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Exclusive: क्या सभ्यता के लिए 2020 सबसे खराब साल? जानिए इतिहासकार क्या कहते हैं?

अनेक लोगों को लगता है कि 2020 एक शापित वर्ष है, जो मानव सभ्यता के इतिहास में सबसे बुरा है. लेकिन क्या सच में ऐसा है? इंडिया टुडे डेटा इंटेलिजेंस यूनिट (DIU) ने जवाब तलाशने के लिए अतीत को गहराई से खंगाला.

हिरोशिमा पर एटमी हमला हिरोशिमा पर एटमी हमला
स्टोरी हाइलाइट्स
  • इतिहास का सबसे बुरा वर्ष नहीं है साल 2020
  • 536 में हुई थी लेट एंटीक लिटिल आइस एज की शुरुआत
  • 541 में ब्यूबॉनिक प्लेग जैसी जस्टिनियन महामारी फैली

साल 2020 की शुरुआत ऑस्ट्रेलिया में जंगल की भीषण आग से हुई, इसने 300 करोड़ पशुओं को या तो मार दिया या उन्हें मूल जगह से उजाड़ दिया. इसके बाद कोविड-19 महामारी आई. ये लेख लिखे जाने तक इस महामारी से दुनिया भर में 3 करोड़ से ज्यादा लोग संक्रमित हो चुके हैं और करीब 10 लाख मौतें हुई हैं.  

दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं धड़ाम हैं. नौकरियों का जाना चरम पर है, और कई सेक्टर्स को कयामत जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है. यही कम नहीं था जो पृथ्वी के तमाम हिस्सों में महामारी के पीछे कुदरत के कहर भी चले आए. इन्होंने भी भारी तबाही मचाई. मिसाल के लिए भारत ने बाढ़, चक्रवात, भूकंप, युद्ध का मंडराता खतरा, पिछले आठ महीने में क्या-क्या नहीं देखा?  

अनेक लोगों को लगता है कि 2020 एक शापित वर्ष है, जो मानव सभ्यता के इतिहास में सबसे बुरा है. लेकिन क्या सच में ऐसा है? इंडिया टुडे डेटा इंटेलिजेंस यूनिट (DIU) ने जवाब तलाशने के लिए अतीत को गहराई से खंगाला.  

536 CE और उसके बाद के वर्ष  

मौजूदा वक्त में रहने वालों को क्यों अपने किस्मत के सितारों को शुक्रिया कहना चाहिए? क्यों ये खैर मनानी चाहिए कि वे आज के दौर में रह रहे हैं और करीब 15 सदी पहले दुनिया में नहीं आए थे.  

536 CE (ईस्वी) के साथ दिक्कत की बात की जाए तो सबसे पहले आता है मौसम. इसके खराब होने की वजह थी- दो बड़े ज्वालामुखी विस्फोटों ने पृथ्वी को घने कोहरे से ढंक दिया था और सूरज की रोशनी को नीचे आने से रोक दिया था. तापमान नीचे गिरा और उत्तरी गोलार्ध के कुछ हिस्सों में गर्मियों में भी बर्फबारी होने लगी थी. जाहिर था कि इसने फूड सप्लाई चेन को गड़बड़ा दिया. नतीजतन, पूरे यूरोप (आज का यूरोपीय क्षेत्र) और आसपास के इलाकों को अकाल का सामना करना पड़ा.

हार्वर्ड विश्वविद्यालय में मध्ययुगीन इतिहास के प्रोफेसर माइकल मैककॉर्मिक और फ्रांसिस गोएलेट कहते हैं, "वर्ष 536 खाद्य उत्पादन के लिए खराब था, विश्व स्तर पर भी, लेकिन खास तौर पर उत्तरी गोलार्ध के लिए. उससे भी अहम, इसके बाद के वर्षों में जो ज्वालामुखी फूटे, उनमें क्या जुड़ाव थे, इस पर आज भी कम समझ ही विकसित हो पाई है. 536 में ‘लेट एंटीक लिटिल आइस एज’ की शुरुआत और सबसे महत्वपूर्ण, 541 में ब्यूबॉनिक प्लेग जैसी जस्टिनियन महामारी की मिस्र में दस्तक.” 

