मुंबई महानगरपालिका चुनाव से ठीक पहले आजतक के मुंबई मंथन मंच पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के नेता बाला नांदगांवकर और शिवसेना (UBT) के वरिष्ठ नेता अनिल परब ने साफ कर दिया कि मुंबई की लड़ाई सिर्फ चुनाव की नहीं, बल्कि मराठी अस्मिता, हिंदुत्व की परिभाषा और विकास की राजनीति की है. सेशन में ठाकरे बंधुओं की एकजुटता, बीजेपी के हिंदुत्व, कॉर्पोरेशन वॉर और मुंबई की सत्ता को लेकर पहली बार और सीधे-सीधे कई बातें सामने आईं.
मैं ये चाहता था दोनों पुत्र साथ आएं
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेता बाला नांदगांवकर ने साफ कहा कि उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का साथ आना कोई राजनीतिक सौदा नहीं, बल्कि मराठी जनता की वर्षों पुरानी भावना थी. नांदगांवकर ने कहा, 'दोनों भाई, दोनों परिवार और बाला साहेब के दोनों पुत्र एक साथ आएं, यही मेरी दिली ख्वाहिश थी. इसमें मेरा कोई निजी स्वार्थ नहीं था.'
उद्धव ठाकरे से रिश्तों पर पूछे गए सवाल पर बाला नांदगांवकर ने कहा कि उन्होंने मुझे मान सम्मान, प्रतिष्ठा दी है. उसके बाद गले लगाने की औपचारिकता जरूरी नहीं रह जाती. उन्होंने ये भी साफ किया कि ठाकरे परिवार का साथ आना महाराष्ट्र की जनता भी चाहती थी और अब इस पर किसी तरह की असहजता नहीं है.
'ठाकरे ब्रांड को कोई खतरे में नहीं डाल सकता'
मुंबई मंथन के सेशन ‘ठाकरे के नाम पर’ में शिवसेना (UBT) के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री अनिल परब ने ठाकरे परिवार और शिवसेना की राजनीतिक जड़ों को लेकर दो टूक बात रखी. मुख्यमंत्री के उस बयान पर कि बाला साहेब ठाकरे के बाद कोई ब्रांड नहीं बना, परब ने कहा कि अगर ऐसा होता तो आज भी महाराष्ट्र में बिना ठाकरे नाम के वोट मांगे जा सकते थे.
अनिल परब ने तर्क दिया कि देश की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करने वाली बीजेपी को भी महाराष्ट्र में आज तक बाला साहेब ठाकरे की तस्वीर और नाम के बिना चुनावी जमीन नहीं मिली. उनके मुताबिक अगर मिस्ड कॉल से पार्टी बन जाती तो नाम और चेहरा चलाने की जरूरत ही नहीं पड़ती.
ठाकरे सरनेम के प्रभाव पर सवाल उठाने वालों को जवाब देते हुए परब ने कहा कि कोई भी पार्टी एक-दो चुनाव जीत सकती है, लेकिन लगातार जनता का भरोसा मिलना ब्रांड की मजबूती का सबूत होता है. मुंबई में दशकों तक शिवसेना को मिले समर्थन को उन्होंने इसी भरोसे का नतीजा बताया.
राजनीतिक दबाव और ऑफर पर खुली बात
राजनीतिक दबाव और ऑफर के सवाल पर अनिल परब ने दो टूक कहा कि मेरे ऊपर कई केस हैं. ऐसे लोगों को ऑफर नहीं दिए जाते. उन्हें पता है कि मुझे ऑफर देकर कोई फायदा नहीं होगा. ये बयान उस आरोप के जवाब में था कि विपक्षी नेताओं को तोड़ने के लिए दबाव और एजेंसियों का इस्तेमाल हो रहा है.
हिंदुत्व पर सीधी लकीर-'बीजेपी का नहीं, बाला साहेब का हिंदुत्व'
मुख्यमंत्री के बयान 'मुंबई का मेयर हिंदू और मराठी होगा' पर प्रतिक्रिया देते हुए नांदगांवकर ने कहा कि बाला साहेब जी ने हमें सिखाया है. हिंदुत्व का पाठ बीजेपी को बाला साहेब ठाकरे ने पढ़ाया था. तब तक उन्हें पता नहीं था कि हिंंदू के नाम पर वोट मिल सकता है. अनिल परब ने भी साफ किया कि हमने बीजेपी छोड़ी है, हिंदुत्व नहीं. उनके मुताबिक हिंदुत्व कोई नफरत नहीं, बल्कि जीवनशैली है जिसे सुप्रीम कोर्ट भी परिभाषित कर चुका है. हम लोग बाला साहेब का हिंदुत्व मानते हैं जिसमें देश से प्रेम करना सिखाया जाता है.
‘मुंबई ने रिक्शावाले से नेता बनाए’
मुंबई की सामाजिक और राजनीतिक बनावट पर बोलते हुए नांदगांवकर ने कहा कि ठाकरे परिवार ने 10×10 के कमरे में रहने वाले, रिक्शा चलाने वाले लोगों को नेता बनाया. उनका कहना था कि मराठी आदमी की सत्ता पहले भी थी, आज भी है और आगे भी रहेगी. मराठी अस्मिता पर सवाल उठाने वालों को जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रदेश में रहते हैं, उस पर गर्व करना गलत नहीं है. उन्होंने याद दिलाया कि देश का पुनर्गठन ही पहचान के आधार पर हुआ, फिर सवाल सिर्फ महाराष्ट्र से ही क्यों?
साथ ही उन्होंने पोस्टल रोड का जिक्र करते हुए कहा कि ये उद्धव ठाकरे की संकल्पना थी, बीएमसी के पैसों से, बिना टोल के बनी. मुंबई में बड़ी संख्या में उम्मीदवारों के निर्विरोध चुने जाने पर सवाल उठाते हुए नांदगांवकर ने कहा कि नोटा का विकल्प होते हुए भी ऐसा होना लोकतंत्र पर सवाल खड़े करता है. उनका आरोप था कि कई जगह पैसा, दबाव और डर का माहौल बनाया गया.
‘महापौर मराठी ही होगा’
मुंबई की सत्ता को लेकर अनिल परब ने ने पूरा भरोसा जताया. उन्होंने कहा कि मुंबई का महापौर मराठी ही होगा. जितने नंबर चाहिए, उतने आएंगे. उन्होंने कहा कि शिवसेना और मनसे मुंबई की लोकल पार्टियां हैं और मुंबई उनके लिए सिर्फ सत्ता नहीं, मां समान है.