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उद्धव सरकार नहीं बची तो ठाकरे की 'ठाठ' ही नहीं पवार का 'पावर' भी पड़ेगी कमजोर

महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद उद्धव ठाकरे की कुर्सी पर खतरा मंडराने लगा है. ऐसे में महाविकास आघाड़ी सरकार को बचाने के लिए एनसीपी प्रमुख शरद पवार एक्टिव हो गए हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि उद्वव ठाकरे सत्ता से बाहर होते हैं तो उनकी पार्टी एनसीपी को भी बेदखल होना होगा. ऐसे में ठाकरे के साथ-साथ शरद पवार की राजनीतिक पावर भी कमजोर पड़ेगी?

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शरद पवार और उद्धव ठाकरे शरद पवार और उद्धव ठाकरे
स्टोरी हाइलाइट्स
  • केवल उद्धव की कुर्सी पर ही नहीं पार्टी पर भी खतरा है
  • उद्धव की सरकार को बचाने उतरे एनसीपी प्रमुख
  • उद्धव ठाकरे से ज्यादा शरद पवार की साख दांव पर

महाराष्ट्र में चार दिनों से चल रहा सियासी संकट दिन-ब-दिन उलझता ही जा रहा है. एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद उद्धव ठाकरे सरकार की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. उद्धव के सामने सिर्फ सरकार ही नहीं अपनी पार्टी बचाने की भी चुनौती है, क्योंकि बागी एकनाथ शिंदे ने शिवसेना पर ही दावा ठोक दिया है. वहीं, महाराष्ट्र की सरकार को बचाने के लिए एनसीपी चीफ शरद पवार भी उतर गए हैं, क्योंकि उद्धव सरकार नहीं बची तो ठाकरे परिवार की 'ठाठ' ही नहीं बल्कि पवार का 'पावर' भी कमजोर पड़ेगा?   

एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे के बीच शह-मात का खेल जारी है. गुवाहाटी में मौजूद शिवसेना के बागी विधायकों ने बैठक कर एकनाथ शिंदे को अपना नेता चुन लिया है. इसके बाद बागी गुट के विधायकों के हस्ताक्षर वाला पत्र डिप्टी स्पीकर नरहरि जिरवाल और राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को भेज दिया है. वहीं, मुंबई में उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना की बैठक में मौजूद न रहने वाले 12 विधायकों की सदस्यता रद्द कराने के लिए डिप्टी स्पीकर से गुहार लगाई गई है.

महाराष्ट्र के मौजूदा सियासी घमासान के बीच उद्धव सरकार को बचाने के लिए अब एनसीपी प्रमुख शरद पवार शक्रिय हो गए हैं. पवार ने गुरुवार को पहले एनसीपी विधायकों की बैठक की और उसके बाद उन्होंने मीडिया से आकर कहा कि बागी विधायकों को कीमत चुकानी पड़ेगी. हम सरकार को बचाने की हरसंभव कोशिश करेंगे. उन्होंने कहा कि जहां तक बात रही बहुमत की तो बहुमत का फैसला विधानसभा में होगा. उन्होंने कहा कि जब फ्लोर टेस्ट होगा तो पता चल जाएगा कि हमारे पास बहुमत है.

बता दें कि महाराष्ट्र सरकार बचाने का जिम्मा जितना शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के लिए अहम है, उससे कम शरद पवार के लिए नहीं है. साल 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद शिवसेना ने बीजेपी से नाता तोड़कर अपने वैचारिक विरोधी कांग्रेस और एनमसीपी के साथ हाथ मिलाया था. उद्धव की ताजपोशी की तैयारी चल ही रही थी कि बीजेपी ने एनसीपी नेता अजित पवार को साथ मिलाकर देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली थी. ऐसे में शरद पवार ने मोर्चा संभाला और चार दिन में सारा सियासी खेल पलट दिया, जिसके चलते फडणवीस को फ्लोर टेस्ट से पहले ही इस्तीफा देना पड़ गया. 

एनसीपी प्रमुख शरद पवार ही ऐसे नेता थे, जिन्हें महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार बनाने के लिए शिल्पकार के रूप में  देखा जाता है. विचारधारा के दो विपरीत छोर पर खड़ी पार्टियां साथ आईं और 28 नवंबर 2019 में उद्धव ठाकरे. मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर महाराष्ट्र की राजनीति में खास असर रखने वाले ठाकरे परिवार के संवैधानिक पद पर बैठने वाले वे पहले व्यक्ति बने थे. 

उद्धव ठाकरे का मुख्यमंत्री बनना महाराष्ट्र की राजनीति की ऐतिहासिक घटना थी. हालांकि, उद्धव भले ही मुख्यमंत्री बन गए थे, लेकिन महा विकास अघाड़ी सरकार की सत्ता की चाबी शरद पवार ने अपने हाथों में ही रखी. उद्धव सरकार के मलाइदार मंत्रालय और गृह जैसा भारी भरकम विभाग भी एनसीपी ने अपने पास रखा. उद्धव ठाकरे अपने स्वास्थ्य की वजह से भी खुद को सीमित रखते हैं, लेकिन शरद पवार सक्रिय रहे. ऐसे में कई बार आरोप लगे कि शरद पवार रिमोट कन्ट्रोल से उद्धव सरकार को चला रहे हैं. 