मैककॉर्मिक जो कह रहे थे, वो ये था कि 536 CE खत्म होने के तत्काल बाद लोगों ने कुछ निश्चिंत होना शुरू कर दिया था, तभी प्लेग के एक बुरे केस ने यूरोप को 541 CE के आसपास हिट किया. ये बाइजेंटाइन साम्राज्य के दिल पर आखिरी कील की तरह था. यहां तक ​​कि उन अंधेरे दिनों में जब यूरोप में पुरातनता मध्ययुगीन काल के लिए रास्ता बना रही थी, उंगलियां पूर्व की ओर इशारा कर रही थीं, चीन और ओरिएंट (पूर्वी गोलार्ध के क्षेत्र) पर प्लेग को भेजने के लिए दोषी ठहराया जा रहा था.   

वो शुरुआती यूरोपीय लोग स्वाभाविक रूप से परेशान थे क्योंकि प्लेग का प्रकोप लगभग 200 साल बना रहा. खास तौर पर भूमध्यसागरीय क्षेत्र में. 750 CE के आसपास प्लेग धीरे धीरे समाप्त होने तक दस करोड़ लोगों की जान ले चुका था.

प्लेग का प्रकोप फिर अगली छह सदियों तक शांत रहा. सब सही था कि 1347 से 1352 के बीच फिर काले दिन लौट आए. एक ब्यूबॉनिक प्लेग जो मध्य एशिया से उभरा और जिसने मंगोल यात्रियों और व्यापारियों के जरिए यूरोप में अपना रास्ता बना लिया.   

और एक बार फिर, पूर्व से उठे प्लेग ने यूरोप की तत्कालीन आबादी का लगभग एक चौथाई हिस्सा खत्म कर दिया. लगभग 600 वर्षों तक दुनिया ने कोई महामारी नहीं देखी (हालांकि पश्चिम में छोटी संक्रामक बीमारियां इधर उधर होती रहती थीं) और फिर 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में फ्लू ने सिर उठाया.  

स्पेनिश फ्लू महामारी  

वर्ष 1918 में H1N1 इन्फ्लूएंजा महामारी में बदल गया, जिसने दुनिया के हर तीन लोगों में से लगभग एक को संक्रमित किया. करीब 50 करोड़ लोग संक्रमित हुए और 5 करोड़ की मौत हुई. भारत में इसने उत्तरी हिस्सों को निशाना बनाया, ,जिससे अनुमानित 1.2 से 1.3 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई. यह कुल आबादी का लगभग 4-6 प्रतिशत हिस्सा था.  

अमेरिकी इतिहासकार और "द ग्रेट इन्फ्लुएंजा: द स्टोरी ऑफ डेडलिएस्ट पेंडेमिक इन हिस्ट्री" किताब के लेखक जॉन एम बैरी कहते हैं, "1918-20 महामारी में, भारत में इन्फ्लूएंजा से कम से कम एक करोड़ मौतें हुईं, और यह बहुत संभव है कि आंकड़ा 20 लाख और ज्यादा हो गया हो. ब्रिटिश सेना में भारतीय सैनिकों की केस मृत्यु दर 20 प्रतिशत से अधिक थी. उसके ऊपर, फसलों की किल्लत और ब्रिटिश की जंगी कोशिशों को सपोर्ट देने के लिए खाने के सामान के निरंतर निर्यात ने कुछ क्षेत्रों में अकाल जैसी स्थिति बना दी.”  

इसलिए 1918 से 1920 का समय उन लोगों के लिए बुरा रहा होगा जो उस दौर में जी रहे थे, लेकिन भारत में आज भी लोग 1770 के दशक के ग्रेट बंगाल अकाल की बात करते हैं तो थर्रा उठते हैं.  

उस अकाल ने बड़े बंगाल क्षेत्र की एक तिहाई आबादी का सफाया कर दिया, जिसमें वर्तमान पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्से, पूरे बांग्लादेश के साथ बिहार और ओडिशा के कुछ हिस्से शामिल थे. इतिहासकारों ने बाद में गणना की कि 1769 से 1773 तक के वर्षों में भुखमरी से कम से कम एक करोड़ लोग मारे गए थे. अकाल के दर्द और आघात के निशान बंगाल के साहित्यिक संदर्भों में पाए जा सकते हैं.  

जब सवाल किया गया कि मानवता के लिए सबसे बुरा साल कौन सा माना जाएगा,तो इतिहासकार राना सफवी कहती हैं कि विपदा या दुर्भाग्य व्यक्तिनिष्ठ है, और अलग-अलग लोग अपने अनुभवों और नजरियों के आधार पर अलग-अलग वर्षों को सबसे खराब कहेंगे.  

