गैंगस्टर से राजनेता बने अरुण गवली के लिए बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनाव नतीजे निराशाजनक साबित हुए. उनकी दोनों बेटियां, योगिता और गीता गवली, अपने-अपने वार्डों में हार गई हैं.
योगिता और गीता दोनों ने अखिल भारतीय सेना के टिकट के लिए चुनाव लड़ा, जिसकी स्थापना उनके पिता ने की थी. गीता को बायकुला क्षेत्र के वार्ड संख्या 212 से टिकट मिला, लेकिन उन्हें समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार अमरी शहजान अब्राहानी ने हरा दिया. वहीं, योगिता को वार्ड संख्या 207 में भाजपा के रोहिदास लोखंडे के खिलाफ कड़ी टक्कर मिली और उन्हें हार का सामना करना पड़ा.
कौन है अरुण गवली?
अरुण गवली, जिसे 'डैडी' के नाम से जाना जाता है, मुंबई के भायखला इलाके की दगड़ी चॉल से निकला एक ऐसा नाम है, जिसने कभी मुंबई के अंडरवर्ल्ड को दहलाया था. 17 जुलाई 1955 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के कोपरगांव में जन्मे गवली का परिवार मध्यमवर्गीय था. उसके पिता गुलाबराव मजदूरी करते थे और बाद में मुंबई की सिम्पलेक्स मिल में काम करने लगे. आर्थिक तंगी के कारण गवली ने मैट्रिक के बाद पढ़ाई छोड़ दी और कम उम्र में ही अपराध की दुनिया में कदम रख दिया.
1990 के दशक में मुंबई पुलिस के बढ़ते दबाव और गैंगवार से बचने के लिए गवली ने राजनीति में कदम रखा. साल 2004 में उसने अखिल भारतीय सेना (ABS) नामक पार्टी बनाई और चिंचपोकली से विधायक बनकर सत्ता के गलियारे में कदम रख दिया. हालांकि, 2008 में गवली ने शिवसेना पार्षद कमलाकर जामसांडेकर की हत्या करवा दी, जिसके बाद उसे इस मामले में साल 2012 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई.
साल 2025 में गवली को मिली जमानत
वह नागपुर सेंट्रल जेल में 17 साल से सजा काट रहा था, साल 2025 में गवली को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई. 77 वर्षीय गवली की बेटी ने बायकुला–चिंचपोकली क्षेत्र के वार्ड 207 से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत करने जा रही थीं, लेकिन बीएमसी चुनाव की हार ने इस शुरुआत पर रोक लगा दी है.