मुंबई के सबसे बड़े त्योहारों में से एक गणेश उत्सव का इस साल कोरोना वायरस महामारी और लॉकडाउन से प्रभावित होना तय है. मूर्ति बनाने वालों से लेकर गणेश मंडलों तक हर एक की इच्छा है कि इस साल भी उन्हें उत्सव मनाने का मौका मिले. लेकिन वो सभी ये भी जानते हैं कि महामारी के जल्दी खत्म होने के कोई आसार नजर नहीं आते. इसलिए खराब से खराब स्थिति के लिए वो तैयार रहने की बात करते हैं.
कोई पक्के तौर पर ये नहीं जानता कि इस साल गणेश उत्सव के दौरान क्या होगा? कैसे हालात होंगे? अहम समस्या कच्चे माल का नहीं मिलना और मजदूरों की गैर मौजूदगी है. हर साल अब तक वर्कशॉप में मूर्तियों का बनना शुरू हो जाता था. लेकिन इस साल मूर्ति निर्माताओं को मूर्तियां बनाने के लिए अभी जमीन मिलना बाकी है.
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ऐसा इसलिए है क्योंकि छोटे खुले मैदानों का इस्तेमाल भी कोविड-19 फैसिलिटी बनाने के लिए किया जा रहा है. इस वक्त मुंबई के सरकारी अधिकारियों के लिए महामारी की रोकथाम ही सर्वोच्च प्राथमिकता है. मूर्ति निर्माता अब इको फ्रेंडली और छोटे गणपति की मूर्तियां बनाने पर जोर दे रहे हैं.ऐसा इसलिए है क्योंकि छोटी मूर्तियां बनाने में कम मजदूरों की जरूरत होगी और सोशल डिस्टेंसिंग का भी पालन किया जा सकेगा. भव्य मूर्तियों के लिए बड़ी संख्या में मजदूरों को एक साथ काम करना पड़ता है. इसके अलावा पर्यावरण के अनुकूल मूर्ति बनाने पर जोर है ताकि उन्हें घर या बिल्डिंग परिसर में ही विसर्जित किया जा सके.
कच्चा माल उपलब्ध नहीं
मुंबई में गणपति के सबसे बड़े मूर्ति निर्माताओं में खाटू परिवार को माना जाता है. इसके मुखिया विजय खाटू के निधन के बाद उनकी बेटी रेशमा सब काम देखती हैं. साल के इस वक्त तक मुंबई में बड़े गणपति मंडलों के डिजाइन, आकार और ऊंचाई फाइनल हो जाते थे. गणपति मूर्तियों के लिए दो सबसे महत्वपूर्ण कच्चे माल प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) और कोइर (नारियल की जटा) हैं. पीओपी राजस्थान से आता है जबकि केरल से कोइर आता है. कच्चा माल बिल्कुल भी उपलब्ध नहीं है.
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रेशमा खाटू ने आजतक/इंडिया टुडे को बताया, '21 अगस्त गणपति उत्सव का पहला दिन है. समय भाग रहा है, अब तक हम असल में मूर्तियां बनाना शुरू कर देते थे, लेकिन इस बार ऑर्डर तो भूल जाइए, हमें मूर्तियां बनाने के लिए जमीन तक नहीं मिली है. हमारे पास कच्चा माल नहीं है. कच्चा माल अन्य राज्यों से आता है. उसका भी इंतजाम कर लिया जाए तो मजदूर कहां से मिलेंगे. 50 फीसदी से ज्यादा मजदूर वापस चले गए हैं.'
'गणेश उत्सव पर पड़ सकता है लॉकडाउन का असर'
उन्होंने बताया, 'एक और अहम बात यह है कि हम अधिक इंतजार नहीं कर सकते हैं, सरकार या मंडलों की तरफ से कोई फैसला नहीं लिया गया है. यह हमारा सीजनल व्यवसाय है और पूरे साल इस का इंतजार करते हैं. बहुत से लोग इस त्योहार पर निर्भर हैं. हालांकि, हम मजदूरों को भी जोखिम में नहीं डाल सकते हैं. इसलिए जैसे गणपति भगवान बुद्धि और सिद्धि के देवता हैं, हमें चाहिए कि इस साल छोटी गणेश मूर्तियों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जाए.'