वहीं, ढाई साल के बाद बुधवार को एनसीपी नेता शरद पवार जिस समय मुख्यमंत्री आवास वर्षा में थे उसी वक्त उद्धव ठाकरे की पत्नी रश्मि ठाकरे सीएम आवास को खाली कर मातोश्री जाने की तैयारी कर रही थी. इसी दौरान उद्धव को पवार ने एक सलाह दी कि राज्यपाल भरत सिंह कोश्यारी को सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी को सरकार बनाने के आमंत्रित करने का मौका देने के लिए सीएम पद से इस्तीफा न दें. 

वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवाई कहते हैं कि शरद पवार को सत्ता की राजनीति में हमेशा से आशावादी और माहिर खिलाड़ी के तौर पर देखा जाता रहा है. एक बार नरसिम्हा राव ने उनसे मजाक में पूछा कि टू प्लस टू जुड़कर कैसे पांच हो जाएगी. इस पर पवार ने तुरंत जवाब देते हुए कहा कि 'यह निर्भर करता है कि आप खरीद रहे हैं या बेच रहे हैं.' पवार का यह जवाब बताता है कि कैसे वो सियासत के मंझे हुए खिलाड़ी हैं. साल 2019 में शरद पवार महाराष्ट्र में सरकार बनाने के शह-मात के खेल में बीजेपी को सियासी मात दे चुके हैं, लेकिन इस बार चुनौती काफी बड़ी है. 

वह कहते हैं कि शरद पवार के लिए भी उतना ही अहम है महा विकास अघाड़ी सरकार को बचाना, जितनी उद्धव ठाकरे के लिए. इसीलिए शिवसेना विधायकों की बगावत के बाद कांग्रेस नेता कमलनाथ से लेकर शरद पवार तक एक्टिव हो गए. उद्धव ठाकरे को कमलनाथ ने फोन कर साथ खड़े होने का भरोसा दिया तो पवार ने उन्हें सीएम पद से इस्तीफा देने से रोका और अब विधानसभा में अपनी-अपनी ताकत दिखाने का ऐलान कर सियासी दांव चला है. 

शरद पवार ने कहा कि एकनाथ शिंदे के बयान से साफ है कि उनके पीछे कौन है. जहां तक उद्धव सरकार के बहुमत की बात है तो बहुमत का फैसला विधानसभा में होगा. उन्होंने कहा कि जब फ्लोर टेस्ट होगा तो पता चल जाएगा कि हमारे पास बहुमत है. साथ ही शरद पवार ने कहा कि मुझे यकीन है कि जब विधायक मुंबई लौट आएंगे तो स्थिति दूसरी होगी. इससे साफ जाहिर होता है कि पवार यह मानकर चल रहे हैं कि शिवसेना के बागी विधायकों को मुंबई लौटने पर साध लेंगे. 

हालांकि, शिवसेना विधायकों की बगावत के बाद सभी की नजर डिप्टी स्पीकर नरहरि जिरवाल पर है. जिरवाल एनसीपी के विधायक हैं. ऐसे में आने वाले समय में डिप्टी स्पीकर संभवत महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार को गिरने से बचाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. जिरवाल ने गुरुवार 23 जून को बागी विधायक एकनाथ शिंदे की जगह अजय चौधरी को सदन में शिवसेना के नेता के रूप में नियुक्त करने की मंजूरी दे दी है.

दरअसल, शरद पवार इस बात को बखूबी तरीके से जानते हैं कि उद्धव ठाकरे अगर सत्ता से बेदखल होते हैं तो एनसीपी को भी सरकार से बाहर होना पड़ेगा. पांच साल के बाद 2019 में उनकी पार्टी महाराष्ट्र की सत्ता में भागेदार बनी है और केंद्र की सरकार से आठ साल से एनसीपी बाहर है. मौजूदा समय में एनसीपी के दो बड़े नेता अलग-अलग मामलों में जेल में हैं, जिनमें से एक नवाब मलिक तो राज्य में मंत्री हैं और दूसरे अनिल देशमुख हैं, जो उद्धव सरकार के गृहमंत्री थे. वहीं. एनसीपी नेता व राज्य के परिवहन मंत्री अनिल परब भी केंद्रीय जांच एजेंसियों के रडार पर है.  

महाराष्ट्र की सत्ता से उद्धव ठाकरे बाहर होते हैं तो एनसीपी को भी सत्ता से बेदखल होना होगा. ऐसी स्थिति में शरद पवार के लिए राजनीतिक चुनौतियां खड़ी हो जाएंगी. यही नहीं जांच एजेंसियों के घेरे में आए एनसीपी नेताओं की मुसीबतें और भी ज्यादा बढ़ सकती है. ऐसे में शिवेसना के बागी एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव भी एनसीपी प्रमुख शरद पवार के दिमाग की उपज मानी जा रही है. इसके बावजूद महाराष्ट्र की उद्धव सरकार नहीं बचती है तो ठाकरे के कद और स्थिति कमजोर होगा ही और साथ शरद पवार की राजनीतिक पावर को भी कम करेगा? 


 

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