
सुबह 4 बजे का वक्त था, जब मैं AIIMS दिल्ली के पास एक सबवे में उतरा. शरीर पर ऊन की कई परतें थीं और मुझे अपने रूम हीटर की कमी खल रही थी. कुछ कदम आगे बढ़ा ही था कि सामने जो देखा, उसे देखकर मेरी ठंड कुछ गायब सी हो गई.
लोग लंबी लाइन में जमीन पर लेटे थे... एक के बाद एक... इतने पास-पास कि उनके शरीर लगभग एक-दूसरे पर चढ़े हुए लग रहे थे. दूर से देखने पर यह समझ पाना मुश्किल था कि फर्श लोगों से भरा है, ऐसा लग रहा था जैसे कंबलों की एक लंबी चादर बिछी हो.
वहीं, कुछ लोग पतले कंबलों में लिपटे थे. सिर से पैर तक खुद को ढकने की कोशिश में. उंगलियां कंबल और नीचे बिछी तिरपाल के किनारों को कसकर पकड़े थीं, बर्फीली हवा को भीतर घुसने से रोकने की बेताब कोशिश में दिख रहे थे ये लोग.

मेरी नजर एक शख्स पर पड़ी, जिसकी एक आंख पर पट्टी बंधी थी. वो कंबल के भीतर से कमजोर नजरों से मेरी ओर झांक रहा था.
आसपास लोग सोए थे, पहले से ही परेशान लोगों को मैं और परेशान नहीं करना चाहता था इसलिए फुसफुसाकर शख्स से पूछा, 'किस चीज का इलाज चल रहा है?
दुखती आवाज के साथ उसने कहा, 'कैंसर है आंख में.'

'कब से यहां हैं?'
'एक महीने से ज्यादा हो गया. इतने समय से यहीं पड़ा हूं.'
वो तिरपाल पर बैठे-बैठे हाथों के सहारे जगह बदलने की कोशिश करने लगा. उसके हिलते ही साफ पता चल रहा था कि वो गहरी पीड़ा में है. उसने कहा, 'टाइल्स पर बैठे-बैठे कमर पत्थर हो रही है, नींद भी नहीं आती यहां तो.'
मैंने देखा, करीब 80 साल की एक बुजुर्ग महिला तिरपाल से उठीं और सीढ़ियों की ओर बढ़ीं. उनके पास सो रही एक महिला से मैंने पूछा, 'इतनी सुबह कहां जा रही हैं?'
बुजुर्ग ने जवाब दिया, 'टॉयलेट'.
मैं लपक कर उस बुजुर्ग के पास गया और पूछा, 'दादी, यहां वॉशरूम कहां है?'
ठंड से कांपती आवाज में वो बोलीं, 'यहां नहीं है. AIIMS के अंदर एक है, लेकिन पता नहीं खुला है या नहीं.'
एक आदमी, जिसके धड़ से यूरिन बैग लगा हुआ था, अभी-अभी सोकर उठा था. उसके पास बैठी महिला, शायद उसकी पत्नी थी, उसे संभाल रही थी.

आगे बढ़ा तो एक और शख्स मुझे जगा दिखा. मैंने उससे पूछा, 'नहाने के लिए कहां जाते हैं?'
उसने कहा, 'एक जगह है, लेकिन वो पैसे लेते हैं. इसलिए मैं पंद्रह दिन में एक बार नहाता हूं, पैसा देकर.'
मैंने फिर पूछा, 'डॉक्टर रोज नहाने को नहीं कहते?'
आवाज में बेचारगी लिए शख्स बोला, 'कहते हैं डॉक्टर कि रोज नहाओ, लेकिन नहाने की जगह रहेगी तब न नहाएंगे... पैसा देते हैं तब नहाते हैं. हमलोगों के पास पैसा रहेगा तब न रोज नहाएंगे.'
तभी दर्द से कराहने की आवाज आई. करीब 60 साल की एक महिला नींद से जागी थीं, उसका कराह ठंडी हवा में मिलकर आसपास ही जम गई थी. उनके पति बगल में बैठ गए, बेबस, लाचार.
जो उन्होंने बताया, वही कई और लोगों की हकीकत थी. इलाज के लिए परिवार गांव लौटते हैं, ब्याज पर पैसा उधार लेते हैं, फिर दिल्ली आते हैं, पैसा खर्च होता है और फिर यही चक्र चलता रहता है. पति कहता है, 'ब्याज पर पैसा लाते हैं गांव से, खत्म होते ही फिर भागना पड़ता है गांव... यही चलता रहता है. ऐसे में हम यहां कैसे रहें? खाना कहां से खाएं? क्या करें?'

