महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार का आकस्मिक जाना सिर्फ एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ महायुति के संतुलन में बड़ा बदलाव है. विमान हादसे में उपमुख्यमंत्री अजित पवार की मौत के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि व्यक्तिगत तौर पर मैंने एक मजबूत और बड़े दिल वाले दोस्त को खो दिया है. फडणवीस के ये शब्द महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार के प्रति उनके सम्मान और उनकी अहमियत को दर्शाते हैं. लेकिन इस दुखद हादसे के बाद अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि 'दादा' के बिना महायुति (BJP-Sena-NCP) का भविष्य क्या होगा?
अजित पवार केवल एक उपमुख्यमंत्री नहीं थे, बल्कि वे महायुति के भीतर एक ऐसे 'बैलेंसिंग फैक्टर' थे, जो देवेंद्र फडणवीस के लिए ढाल का काम करते थे. फडणवीस और अजित पवार के बीच 2019 की उस अलसुबह शपथ के बाद से एक गहरा रिश्ता बना था. 2023 में जब अजित पवार ने बगावत कर सरकार का साथ दिया, तो फडणवीस को एक ऐसा रणनीतिकार मिला जो एकनाथ शिंदे जैसे सख्त मोलभाव करने वाले नेता को नियंत्रित रख सके.
‘दादा’ के नाम से मशहूर अजित पवार की सबसे बड़ी खासियत यही थी कि वे वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर काम करने वाले व्यावहारिक नेता थे. कांग्रेस, शिवसेना और भाजपा, तीनों के साथ सत्ता में काम कर चुके पवार फडणवीस के लिए एक ऐसे सहयोगी थे, जिन पर हर मुश्किल वक्त में भरोसा किया जा सकता था.
72 घंटे की सरकार से गहरी साझेदारी तक
फडणवीस और अजित पवार की राजनीतिक केमिस्ट्री 2019 में उस वक्त सामने आई, जब दोनों ने तड़के शपथ लेकर सबको चौंका दिया था. हालांकि वह सरकार महज 72 घंटे चली और बाद में अजित पवार उद्धव ठाकरे सरकार में उपमुख्यमंत्री बने, जबकि फडणवीस विपक्ष में चले गए. इसके बावजूद दोनों के रिश्तों में कड़वाहट नहीं आई. खुद फडणवीस ने बाद में कहा था कि भले ही वह फैसला गलती था, लेकिन उन्हें उसका कोई अफसोस नहीं.
2023 में जब अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार से बगावत कर एनसीपी को विभाजित किया और शिंदे सरकार में शामिल हुए, तब यह साझेदारी और मजबूत हो गई. जैसे 2022 में शिंदे ने शिवसेना में विद्रोह कर सत्ता बदली थी, वैसे ही 2023 में अजित पवार की एंट्री ने महायुति को नया संबल दिया.
जब पवार बने फडणवीस की ढाल
2024 के विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद महायुति को स्पष्ट बहुमत मिला, लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर तनाव खुलकर सामने आ गया. एकनाथ शिंदे ने कड़ा रुख अपनाया और सीएम पद के लिए जोर लगाया. इसी दौरान फडणवीस, शिंदे और अजित पवार की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस ने भले ही एकता का संदेश दिया, लेकिन अंदरूनी खींचतान साफ दिख रही थी.
इसी संकट के समय अजित पवार आगे आए और एनसीपी की बिना शर्त समर्थन की घोषणा कर भाजपा-नेतृत्व वाले गठबंधन को स्थिरता दी. शिंदे जहां “शाम तक इंतजार” की बात कर रहे थे, वहीं पवार ने चुटकी लेते हुए कहा, “शिंदे के बारे में शाम तक पता चल जाएगा, मैं शपथ लेने के लिए तैयार हूं.” आखिरकार शिंदे को पीछे हटना पड़ा और दो हफ्ते बाद फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.
नीति निर्माण में अहम भूमिका
पिछले एक साल में अजित पवार ने पश्चिमी महाराष्ट्र के सहकारी आंदोलन से मिले अनुभव का इस्तेमाल करते हुए कृषि, जल संसाधन और ग्रामीण विकास जैसे अहम क्षेत्रों में सरकार की नीतियों को दिशा दी. उनकी मौजूदगी से सरकार में संतुलन बना रहता था और गठबंधन के भीतर संवाद आसान होता था.
अब फडणवीस और शिंदे के सामने नई सियासत
अब अजित पवार के निधन के बाद महायुति में एनसीपी का कोई ऐसा मजबूत, शीर्ष स्तर का नेता नहीं बचा, जो भाजपा के लिए संतुलनकारी भूमिका निभा सके. ऐसे में फडणवीस को अब एकनाथ शिंदे से सीधे और अकेले निपटना होगा. माना जा रहा है कि शिंदे की सौदेबाज़ी की ताकत अब और बढ़ेगी.
इसका उदाहरण हाल के बीएमसी और नगर निगम चुनावों में दिख चुका है. स्पष्ट जनादेश के बावजूद भाजपा-शिवसेना गठबंधन अभी तक मेयर पद पर सहमति नहीं बना पाया है. शिंदे कथित तौर पर रोटेशन फॉर्मूले की मांग कर रहे हैं और नतीजों के बाद 29 नवनिर्वाचित पार्षदों को दो दिनों के लिए मुंबई के एक रिसॉर्ट में ले जाना भी इसी रणनीति का हिस्सा माना गया.
अजित पवार के बिना महायुति में अब शिंदे की आवाज और ज्यादा मजबूत होगी. यह स्थिति फडणवीस के लिए असहज हो सकती है. महाराष्ट्र की राजनीति में अब एक नई हकीकत सामने है. एक ऐसी महायुति, जिसमें ‘दादा’ नहीं हैं. आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि फडणवीस इस बदले हुए समीकरण को कैसे साधते हैं और क्या महायुति उसी मजबूती से आगे बढ़ पाती है या नहीं.