देश में मुसलमानों के सबसे बड़े संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद 15 साल पहले दो धड़ो में बंट गया था, जिसे एक करने की तमाम कोशिशें फेल हो गई है. पिछले एक साल से चाचा-भतीजे यानी मौलाना अरशद मदनी और मौलाना महमूद मदनी के बीच सुलह-समझौता कर दो गुटों में बंटी जमीयत उलेमा-ए-हिंद को एक करने की प्रक्रिया को रोक दिया गया है. ऐसे में सवाल उठता है कि देश और दुनियाभर के मुसमलानों को एकता का पाठ पढ़ाने वाले चाचा-भतीजे आखिर एक साथ आने के लिए क्यों तैयार नहीं हैं?
जमीयत उलेमा-ए-हिंद में दो फाड़
भारत के मुसलमानों का दुनियाभर में प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाली जमीयत उलेमा-ए-हिंद का गठन देश की आजादी से पहले हुआ था. इस संगठन पर पूरी तरह से देवबंद के मदनी परिवार का कब्जा आज भी कायम है, इसके खातिर ही 2008 में जमीयत उलेमा-ए-हिंद दो गुटों में बंटी. मौलाना असद मदनी के निधन के बाद उनके छोटे भाई मौलाना अरशद मदनी को साल 2006 में जमीयत की कमान मिली, लेकिन दो साल के बाद असद मदनी के बेटे महमूद मदनी ने अरशद मदनी के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया. इसके बाद जमीयत उलेमा-ए-हिंद दो गुटों में बंट गई.
जमीयत के एक गुट पर चाचा मौलाना अरशद मदनी का कब्जा हो गया, जिसके वो अध्यक्ष बने जबकि दूसरा गुट पर भतीजे महमूद मदनी ने अपना वर्चस्व कायम किया. महमूद मदनी ने अपने नजदीकी मौलाना कारी मोहम्मद उस्मान मंसूरपुरी को जमीयत का अध्यक्ष बनवाया और खुद महासचिव बन गए. उस्मान मंसूरपुरी के निधन के बाद साल 2021 में सर्वसम्मति से मौलाना महमूद को अध्यक्ष चुना गया, जिसके बाद से वो अभी तक अपने पद पर कायम है.
सालों से चल रही सुलह की कोशिश फेल
जमीयत उलेमा-ए-हिंद भले ही दो गुटों में बंट गई थी, लेकिन सात साल के बाद ही संगठन को एक करने की कोशिश शुरू हो गई थी. साल 2015 में 2015 से जमीयत के विलय के प्रयास शुरू कर दिए गए थे. इसको लेकर जमीयत के दिल्ली स्थित मुख्यालय पर कई दौर की बैठकें भी हुईं, जिसमें विलय को लेकर विचार मंथन हुआ. दोनों जमीयतों के एक होने के प्रयास उस समय कारगर साबित होते नजर आए, जब मौलाना महमूद की ओर से देवबंद में 29 मई 2022 को हुए प्रबंधन कमेटी के इजलास में मौलाना अरशद मदनी ने भाग लेते हुए विलय के प्रयासों का समर्थन किया
मौलाना महमूद मदनी ने 4 जनवरी 2023 को अपने चाचा मौलाना अरशद मदनी को पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने अपनी सभी गलतियों के लिए माफी मांगी और सभी मतभेदों को भुलाकर विलय का प्रस्ताव रखा. साथ ही मौलाना अरशद मदनी को एकीकृत जमीयत के पूर्ण अधिकृत अध्यक्ष के रूप में स्वीकार करने के लिए महमूद मदनी तैयार हो गए थे, जिसके क्रम में ही इस साल महमूद मदनी के द्वारा कराए गए जमीयत के कार्यक्रम में भी अरशद मदनी को बुलाया गया था. जमीयत के एकीकृत को लेकर महमूद मदनी गुट के 90 से अधिक पदाधिकारियों ने अपने इस्तीफे तक दे दिए थे. इसके बाद भी दोनों गुट क्यों एक नहीं हो सके.
जमीयत में क्यों सुलह नहीं हुई
महमूद मदनी गुट के सचिव नियाज अहमद फारूकी ने बताया कि जमीयत के विलय के समझौते की प्रक्रिया को हमारी ओर से नहीं बल्कि अरशद मदनी गुट की तरफ से एकतरफा समाप्त कर दिया है. हमारे लिए व्यक्ति से अधिक महत्व संगठन का सर्वोपरि होना और व्यक्तित्व पर सांगठनिक प्राथमिकता एकता है. इसके बिना एकता और विलय की कोई धारणा उपयोगी और प्रभावी नहीं हो सकती. फारूकी ने बताया कि हमने अपनी इसी सोच के तहत प्रस्ताव दिया था कि हम अरशद मदनी को अध्यक्ष के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, लेकिन उन्होंने ही इस प्रस्ताव को स्वीकार योग्य नहीं समझा और न ही हमारे इस पक्ष को स्वीकार किया.