ऐसी कई घटनाएं हैं जिनसे मानवता सामूहिक रूप से एक प्रजाति के रूप में नहीं बल्कि उस पहचान के सब-सेट के रूप में जीवित रही है. जंग, विजय के उन्माद, उपनिवेशवाद और गुलामी ने दुनिया भर में लाखों लोगों की जान ली है. सब-सेट (उप-समूह) वाली पहचानें समग्र रूप से देखा जाए तो मानव जाति को बुरी तरह प्रभावित करती हैं.   

आधुनिक काल के युद्ध से जुड़े डर  

अगर हम सौ साल पीछे चले जाते हैं (वो वक्त जब हमारे दादा-दादी या नाना-नानी रहते थे), तब सिर्फ चार साल की अवधि में कोई 2 करोड़ लोग मारे गए. करीब 75,000 भारतीय एक श्वेत व्यक्ति का युद्ध लड़ रहे थे- पहला विश्व युद्ध.  

सिर्फ 30 साल बाद, एडॉल्फ हिटलर दुनिया को फतेह करने के लिए निकला. नतीजा- दूसरे विश्व युद्ध में 8.5 करोड़ नागरिकों और सैनिकों ने जान गंवाई. इस बार, राजा की खातिर या उसकी ओर से युद्ध में हिस्सा लेने के आह्वान की वजह से 20 लाख भारतीयों की मौत हुई.  

लेकिन भारतीयों की मौत के आंकड़े में उस अकाल को ध्यान में नहीं रखा गया जो ब्रिटिश शासकों के बंगाल से अनाज बाहर ले जाने की वजह से हुआ. ये अनाज युद्ध में लड़ रहे अपने सैनिकों के लिए ले जाया गया. 1943-44 के बंगाल के अकाल में भुखमरी से 30 लाख लोगों की जान गई. पुरानी पीढ़ी अभी भी उन डरावने दिनों को याद करती है. कई फिल्मों और किताबों ने युवा पीढ़ी के जेहन में भी उस खौफ को बरकरार रखा है.  

वर्ष 1943 बंगाल के सबसे खराब वर्ष में उल्लेखित हो सकता है, लेकिन आधुनिक बांग्लादेश इस पर विरोध जता सकता है. इसके लिए वो 'ऑपरेशन सर्चलाइट' के कहर का हवाला दे सकता है जो पाकिस्तानी सेना ने 1971 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में बरपाया था. यह ऑपरेशन बंगाली राष्ट्रवादी आंदोलन को कुचलने के लिए किया गया था. आंदोलन में पश्चिम पाकिस्तान की ओर से उर्दू थोपे जाने का विरोध किया जा रहा था.  

यह और बात है कि 1971 को बांग्लादेश के नए राष्ट्र के उदय के तौर पर भी जाना जाता है. लेकिन अनुमान है कि नरसंहार में तीस लाख लोग मारे गए जिनमें अधिकतर बंगाली हिन्दू थे. साथ ही एक करोड़ लोगों को सीमा पार कर भारत में जाने के लिए मजबूर होना पड़ा.  

यहूदी धर्म के लोगों के लिए, जर्मनी में हिटलर के शासन के दिन सबसे खराब होंगे. क्योंकि उसने 60 लाख यहूदियों को मारने के लिए किलिंग फैक्ट्री जैसा सिस्टम खड़ा किया. साथ ही उनका सब कुछ जो भी उनके पास था,सोने के दांतों से लेकर शरीर की त्वचा तक,सब कुछ हड़प लिया. मानवता पर ये किया गया सबसे क्रूर व्यवस्थित प्रयोग था.   

जापान में किसी के लिए भी, 1945 शायद देश के इतिहास का सबसे खराब साल होगा,क्योंकि इसी साल ‘लिटिल बॉय’ और ‘फैट मैन’ नाम के दो परमाणु बमों के जरिए अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर आसमान से तबाही बरसाई थी.   

वर्ष 1947 भारतीय उप-महाद्वीप के लिए सबसे खराब वर्ष के तौर पर गिनाया जा सकता है. जब एक प्राचीन जमीन दो देशों के जन्म के वक्त लहुलूहान हुई थी. सृजन और विनाश के भीषण नृत्य में सदियों पुरानी जड़ें उखाड़ दी गईं,काट डाली गईं.   

इतिहासकार राना सफवी से जब पूछा गया कि वह किस वर्ष को भारतीय इतिहास में सबसे बुरा मानती हैं तो उन्होंने कहा, “मेरे लिए, हालांकि मैं तब पैदा नहीं हुई थी, लेकिन जैसा कि मैंने सुना और पढ़ा है, 1947 सबसे खराब वर्ष होगा. विभाजन ने डेढ़ करोड़ लोगों को विस्थापित किया और दस लाख से अधिक मारे गए.”   

