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केरल का नाम क्यों बदला जा रहा? पढ़ें- केरलम नाम के पीछे की कहानी

केंद्रीय कैबिनेट ने केरल का नाम बदलकर केरलम करने की मंजूरी दी है. यह बदलाव मलयालम भाषा में राज्य की असली पहचान को सामने रखता है. नाम परिवर्तन के पीछे पौराणिक कथाएं, ऐतिहासिक संदर्भ और भाषाई तर्क हैं. परशुराम की कथा से लेकर मौर्य सम्राट अशोक के शिलालेखों तक, केरल का नाम कई रूपों में सामने आता है.

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केरल का नाम बदलकर 'केरलम' किया जा रहा है
केरल का नाम बदलकर 'केरलम' किया जा रहा है

केंद्रीय कैबिनेट ने मंगलवार को मंजूरी दी कि केरल का नाम बदलकर केरलम कर दिया जाए. इस तरह नाम बदलने की लगातार चली आ रही कवायद में अब केरल यानी केरलम भी शामिल हो गया है. केरल का नाम क्यों बदला गया? इसके क्या कारण हैं और इस नाम का इतिहास क्या है? नेटिजंस में इसे लेकर दिलचस्पी देखी जा रही है. हालांकि समुद्र के किनारे, मैप में एक मोटी लकीर की तरह दिखने वाले इस राज्य के नाम बदलने की बात बीते दो-तीन वर्षों से चर्चा में रही है. 

केरल’ से ‘केरलम’ तक: नाम बदलने की पहल क्यों?
बता दें कि, केरल विधानसभा ने 24 जून 2024 को राज्य का नाम ‘Kerala’ से बदलकर ‘Keralam’ करने के संबंध में एक प्रस्ताव पारित किया था. प्रस्ताव में कहा गया था कि 'हमारे राज्य का नाम मलयालम भाषा में ‘Keralam’ है. राज्यों का गठन 1 नवंबर 1956 को भाषाई आधार पर किया गया था. केरल पिरावी दिवस भी 1 नवंबर को ही मनाया जाता है. राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के समय से ही मलयालम भाषी लोगों के लिए संयुक्त केरल के गठन की मांग प्रबल रही है, लेकिन संविधान की पहली अनुसूची में हमारे राज्य का नाम ‘Kerala’ दर्ज है.'

भाषाई पहचान और मलयालम का सवाल
यानी यहां से ये एक फैक्ट पता चलता है कि केरल राज्य को भाषा के आधार पर बनाया गया था. राज्य की लोकल नेटिव लैंग्वेज मलयालम रही है. मलयालम में ही राज्य का नाम केरलम कहा जाता है. लोकल इसे केरलम ही बोलते आए हैं, लेकिन इंग्लिश में वह इसे केरला कहते हैं.

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खैर... ये तो रही वो बातें जो इस दक्षिणी राज्य के नाम बदलने को लेकर तर्क के रूप में कही जा रही हैं. इस बारे में इतिहास और पौराणिक संदर्भ क्या कहते आए हैं इसे भी देखना जरूरी है. असल में केरल या केरलम नाम रखे जाने के पीछे कोई एक तर्क काम नहीं करता है न ही कोई एक कहानी से इसके नाम का ओरिजिन सामने आता है. लोक मान्यताओं और इतिहास की कहानियों में अलग-अलग संदर्भ नजर आते हैं.

Kerala

परशुराम कथा: समुद्र से निकली भूमि की मान्यता
सबसे पहले पौराणिक कहानियों के रेफरेंस पर चलते हैं. भगवान विष्णु के छठें अवतार भगवान परशुराम का केरल से सीधा कनेक्शन बताया जाता है. केरोलपोथी (केरल की लोक कथाओं का ग्रंथ) सहित कई पुराणों में उनकी कहानी का जिक्र मिलता है. कहते हैं कि धरती पर अत्याचारी क्षत्रियों से लगातार संघर्ष करते-करते और उनका नाश करने वाले परशुराम का मन जब क्षोभ और निराशा से भर गया तब उन्होंने एक बड़ा यज्ञ किया. इस यज्ञ में उन्होंने सारी धरती महादेव को दान कर दी. इस तरह धरती पर उनका कोई अधिकार नहीं रह गया. महादेव ने उनसे परशु यानी फरसा छोड़ने को कहा. 

परशुराम ने सारी भूमि दान करने के बाद तपस्या और अनुष्ठान के लिए कुछ भूमि मांगी, लेकिन वह दान की हुई भूमि से कुछ भी वापस नहीं ले सकते थे. महादेव शिव ने वरुण देव से इसके लिए कह दिया. वरुण देव परशुराम का सागर किनारे ले गए और कहा, यहां जितनी भूमि चाहिए, आप ले लीजिए समुद्र पीछे हट जाएगा. तब परशुराम ने अपना फरसा उठा कर फेंका. वह फरसा जहां गिरा, जल उसके पीछे तक हटता चला गया. यही स्थान आज का केरल है. इसे केर यानी जल और अलम यानी भूमि, यानी जल से निकली भूमि के तौर पर केरल (केरलम) कहते हैं.