हालांकि, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के विलय को लेकर चल रहे प्रयासों के विफल होने के पीछे दोनों गुटों में प्रभावी पदों पर बैठे कुछ लोग हैं. मौलाना अरशद मदनी चाहते थे कि उनकी जमीयत ज्यों के त्यों बनी रहे और महमूद मदनी गुट के केवल दो ही लोग उनकी जमीयत में शामिल किए जाए. अरशद मदनी की इस शर्त को मौलाना महमूद मदनी गुट ने मंजूर नहीं किया. इसके पीछे अरशद मदनी के राइट हैंड माने जाने वाले मौलाना फजलुर्रहमान को माना जा रहा है.
अरशद मदनी के संगठन में सारा काम फजलुर्रहमान देखते हैं तो महमूद मदनी के गुट में नियाज फारुकी. ऐसे में अरशद और महमूद मदनी के एक होते हैं तो सबसे बड़ा झटका इन्हीं दोनों लोगों को लगना था. माना जा रहा है कि चाचा-भतीजे के एक नहीं होने के पीछे कहीं न कहीं इन्हीं दोनों लोगों की भूमिका माना जा रही है.
जमीयत पर मदनी परिवार का दबदबा
1 मौलाना हुसैन मदनी अध्यक्ष 1940-1957
2 मौलाना असद मदनी अध्यक्ष 1972-2006
2 मौलाना अरशद मदनी अध्यक्ष 2006-2008 अभी अपने गुट
3 मौलाना महमूद मदनी महासचिव 2006-2008
4 मौलाना महमूद मदनी महासचिव 2008-2021
5. मौलाना महमूद मदनी अध्यक्ष 2021----
मदनी परिवार कैसे हुआ काबिज
दारूल उलूम देवबंद के प्राचार्य महमूद हुसैन देबवंदी को 1920 में जमीयत का प्रमुख बनाया गया, लेकिन वे सिर्फ 30 दिन तक ही पद पर रह पाए. महमूद हुसैन के निधन के बाद फिर किफायतुल्ला को ही जमीयत की कमान मिली.1940 में दारूल उलूम के संरक्षक महमूद अल-हसन के शिष्य मौलाना हुसैन अहमद मदनी के हाथों में जमीयत की कमान आई. हुसैन मदनी 1957 तक जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख रहे. 17 साल तक जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख हुसैन अहमदी के निधन के बाद अहमद सईद देहलवी को संगठन की कमान सौंपी गई. 1959 में फकर्रूदीन अहमद जमीयत उलेमा के प्रमुख बने. 1963 में फकर्रूदीन ने हुसैन अहमदी के बड़े बेटे असद मदनी को महासचिव बना दिया.
1972 में फकर्रूदीन अहमद के निधन के बाद हुसैन अहमदी के बड़े बेटे और तत्कालीन महासचिव असद मदनी को जमीयत उलेमा-ए-हिंद का प्रमुख बनाया गया. असद अहमदी 34 सालों तक इस पद पर रहे. असद मदनी ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मुस्लिम नेताओं से चुनाव में भी भागीदारी लेने की अपील की.
असद मदनी जमीयत के पहले अध्यक्ष थे, जो राज्यसभा के लिए भी निर्वाचित हुए. कांग्रेस के टिकट पर असद तीन बार ऊपरी सदन में पहुंचे. कांग्रेस में रहते हुए असद मदनी ने बाबरी मस्जिद के ताला खोलने का विरोध किया और तत्कालीन राजीव गांधी सरकार से इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर करने की अपील की. इस घटना के बाद असद की साख मुसलमानों में और ज्यादा बढ़ गई. 2006 में असद के निधन के बाद उनके छोटे भाई अरशद मदनी को जमीयत की कमान मिली.
2008 में असद मदनी के बेटे महमूद मदनी ने चाचा अरशद मदनी के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया. इसके बाद जमीयत उलेमा में विभाजन हुआ और महमूद मदनी ने अलग गुट बना लिया. 2022 में दोनों गुटों में समझौता हुआ और महमूद मदनी फिर से चाचा अरशद मदनी को अध्यक्ष बनाने पर राजी हो गए थे, लेकिन अब सुलह-समझौते की कोशिश फेल हो गई है.