लेखेजोखे के लिए कोई शुरुआत नहीं है. ऑस्ट्रेलिया और उत्तरी अमेरिका में मूल जनजातियों का मिटाया जाना, पॉलिनेशियन द्वीपों का फ्लू से नष्ट होना, औपनिवेशिक सेनाओं का खुला दौड़ना, गुलामों का व्यापार करने वालों का अफ्रीकी जंगली झाड़ियों में मनुष्यों का शिकार करना, जोसेफ स्टालिन और माओ त्से-तुंग जैसे नेताओं की ओर से अपने ही साथी देशवासियों को लाखों की संख्या में मार डालना,तुर्की के ओटोमन्स की ओर से जातीय सफाई के नाम पर 1.5 लाख आर्मेनियाई लोगों की हत्या, रवांडा में हुतु-तुत्सी नरसंहार, कंबोडिया में खाली खोपड़ियों के स्मारक, और अंतहीन अन्य त्रासदियां. ये सब निर्भर करता है कि कौन कहां और किस साल निशाने पर आया.  

ये हमें उस वर्ष में लाता है जिसमें हम जी रहे हैं. क्या ये वाकई सबसे बुरा साल है. इतिहासकार जॉन एम बैरी कहते हैं, "2020 अस्तित्व के सबसे बुरे वर्षों के कहीं करीब भी नहीं ठहरता."  

विशेषज्ञों की राय मिली-जुली   

प्रोफेसर माइकल मैककॉर्मिक, जिन्होंने 536 AD के सबसे खराब वर्ष होने का दावा किया, ने 2020 के लिए कहा: “यह स्पष्ट रूप से अब तक बुरा वर्ष रहा है और हमने अभी इसका दो-तिहाई ही पार किया है. और यह महसूस करना अहम है कि अधिकतर घटनाओं के मध्यम और दीर्घकालिक परिणाम कुछ समय के लिए छिपे रहते हैं. क्योंकि हफ्ते, महीने, दशकों और यहां तक ​​कि शताब्दियों तक हताहतों की जटिल श्रृंखलाएं बनी रहती हैं,  जब तक कि घाघ पत्रकार और इतिहासकार उनकी पहचान करना शुरू नहीं कर देते.”   

लेकिन दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में मेडिसिन इतिहासकार प्रोफेसर बर्टन क्लीटस के मुताबिक, 2020 असल में मनोवैज्ञानिक नजरिए से सबसे खराब वर्ष है.  

प्रोफेसर क्लीटस ने कहा, "वर्ष 2020 सबसे खराब है - मुख्य रूप से, अगर हम बीमारी की व्यापकता को नाप रहे हैं. स्कूलों के बंद होने, कारोबार ठप होने और कई गतिविधियों पर रोक लगने से लोग यह मानने लगे हैं कि उनका जीवन रुकने यानि स्थिरता की स्थिति में आ गया है.”  

विज्ञान और आधुनिक राजनीतिक इतिहास के इतिहासकार और दिल्ली में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशनल प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन में पूर्व मौलाना आज़ाद चेयर प्रोफेसर सैयद इरफान हबीब, मानते हैं कि 2020 को भारतीय इतिहास का सबसे ख़राब साल कहना गलत होगा.  

प्रोफेसर हबीब ने कहा, “वर्ष 2020 निश्चित रूप से बुरा रहा है, लेकिन हम इसे इतिहास में सबसे खराब नहीं कह सकते. जाहिर तौर पर, वायरस ने समाज के सभी वर्गों के लोगों को प्रभावित किया है. हालांकि हम उम्मीद कर रहे हैं कि यह इस साल के अंत तक खत्म हो जाएगा. अगर यह इसी तरह फैलता रहा तो हमें नए सिरे से सोचना पड़ सकता है. ”  

लीजिए अब हमारे पास है; जूरी 2020 को लेकर क्या कहती है,हमारे सामने है. क्या 2020 अभी तक का सबसे खराब वर्ष है, इसे अतीत को ध्यान में रखकर आंका जाएगा. भविष्य में शायद इस बात पर बहस होगी कि 536 CE  या 2020 या फिर भविष्य के किसी उथल-पुथल वाले वर्ष में से सबसे खराब किसे माना जाए.

(नई दिल्ली में सुजय और निखिल रामपाल)

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