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अशोक के शिलालेखों में ‘केरलपुत्र’ का उल्लेख
पौराणिक कहानी से इतिहास की ओर बढ़ें तो केरल नाम के सबसे प्राचीन साक्ष्य मौर्य सम्राट अशोक के तीसरे शताब्दी ईसा पूर्व के शिलालेखों में मिलते हैं. इतिहासकार डी.सी. सरकार अपनी रिसर्च में लिखते हैं कि अशोक के शिलालेखों में केरलपुत्र (Keralaputra) नाम आता है. इसका अर्थ है- 'केरल का पुत्र' या 'केरल का शासक.' वहीं, इतिहासकार आरसी मजूमदार भी अपनी किताब 'Ancient India' में भी 'केरलपुत्र' शब्द और संबोधन का जिक्र करते हैं. 

चेरा वंश और ‘केरल’ शब्द की ऐतिहासिक यात्रा
दक्षिण भारत के प्राचीन इतिहास के जानकार केए नीलकंठ शास्त्री भी अपनी किताब 'A History of South India' में चेरा, चोल और पांड्य राजवंशों का जिक्र करते हैं. जिसमें एक तथ्य ये भी सामने आता है कि 'केरल' नाम का संबंध चेरा वंश से जुड़ा हो सकता है. शास्त्री का तर्क है कि चेरा शासकों का इलाका समय के साथ 'चेरालम' कहलाया. यही बदलते-बदलते 'केरलम' बन गया. दक्षिण भारतीय भाषाओं में 'च' और 'क' के बदलाव के उदाहरण मिलते हैं, इसलिए 'चेरा' से 'केरा' और फिर 'केरल' बनना कोई असंभव बात नहीं है. 

भाषाविज्ञान का तर्क: ‘चेरा’ से ‘केरल’ तक
भाषा विज्ञानी भी मानते हैं कि मलयालम की लिपि में जब 'त' वर्ग के व्यंजन (T, N) के साथ 'इ' या 'ऐ' जैसे स्वर जुड़ते हैं, तो वे अक्सर 'च' वर्ग की ध्वनियों में बदल जाते हैं. केरल की भाषा मलयालम और अन्य द्रविड़ भाषाओं के विकास में 'च' (Palatal) और 'क' (Velar) के बीच बदलाव (Palatalization और Velarization) बड़ी खासियत के तौर पर जानी जाती रही है. खास तौर पर प्राचीन तमिल-मलयालम से मॉर्डर्न रूपों में यह बदलाव देखे जाते हैं. जैसे हिंदी का 'हाथ' तमिल में 'कइ' (Kai) और तेलुगु में 'चेइ' (Chei) हो जाता है. हिंदी के कान को तमिल और तेलुगु में 'चेवि' (Chevi) कन्नड़ में 'किवि' (Kivi) कहा जाता है.

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इतिहासकार ए. श्रीधर मेनन भी इस फैक्ट पर सहमत नजर आते हैं. वे दर्ज करते हैं कि केरल की पहचान चेरा राजवंश से गहराई से जुड़ी रही है. संगम साहित्य में चेरा शासकों और उनके भूभाग का जिक्र मिलता है, जो इस क्षेत्र की प्राचीनता को सामने रखता है और इसके साथ ही नाम की पहचान को भी. 

Kerala

‘केरा’ यानी नारियल से जुड़ा है नाम?
केरल को लेकर एक बड़ी मानी हुई बात नारियल फलों से जुड़ी हुई भी है. 'केरा' शब्द का अर्थ नारियल का पेड़ है और 'आलम' का अर्थ स्थान बताया जाता है. इस तरह 'केरल' का अर्थ हुआ 'नारियलों की भूमि'. हालांकि इतिहासकार इसे लोक मान्यताओं और भौगोलिक स्थिति के आधार पर तो जोड़कर देखते हैं लेकिन इसे ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मान पाते हैं. 

केरल का तटीय क्षेत्र सदियों से नारियल उत्पादन के लिए जाना जाता रहा है. विदेशी यात्रियों और अरब व्यापारियों का जिक्र भी इस इलाके की हरियाली और नारियल की बहुलता का उल्लेख मिलता है. इसलिए नामकरण की यह व्याख्या आम लोगों को सहज-सरल लगती है.

पर्वत, समुद्र और ‘चराल’ यानी पर्वतीय ढलान की जमीन
बात भौगोलिक फैक्ट की हो रही है तो एक और फैक्ट बड़ी मजबूती से खड़ा नजर आता है. लोग 'चराल' (पर्वतीय ढलान) शब्द से भी केरल की उत्पत्ति मानते हैं. पश्चिमी घाट की पर्वतमालाएं केरल के भूगोल का अहम हिस्सा हैं. समुद्र की ओर उनका ढलान और फिर तट की ओर फैला हुआ विशाल मैदान यानी चराल, चेराला, चेरालम और केरलम की शब्द यात्रा के लिए फिट बैठता हुआ लगता है.

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इस तरह, 'केरल' केवल एक भौगोलिक नाम नहीं, बल्कि दो हजार से अधिक वर्षों की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भाषाई यात्रा का परिणाम है. दरअसल, यह सिर्फ एक अक्षर जोड़ने का मामला नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक आत्मसम्मान का सवाल है जो भाषा और इतिहास से जुड़ा है. ‘केरल’ से ‘केरलम’ का सफर प्रशासनिक फैसले से कहीं अधिक, पहचान की वापसी के रूप में देखा जा रहा है.

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