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दिल्ली में रोज फेंके जा रहे मास्क कवर कर सकते हैं एक फुटबॉल ग्राउंड

कोरोना वायरस महामारी की वजह से पूरी दुनिया में डिस्पोजेबल मास्क के ढेर लग सकते हैं, जबकि उच्च जनसंख्या घनत्व के कारण भारत में स्थिति और भी खराब हो सकती है.

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यूज्ड मास्क बढ़ा रहे हैं भारत का मेडिकल वेस्ट (प्रतीकात्मक तस्वीर)
यूज्ड मास्क बढ़ा रहे हैं भारत का मेडिकल वेस्ट (प्रतीकात्मक तस्वीर)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • मास्क बनाने में पॉलीप्रोपाइलीन और रबर होती है इस्तेमाल
  • पॉलीप्रोपाइलीन को सड़ने में लगभग 20-30 साल लगते हैं
  • रबर को पूरी तरह से नष्ट होने में 50 साल तक लगते हैं

भारत में कोरोना वैक्सीनेशन ड्राइव आज से शुरू हो रही है. लेकिन कोरोना महामारी का खतरा अभी भी टला नहीं है. अभी भी हमें वही सावधानियां बरतते रहनी हैं जिनकी वजह से हम अभी तक बचे हुए हैं. कोरोना महामारी के दौरान और अभी भी मास्क हमारे सबसे अच्छे दोस्त रहे हैं. लेकिन एक ओर जहां मास्क हमें कीटाणुओं से बचा सकते हैं, तो वहीं दूसरी ओर हमें उन खतरों से कौन बचाएगा जिन्हें हम अपने यूज्ड मास्क को फेंक कर पैदा कर रहे हैं?

कोरोना वायरस महामारी की वजह से पूरी दुनिया में डिस्पोजेबल मास्क के ढेर लग सकते हैं, जबकि उच्च जनसंख्या घनत्व के कारण भारत में स्थिति और भी खराब हो सकती है.

विश्व बैंक के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में हर किलोमीटर में रहने वाले लोगों की संख्या दुनिया भर के अधिकांश देशों की तुलना में कई गुना अधिक है. नतीजतन, मास्क पहनने वाले अधिक लोग मास्क फेंक रहे हैं जो देश के मेडिकल वेस्ट में शामिल हो रहा है.
 
एक सामान्य मास्क बनाने में पॉलीप्रोपाइलीन और रबर का इस्तेमाल होता है. जहां पॉलीप्रोपाइलीन को सड़ने में लगभग 20-30 साल लगते हैं, वहीं रबर को अपना अस्तित्व पूरी तरह से खोने में 50 साल लगते हैं.

एक आम मास्क का आकार '175 मिमी X 95 मिमी' होता है, और अगल-बगल रखे गए 60 मास्क एक वर्ग मीटर के एरिया को कवर करेंगे. इसका मतलब है कि 4.28 लाख मास्क पूरे फुटबॉल मैदान को कवर करेंगे, जिसका क्षेत्रफल लगभग 7,140 वर्ग मीटर होता है.

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वर्ष 2020 में दिल्ली की अनुमानित आबादी को देखते हुए, जो कि यूआईडीएआई के अनुसार 1.87 करोड़ है, अगर राज्य के 100 में से 3 लोग हर 24 घंटे में अपने मास्क को डिस्पोज करते हैं तो यह हर दिन एक फुटबॉल मैदान को कवर कर सकता है.

ग्लोबल पीपीई मार्ट के बोर्ड मेंबर हरजीव सिंह ने इंडिया टुडे से कहा, "मास्क का इस्तेमाल करने वाले केवल स्वास्थ्य कर्मियों की बात करें तो हम अनुमान लगा सकते हैं कि भारत में हर दिन लगभग 20-30 लाख मास्क की खपत हो सकती है."

जब भारत पहले से ही अपने सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम को लेकर संघर्ष कर रहा है, ऐसे में यूज्ड मास्क से पैदा हो रहे मेडिकल वेस्ट का निपटान भी एक समस्या बनता जा रहा है, जो चिंताओं को बढ़ाने वाला हो.

वर्ल्ड बैंक ने भी एक स्टडी में कहा है, "भारत जैसे देश को, अपने उच्च आर्थिक विकास और तीव्र शहरीकरण के साथ, शहरी कचरे के कुप्रबंधन से संबंधित समस्याओं के तत्काल समाधान की आवश्यकता है."

ठोस कचरे (सॉलिड वेस्ट) पर बढ़ती चिंताओं के पीछे प्रमुख वजह यह है कि वर्तमान में इसका ज्यादातर हिस्सा डंप किया जाता है, बजाय इसके कि इसका सही तरीके से निपटान किया जाए. इसके अलावा मास्क का निपटान गैर-बायोडिग्रेडेबल कचरे में जोड़ा जा रहा है क्योंकि सर्जिकल या गैर-सर्जिकल मास्क बनाने के लिए कई प्रकार की सामग्रियों का उपयोग किया जाता है.

(इनपुट: सम्राट शर्मा)

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