महाराष्ट्र में एक विधायक का एक ऑडियो क्लिप वायरल हुआ है जिसमें वो एक किताब के पब्लिशर को गाली देते हुए धमकी दे रहे हैं. शिवसेना के विधायक संजय गायकवाड़ ने 'शिवाजी कोन होता' नाम की किताब के पब्लिशर प्रशांत अंबी को धमकी दी.
उनका कहना है कि ये किताब छत्रपति शिवाजी महाराज का अपमान करती है. इस मामले पर कांग्रेस ने इसे 'खुली गुंडागर्दी' बताया और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से जांच की मांग की है.
शिवसेना के विधायक संजय गायकवाड़ महाराष्ट्र के बुलढाणा से विधायक हैं. उनकी पत्नी को मंगलवार को ये किताब मिली. जब गायकवाड़ ने इसे पढ़ा तो उन्हें लगा कि इसमें शिवाजी महाराज का अपमान किया गया है और उनके इतिहास को गलत तरीके से दिखाया गया है.
इसके बाद उन्होंने किताब के पब्लिशर प्रशांत अंबी को फोन किया. उस बातचीत का एक ऑडियो क्लिप वायरल हो गया. उसमें गायकवाड़ अंबी को गालियां देते और धमकियां देते सुनाई दे रहे हैं.
ऑडियो में क्या कहा गायकवाड़ ने?
वायरल ऑडियो में गायकवाड़ कहते सुनाई देते हैं कि अंबी की जुबान खींच लेनी चाहिए. उन्होंने कहा कि शिवाजी महाराज का अपमान करने वाली इस किताब को नष्ट कर देना चाहिए और ऐसी किताबें पढ़ना भी नहीं चाहिए. उन्होंने ये भी कहा कि अंबी घमंडी है और उसने उनसे बदतमीजी की.
गायकवाड़ ने ऑडियो पर क्या कहा?
जब ऑडियो वायरल हुआ तो गायकवाड़ ने माना कि ये उनकी ही आवाज है. लेकिन उन्होंने दावा किया कि ऑडियो में कुछ शब्दों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है.
कांग्रेस ने क्या आरोप लगाया?
महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रवक्ता हर्षवर्धन सपकाल ने कहा कि गायकवाड़ बार-बार इस तरह की हरकतें करते हैं. उन्होंने पुराने मामले भी गिनाए: पहला, पिछले साल MLA हॉस्टल की कैंटीन में एक स्टाफ को थप्पड़ मारा था.
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दूसरा, पुलिस कर्मियों से अपनी गाड़ी धुलवाने का आरोप है. तीसरा, 2024 में उन्होंने दावा किया था कि उन्होंने 1987 में एक बाघ का शिकार किया था और उसके दांत की माला गले में पहनकर दिखाई थी.
सपकाल ने कहा कि जो नेता खुद को शिवाजी महाराज का वंशज बताता है, उसने जो भाषा इस्तेमाल की वो किसी जनप्रतिनिधि को शोभा नहीं देती. उन्होंने कहा कि ऐसे इंसान को शिवाजी महाराज का नाम लेने का भी हक नहीं है.
किताब कौन सी है और किसने लिखी?
'शिवाजी कोन होता' यानी 'शिवाजी कौन था' एक छोटी सी जीवनी है जो छत्रपति शिवाजी महाराज पर लिखी गई है. इसे लिखा था कम्युनिस्ट नेता गोविंद पानसरे ने. ये किताब पहली बार 1988 में छपी थी. इसे प्रशांत अंबी के प्रकाशन 'लोकवाङ्मय गृह' ने छापा था. तब से ये किताब कई बार दोबारा छप चुकी है. गोविंद पानसरे की 2015 में हत्या कर दी गई थी. उन पर कथित तौर पर दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं ने हमला किया था.
इनपुट: पीटीआई