ठंड से बचने के लिए वो सिर नीचे की तरफ झुकाता है, जैसे AIIMS की जमीन में ही गड़ जाना चाहता हो. फिर कहता है, 'इतनी बेचैनी होती है... बहुत घबराहट होती है. कभी-कभी लगता है कि ये मर जाएगी, प्राण निकल जाएंगे इसके.'
दोनों पति-पत्नी लोगों के दिए कंबल में लिपटे पड़े थे. मैंने जब इस बारे में पूछा तो बीमार पत्नी कराहते हुए बोली, 'हां, लोग दे जाते हैं... जब ये कंबल नहीं थे तब तो बहुत ज्यादा ठंड लगती थी. लग रहा था कि मर रहे हैं.'
सुबह के 5 बज चुके थे. रात की पीड़ा जैसे मन पर बर्फ की तरह जम गई थी. मैं बाहर निकला और AIIMS की ओर बढ़ा.
विभागों के गेट अभी खुले नहीं थे, लेकिन मरीजों की लाइनें लग चुकी थीं.
'आप कहां से हैं?' मैंने काली जैकेट और ऊनी टोपी पहने एक आदमी से पूछा.
'मध्य प्रदेश.' उसने कहा.
'आज ही दिल्ली आए हैं?'
'हां. इस महीने दूसरी बार आया हूं.'
उत्तराखंड से आया एक और आदमी अपनी मां के साथ लाइन में लगा. उसने बताया कि जांच के बाद घर लौट जाएगा और अगले अपॉइंटमेंट पर फिर दिल्ली आएगा.

दिल्ली एम्स में मुझे दो अलग-अलग दुनिया दिखी... जिनके पास पैसे हैं, वे कई बार आ-जा सकते हैं. अपॉइंटमेंट के दिन आते हैं, इलाज कराते हैं और लौट जाते हैं. जिनके पास पैसे नहीं हैं, वो इंतजार करते हैं. सबवे में, फ्लाईओवर के नीचे, फुटपाथों पर.
मैं करीब 50 मीटर दूर उसी अंडरपास में लौटा. इस बार वहां सन्नाटा था, मानो कुछ होने वाला हो.
'इतनी जल्दबाजी में क्यों हैं आपसब', मैंने पूछा.
किसी ने कहा, 'सफाई वाला आने वाला है. सोते रहेंगे तो वो नीचे पानी डाल देंगे.'
इतने में कानों में एक हल्की आवाज पड़ी, लकड़ी की झाड़ू फर्श से रगड़ खा रही थी. आवाज तेज होती गई... मांएं बच्चों को जगाने लगीं. बेटे अपनी मांओं को जमीन से उठाने लगे. पिता उन चीजों को समेटने लगे जिन्हें हम-आप कंबल भी नहीं कह सकते.

करीब आठ साल की एक छोटी बच्ची गहरी नींद में थी. लेकिन झाड़ू की गूंज अब तेज थी. एक महिला ने उसे झकझोरकर जगाया. बच्ची उठी, रोई लेकिन आंखों में आंसू नहीं थे...वो किसी दूसरी महिला की तरफ दौड़ी, शायद उसकी मां थी जिसने उसे बांहों में थाम लिया.
सफाइवाले बिना किसी लाग-लपेट के तेज आवाज में चिल्लाया, 'अपना-अपना तामझाम समेटो और यहां से हटो जल्दी.'
करीब 7 बजे थे. तापमान 7 डिग्री था. AIIMS दिल्ली के कई विभागों के गेट अब भी बंद थे.