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बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जब कांग्रेस की सरकार ने बजरंग दल पर लगाया था बैन...

बजरंग दल ने राम मंदिर आंदोलन के दौरान उग्र और सक्रिय भूमिका निभाई. बजरंग दल के संस्थापक रहे विनय कटियार ने अयोध्या में कारसेवकों को संगठित करने, राम मंदिर आंदोलन की रूप रेखा तैयार करने में अहम भूमिका निभाई थी. 1992 में बाबरी मस्जिद के ढहने के बाद केंद्र की तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार ने बजरंग दल समेत 5 संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया था.

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राम मंदिर आंदोलन में बजरंग दल की अहम भूमिका रही.
राम मंदिर आंदोलन में बजरंग दल की अहम भूमिका रही.

कांग्रेस ने जिस बजरंग दल को कर्नाटक में बैन करने का वादा किया है, उस संगठन पर आज से 31 साल पहले भी कांग्रेस बैन लगा चुकी है. ये बात 1992 की है. देश में राम मंदिर आंदोलन चल रहा था. 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में उन्मादी भीड़ ने बाबरी मस्जिद ढहा दिया था. इसके बाद कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार एक्शन में आई और एक साथ 5 संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया. ये संगठन थे- राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS), विश्व हिन्दू परिषद (VHP), बजरंग दल, इस्लामिक सेवक संघ, और जमात-ए-इस्लामी हिंद. 

नरसिम्हा राव सरकार ने 9 दिसंबर 1992 की रात को एक गजट जारीकर Unlawful Activities (Prevention) Act, 1967 के तहत इन पांच संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया था. हालांकि तब साम्प्रदायिक उन्माद की स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार ने इस संगठनों के किसी बड़े नेता की गिरफ्तारी नहीं की थी. 

नरसिम्हा राव सरकार की गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), विश्व हिन्दू परिषद (VHP) और बजरंग दल पर आरोप लगाया था कि इन संगठनों का बाबरी मस्जिद विध्वंस में सक्रिय रोल था, और ये संगठन देश में साम्प्रदायिक उन्माद फैला रहे थे. इसलिए इनकी गतिविधियों को नियंत्रित करना जरूरी था. 

बता दें कि 1984 में बजरंग दल ने राम मंदिर आंदोलन के दौरान इस मुद्दे पर उग्र और सक्रिय भूमिका निभाई. बजरंग दल के संस्थापक रहे विनय कटियार ने अयोध्या में कारसेवकों को संगठित करने, राम मंदिर आंदोलन की रूप रेखा तैयार करने में अहम भूमिका निभाई थी. बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने रामजन्मभूमि जन्मभूमि आंदोलन को आक्रामक बनाया और इसे हिन्दुओं की सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर पेश किया. 

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जानें- उस बजरंग दल की कहानी जिसे बैन करने का वादा कर रही है कांग्रेस

1992 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने बजरंग दल समेत 4 संगठनों पर प्रतिबंध तो लगा दिया लेकिन सरकार इसे सख्ती से लागू करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई. इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार बैन के बाद भी संगठन सक्रिय रहा और देश के अलग अलग हिस्सों में दूसरे नामों से सक्रिय रहा. इस संगठन के नेता भी ज्यादार आजाद रहे. सरकार ने उन पर सख्ती करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. 

प्रतिबंध के बाद क्या होता है?

जब सरकार किसी सगंठन को प्रतिबंधित करती है तो कानून के अनुसार इस प्रतिबंध की अधिसूचना जारी होने के 30 दिन के अंदर इस मुद्दे को एक कोर्ट/ट्रिब्यूनल को भेजना होता है. इसके बाद कोर्ट संबंधित संगठन को नोटिस जारी कर पूछती है कि क्यों न उसे प्रतिबंधित कर कर दिया जाए. इस संगठन को इसका जवाब देने के लिए 30 दिनों का समय मिलता है. प्रतिबंधित संगठन से जवाब मिलने के 6 महीने के अंदर इस कोर्ट को ये तय करना होता है कि प्रतिबंध जारी रखा जाए अथवा रद्द कर दिया जाए. इस मामले की सुनवाई हाई कोर्ट के जज करते हैं. 

1992 में बजरंग दल पर लगे प्रतिबंध के मामले में Unlawful Activities (Prevention) ट्रिब्यूनल ने 6 महीने में आरएसएस और बजरंग दल से प्रतिबंध हटा लिया. लेकिन VHP पर प्रतिबंध जारी रहा. हालांकि प्रतिबंध हटाने पर कई लोगों ने तब सवाल उठाए थे. 

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बजरंग दल के इतिहास पर नजर डालें तो इसकी स्थापना करीब 39 साल पहले हुई थी. विश्व हिन्दू परिषद की वेबसाइट के अनुसार अक्टूबर 1984 में वीएचपी की ओर से श्रीराम जानकी रथ यात्रा निकाली गई थी. जब अयोध्या से ये यात्रा प्रस्थान कर रही थी तो यूपी की तत्कालीन सरकार ने यात्रा को सुरक्षा देने से मना कर दिया.

तब यात्रा में मौजूद संतों ने युवाओं से आह्वान किया कि वे इस रथ यात्रा की जिम्मेदारी संभालें. संतों ने कहा कि जिस तरह से श्रीराम के कार्य के लिए हनुमान सदा उपस्थित रहते थे उसी तरह आज के युग में श्रीराम के कार्य के लिए बजरंगियों की टोली मौजूद रहे. इसी संकल्प के साथ 8 अक्टूबर 1984 को बजरंग दल की स्थापना हुई. विनय कटियार को बजरंग दल का संस्थापक माना जाता है.

 

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