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रेशमा खाटू का कहना है, 'बड़े गणपति आकर्षक होते हैं. उन्हें आप अकेले नहीं पकड़ सकते, इसके लिए लोगों के घर से बाहर निकलने की आवश्यकता होगी. ऐसे में हमें समझदार होना होगा और घरों के अंदर ही रहना होगा. अगर इस साल हम घर में त्योहार मनाते हैं तो अगले साल सब सही होने पर भव्य स्तर पर गणपति उत्सव मनाएंगे. छोटी और इको फ्रेंडली गणेश मूर्तियों से स्थानीय कलाकारों को भी प्रोत्साहन मिलेगा. हमें यह समझना होगा कि इस साल हम गणपति उत्सव मनाने सड़क पर नहीं आ सकते.'
माटुंगा वर्कशॉप
माटुंगा में गणपति मूर्ति की एक वर्कशॉप में पहुंचने पर हमने देखा कि यहां गणपति की मूर्तियां कागज से बनाई जाती हैं. ये गणपति मूर्तियां इतने कम वजन की हैं कि अकेला व्यक्ति ही उन्हें उठा सकता है. इसका मतलब लोगों की भीड़ की जरूरत नहीं और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जा सकता है. साथ ही इनका विसर्जन भवन परिसर या आसपास ही किया जा सकता है. मूर्ति निर्माता सागर चितले ने इस साल कागज की गणपति मूर्तियां बनाने पर जोर दे रहे हैं.
चितले ने कहा, 'बड़ी वर्कशॉप्स के मालिकों को भारी नुकसान होगा क्योंकि मजदूर उपलब्ध नहीं हैं. कागज के गणपति समाधान है, कम वजन के हैं. कुछ समय के लिए मैं अपने मजदूरों को नहीं बुला रहा हूं. हालांकि स्थानीय मजदूर ही मिल सकते हैं. लेकिन कुछ दिनों में मुझे उन्हें फोन करना होगा.'
गणेश प्रतिमा
‘मुंबइचा राजा’ नाम से पहचाने जाने वाले गणेश गली गणपति अपनी भव्य सजावट और 22 फीट ऊंची गणपति की मूर्तियों के लिए बहुत प्रसिद्ध है. ये मंडल भारत के प्रसिद्ध मंदिरों की प्रतिकृति बनाता है. पिछले साल विशाल अयोध्या मंदिर बनाया गया था. यहां इस समय तक तैयारी शुरू हो जाती है लेकिन इस साल मंडल ने त्योहार मनाने के बारे में अभी सोचा भी नहीं है. इस साल मंडल लोगों से कोई दान नहीं लेने जा रहा. मंडल का मानना है कि लॉकडाउन के कारण लोगों पर पहले ही आर्थिक बोझ है, इसलिए वे दान नहीं मांगेंगे.
मंडल के सेक्रेटरी स्वप्निल परब ने कहा, 'कोरोना वायरस के कारण, इस साल गणपति उत्सव बहुत मुश्किल लग रहा है. अब तक तैयारी शुरू हो जाती थीं. हमें सरकार से कोई सूचना भी नहीं मिली है. अगर त्योहार होता भी है तो यह हर साल जैसा नहीं होगा. आधिकारिक तौर पर हमें कोई दिशानिर्देश नहीं मिले हैं. हमारी बैठक होगी, तभी हम कुछ तय करने की स्थिति में होंगे. हम और इंतजार करेंगे और देखेंगे कि आगे उस वक्त क्या स्थिति होती है. उसी के हिसाब से फैसला लेंगे.'