scorecardresearch
 

'सरकार के खिलाफ फैसला देने पर जज का ट्रांसफर ठीक नहीं...', जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने पूर्व सीजेआई बीआर गवई के कार्यकाल में जस्टिस अतुल श्रीधरन के तबादले से जुड़े कॉलेजियम फैसले पर सवाल उठाते हुए कार्यपालिका के दखल की कड़ी आलोचना की है. उन्होंने कहा कि अगर किसी जज को सरकार के लिए असुविधाजनक फैसले देने के कारण ट्रांसफर किया जाता है और यह बात कॉलेजियम प्रस्ताव में दर्ज होती है, तो इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कॉलेजियम सिस्टम की निष्पक्षता पर गंभीर असर पड़ता है.

Advertisement
X
जस्टिस भुइयां ने कहा कि जजों को अपनी शपथ पर कायम रहना चाहिए. (Photo: ITG)
जस्टिस भुइयां ने कहा कि जजों को अपनी शपथ पर कायम रहना चाहिए. (Photo: ITG)

हाई कोर्ट जजों के तबादले को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है. सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई के कार्यकाल में लिए गए एक कॉलेजियम फैसले पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने कॉलेजियम सिस्टम में कार्यपालिका के दखल को लेकर खुली आलोचना की है.

मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जज जस्टिस अतुल श्रीधरन के तबादले से जुड़ा है, जिन्हें एमपी हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्रांसफर किया गया. इस फैसले पर तब विवाद बढ़ा, जब पूर्व सीजेआई बीआर गवई ने यह कहा था कि जस्टिस श्रीधरन का तबादला केंद्र सरकार के अनुरोध पर किया गया था. जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने इसे कॉलेजियम फैसलों में सरकार के प्रभाव की साफ स्वीकारोक्ति बताया.

जस्टिस भुइयां ने उठाए सवाल

जस्टिस भुइयां ने सवाल उठाया कि किसी जज को सिर्फ इसलिए एक हाई कोर्ट से दूसरे हाई कोर्ट क्यों भेजा जाए, क्योंकि उसने सरकार के लिए असुविधाजनक फैसले सुनाए हों. उन्होंने कहा कि क्या इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होती और क्या इससे कॉलेजियम सिस्टम की निष्पक्षता और साख पर सवाल नहीं खड़े होते.

'जजों के तबादले और पोस्टिंग न्यायपालिका का विषय'

Advertisement

उन्होंने कहा कि जब कॉलेजियम अपने ही प्रस्ताव में यह दर्ज करता है कि किसी जज का तबादला केंद्र सरकार के कहने पर किया गया, तो यह संवैधानिक रूप से स्वतंत्र मानी जाने वाली प्रक्रिया में कार्यपालिका के दखल को उजागर करता है. जस्टिस भुइयां ने साफ कहा कि हाई कोर्ट जजों के तबादले और पोस्टिंग पूरी तरह न्यायपालिका का विषय है और इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं हो सकती. यह केवल न्याय के बेहतर प्रशासन के लिए होना चाहिए.

'जजों को अपनी शपथ पर कायम रहना चाहिए'

पुणे के आईएलएस लॉ कॉलेज में आयोजित जीवी पंडित मेमोरियल लेक्चर में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि एनजेएसी फैसले के जरिए जब न्यायपालिका ने सरकार की कॉलेजियम सिस्टम को बदलने की कोशिश को खारिज कर दिया है, तब कॉलेजियम के सदस्यों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह स्वतंत्र रहे. उन्होंने कहा कि जजों ने संविधान को बिना डर और पक्षपात के निभाने की शपथ ली है और उन्हें उस शपथ पर कायम रहना चाहिए.

'किसी मामले में फैसला पहले से तय माना जाने लगे तो...'
 
उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की मूल विशेषता है और इस पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता. जस्टिस भुइयां ने कहा कि जज भी इंसान होते हैं और उनकी अपनी वैचारिक सोच हो सकती है, लेकिन वह सोच उनके फैसलों को प्रभावित नहीं करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि अगर किसी मामले में फैसला पहले से तय माना जाने लगे, तो यह न्यायपालिका के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होगा.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement