मुंबई के बांद्रा टर्मिनस के पास एक बस्ती है गरीब नगर. मई की इस चिलचिलाती गर्मी के बीच यहां रेलवे की बुलडोजर कार्रवाई ने लोगों की जिंदगी उलट-पुलट कर दी है. रेलवे ट्रैक के पास बने कई घरों को तोड़ दिया गया है. अब यहां रहने वाले कई परिवार सड़क के किनारे अपना सामान समेटे बेबसी में बैठे हैं. इस तपती धूप में उनके चेहरों पर सबसे ज्यादा चिंता आने वाले दिनों की दिख रही है. चारों तरफ फैले मलबे के बीच बेबसी में बैठी महिलाओं का गुस्सा और दर्द यहां साफ देखा जा सकता है. महलिओं नाराजगी जताते हुए सीधे कहा कहा, 'यह सरकार गरीबी दूर करने का दावा तो करती है, लेकिन यहां असलियत में गरीबी नहीं, बल्कि गरीबों को ही हटाया जा रहा है'. बेघर हुए इन लोगों की आंखों में अपने आशियाने के उजड़ने का दर्द और भविष्य का खौफ साफ दिख रहे हैं. कोई 40 साल की यादें समेटकर सड़क किनारे रो रहा है, तो किसी को आने वाले मानसून की चिंता खाए जा रही है.
70 साल से ज्यादा उम्र के मोहम्मद हनीफ सड़क किनारे अपनी चटाई, फ्रिज और घर से जैसे-तैसे बचाया गया सामान संभालते दिखाई दिए. इस झुलसाने वाली धूप से बचने के लिए उनके बेटे और बहू एक छाता ताने सामान की रखवाली में खड़े हैं. हनीफ बताते हैं कि उनका घर उन 100 घरों में से एक था, जिन्हें हाई कोर्ट से सुरक्षा मिली हुई थी. उनके घर को पूरी तरह ढहाया तो नहीं गया, लेकिन इस कार्रवाई में बुरी तरह क्षतिग्रस्त यानी डैमेज हो गया है. बेबसी के इस माहौल में हनीफ को पुराने दिन याद आते हैं. वह बताते हैं कि एक जमाना था, जब यहां बुलडोजर आया था, तो हमारे तत्कालीन सांसद सुनील दत्त साहब इसके आगे लेट गए थे. उन्होंने कहा था कि अगर गरीब नगर को तोड़ना है, तो बुलडोजर को पहले मेरी लाश के ऊपर से ले जाना होगा. तब हमारा आशियाना उजड़ने से बच गया था.
हनीफ की तरह ही रेलवे फुटओवर ब्रिज पर रूमाल बेचने वाली एक बुजुर्ग महिला का दर्द भी कम नहीं है. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इसी गरीब नगर में बिताई है. यहीं उनके पति का साथ छूटा और यहीं उनके बच्चों ने अपने परिवार बसाए. अब इस बुढ़ापे में उन्हें समझ नहीं आ रहा कि सिर छिपाने के लिए कहां जाएं. वे कहती हैं कि अगर आज सुनील दत्त या उनकी बेटी प्रिया दत्त यहां होतीं, तो शायद उनके घर बच जाते. वहीं मलबे के पास बैठी कई महिलाओं ने नाराजगी जताते हुए सीधे कहा, 'यह सरकार गरीबी नहीं, बल्कि गरीबों को ही हटा रही है.'
तपती धूप में उजड़े आशियाने, लेकिन रेलवे की भी है अपनी बड़ी वजह
भीषण गर्मी में लोग फुटओवर ब्रिज के नीचे थोड़ी-सी छांव तलाशते नजर आ रहे हैं, लेकिन लोगों का कहना है कि पुलिस की टीमें उन्हें वहां से भी हटने के लिए कह रही हैं. इन परिवारों को अपना सामान निकालने के लिए सिर्फ 24 घंटे का समय दिया गया था. अब कई लोग टूटे हुए टीन और लोहे के टुकड़े इकट्ठा कर रहे हैं, ताकि उन्हें कबाड़ में बेचकर कुछ पैसे जुटाए जा सकें.
दूसरी तरफ, रेलवे का कहना है कि यह कार्रवाई बेहद जरूरी थी. दरअसल, गरीब नगर का बड़ा हिस्सा करीब 1.31 एकड़ रेलवे की जमीन पर बसा था. पश्चिम रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (CPRO) विनीत अभिषेक के मुताबिक, फिलहाल बांद्रा टर्मिनस से करीब 50 ट्रेनें चलती हैं, लेकिन यात्रियों की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए यहां से 50 और नई ट्रेनों को चलाने की सख्त जरूरत है. इसके लिए स्टेशन का विस्तार करना जरूरी है. रेलवे का यह भी कहना है कि यह बस्ती रेलवे ट्रैक और हाई-वोल्टेज बिजली के तारों के खतरनाक रूप से करीब पहुंच गई थी, जिससे हर समय हादसे का खतरा बना रहता था. कई सालों की कानूनी प्रक्रिया के बाद यह कार्रवाई की गई है. अब रेलवे की योजना 23 मई तक इस पूरे इलाके की घेराबंदी करने की है, ताकि दोबारा यहां कोई कब्जा न हो सके.