जब भी भारतीय रेलवे की कोई ट्रेन बिना किसी तकनीकी खराबी या अन्य वजह के अचानक रुक जाती है, तो उसके पीछे दो-तीन और ट्रेनें भी रुकने को मजबूर हो जाती हैं. इसकी वजह से सैकड़ों यात्रियों का समय बर्बाद होता है, गुड्स ट्रेनों का शेड्यूल गड़बड़ा जाता है और रेलवे को आर्थिक नुकसान भी होता है.
रेलवे विशेषज्ञों की मानें तो ट्रैक पर चलते छुट्टा पशुओं की वजह से ट्रेनों की रफ्तार कम हो जाती है. आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक, रेलवे ट्रैक पर घूमने वाले गाय, भैंस, बकरी और कुत्ते ट्रेन की चपेट में आ जाते हैं. सुरक्षा कारणों से ट्रेन को तुरंत रोकना पड़ता है और घटना की जांच करनी होती है. ऐसे में जांच के बाद ही ट्रेन को आगे बढ़ने की अनुमति मिलती है. इस बीच चेन रिएक्शन शुरू हो जाता है. आरटीआई में मिली जानकारी के मुताबिक, बीते चार साल में छुट्टा पशुओं के ट्रेन से कटने के करीब एक लाख मामले सामने आए हैं.
RTI के खुलासे में चौंकाने वाले आंकड़े
आरटीआई में रेलवे द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले चार सालों (2019-20 से 2022-23) में ट्रेन से पशु कटने की करीब 1 लाख घटनाएं दर्ज हुई हैं. इन घटनाओं के चलते सवा लाख से ज्यादा पैसेंजर और गुड्स ट्रेनें लेट हुई हैं.
हर मिनट रुकने पर रेलवे को कितना नुकसान?
आरटीआई में मिली एक जानकारी के मुताबिक, रेलवे को एक मिनट की देरी भी बहुत महंगी पड़ती है.
यह वो नुकसान है जो सीधे तौर पर रेलवे को होता है. इसके अलावा यात्रियों का समय, व्यापारियों का माल और पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला असर इससे कहीं ज्यादा है. कई मामलों में ट्रेन लेट होने पर यात्रियों को ₹100 से ₹200 तक मुआवजा भी देता है.
अब रेलवे क्या कर रहा है?
रेलवे इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए कई कदम उठा रहा है. ट्रैक के दोनों तरफ ऊंची दीवारें (फेंसिंग) लगाने, पशु डिटेक्टर सिस्टम, जागरूकता अभियान, और स्थानीय पशुपालकों के साथ समन्वय जैसे उपाय किए जा रहे हैं. लेकिन समस्या जमीनी स्तर पर इतनी गहरी है कि अभी भी पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आई है.
कई बार रेलवे पुलिस रेल लाइन के किनारे पशु चराने वालों पर कार्रवाई भी करती है. ऐसे ही कुछ मामलों में रेलवे ने 2019 में दो अलग-अलग धाराओं में 51 एफआईआर दर्ज कीं, 2020 में 126, 2021 में 333 और 2022 में 428 एफआईआर दर्ज की गई थीं.