोड़ रुपये है. किराड़ी, मुंडका, बवाना और नांगलोई क्षेत्रों को कवर करेगा. यह ड्रेन 1,520 एकड़ के कैचमेंट क्षेत्र को सेवा देगा और इसकी जल निकासी क्षमता 760 क्यूसेक होगी. इसके समानांतर 7.2 किलोमीटर लंबा किराड़ी–रिठाला ट्रंक ड्रेन, जो 250.21 करोड़ रुपये की डीडीए परियोजना है, को 1,160 क्यूसेक की अधिक जल निकासी क्षमता के साथ डिजाइन किया गया है, ताकि किराड़ी और रोहिणी में लंबे समय से चली आ रही जलभराव की समस्या से निपटा जा सके.

एमसीडी, पीडब्ल्यूडी, दिल्ली जल बोर्ड, डीडीए, निगम पार्षद, स्थानीय पार्षद, स्थानीय विधायक, स्थानीय सांसद, दिल्ली सरकार और केंद्रशासित दिल्ली में आधे से अधिक शक्ति रखने वाली केंद्र सरकार इन तमाम लोगों की जिम्मेदारी है शर्मा कॉलोनी के सैकड़ों हजारों लोगों को इस नारकीय जीवन से निजात दिलाना लेकिन दुर्भाग्य है कि भारत किसी ने उनकी व्यथा पर आंखें मूंद ली हैं.
सरकारी दावों के इतर आज तक के कैमरे में कैद हुई तस्वीरें कम से कम इतना जरूर समझाती है कि मिट्टी के भराव के पहले अगर इस इलाक़े में पानी के निकासी के लिए व्यवस्था कर दी गई होती तो शर्मा एन्क्लेव किसी नरक में तब्दील नहीं होता. इस कॉलोनी से निकलने वाले पानी के ऊपर मलबा डाल कर बाधा नहीं पहुंचाई गई होती या मलबा डालने से पहले पानी के निकासी की व्यवस्था की गई होती तो भी महीनों से नारकीय जीवन में इन सैकड़ों हजारों लोगों को रहने पर मजबूर नहीं होना पड़ता.