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Women's Day: असाधारण बीमारी से जूझ रही पूनम बनीं दिव्यांगों के लिए ‘बैसाखी’

Women's Day: संघर्ष करके अपना अलग मुकाम हासिल करने वाली महिलाओं की कई ऐसी कहानियां हैं, जो समाज को जगाने का काम करती हैं. मध्य प्रदेश की दिव्यांग सामाजिक कार्यकर्ता पूनम श्रोती का संघर्ष भी इन्हीं कहानियों में से एक है. कैसे वह एक असाधारण बीमारी से जूझने के बावजूद कई दिव्यांगों के हक के लिए कार्य कर रही हैं, जानिए उनकी पूरी कहानी...

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Poonam Shroti Poonam Shroti
स्टोरी हाइलाइट्स
  • दिव्यांगों के लिए 7 साल से कर रहीं काम
  • शुरू किया "गांव-गांव तक सक्षमता" अभियान
  • पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी कर चुके हैं सम्मानित

देश की कुल आबादी का 2.1 प्रतिशत हिस्सा दिव्यांग है. ये आकंड़ा प्रतिशत के हिसाब से भले ही बहुत ज्यादा न लगे लेकिन जब संख्या बल में देखेंगे तो ये आंकड़ा लगभग 22 करोड़ पर पहुंच जाता है. इसमें साढ़े 12 करोड़ पुरुष और 9 करोड़ से ज्यादा महिलाएं हैं,  ये जानकारी गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट में साझा की गई है. अफसोस की बात यह है कि इतनी बड़ी दिव्यांग आबादी के लिए किया जाने वाला सरकारी खर्च बेहद अपर्याप्त है. हालांकि, मध्य प्रदेश की एक महिला अपने जीवन में ऐसी असाधारण चुनौतियों का सामना करने के बावजूद, न केवल दिव्यांगों के हक के लिए लड़ रही हैं बल्कि उनके जीवन में बड़े बदलाव का कारण भी बन चुकी हैं.

असाधारण बीमारी से पीड़ित हैं पूनम 

मध्य प्रदेश की दिव्यांग सामाजिक कार्यकर्ता पूनम श्रोती ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा जैसे बीमारी से पीड़ित हैं जिसे "लोबस्टीन सिंड्रोम" के नाम से भी जाना जाता है. इसमें हड्डियां अक्सर हल्के आघात, थोड़ा सा झटका या बिना किसी स्पष्ट कारण के आसानी से टूट जाती हैं. रोजमर्रा के कामों के दौरान हल्के से आघात या किसी झटके से भी शरीर की किसी भी हड्डी में फ्रैक्चर आ सकता है. इतनी गंभीर बीमारी के बावजूद, पूनम दूर गांव में जा कर दिव्यांग जनों तक मदद पहुंचा रही हैं. 

दिव्यांगों को गांवों तक मदद पहुंचाने का उठाया बीड़ा

आजतक से खास बातचीत के दौरान उद्दीप सोशल वेलफेयर सोसाइटी की संस्थापक पूनम कहती हैं, ''हम शहरों में रहते हैं, हमारे पास बुनियादी सुविधाएं हैं लेकिन देश के गांवों में विकलांग व्यक्ति मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं और हर साधारण से काम में दैनिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं. सरकारी सुविधाएं उनके लिए पहुंच से बाहर हैं या फिर उनसे इसके एवज में शुल्क वसूला जा रहा है.''

पूनम ने आगे कहा, 'गांवों में दिव्यांगों के पास चलने-फिरने के लिए बैसाखी और व्हीलचेयर तक नहीं है और वे अपने दैनिक काम करने के लिए रेंगने को मजबूर हैं. इसे देखने से ज्यादा दयनीय कुछ नहीं हो सकता है'.पूनम के मुताबिक, इसी वजह से वह दिव्यांगजनों को उनके हक से अवगत कराने और उन्हें बैसाखी और व्हीलचेयर जैसी मूलभूत सुविधाएं देने के लिए कार्य कर रही हैं. 

Poonam Shroti (File)

प्रयास को मिली पहचान  

भोपाल की रहने वालीं पूनम श्रोती न केवल एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, बल्कि वह एक TEDx स्पीकर भी हैं.  विकलांगों के लिए अपने असामान्य कार्यों के लिए पूनम को भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा देश की शीर्ष 100 सशक्त महिलाओं में शुमार करते हुए सम्मानित किया जा चुका है.

'गांव-गांव तक सक्षमता' अभियान की शुरुआत

दिव्यांग सामाजिक कार्यकर्ता पूनम श्रोती के लिए उनके माता-पिता प्रेरणा के प्रमुख स्रोत रहे हैं और उन्होंने ही पूनम को इतनी दुर्लभ बीमारी के बावजूद भी सामान्य रूप से जीने की क्षमता प्रदान की है. जिंदगी भर अपने हक के लिए लड़ने वाली पूनम आज कई दिव्यांग जनों को उनके हक दिलाने के लिए काम कर रही हैं. इसके लिए उन्होंने  "गांव-गांव तक सक्षमता" अभियान की शुरूआत की है. ये अभियान मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चलाया जा रहा है. गांवों में रहने वाले दिव्यांगों को उनकी क्षमताओं और अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए पूनम श्रोती अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रही हैं. उन्होंने इस अभियान की शुरुआत मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ स्थित छोटे से गांव अस्तौन से की थी.

विकलांगता को बनाई ताकत


एक एमबीए डिग्री धारक पूनम ने नौकरी के लिए कई अस्वीकृतियों का सामना किया. लोग उनकी विकलांगता को एक प्रमुख चिंता मानते थे. इतनी चुनौतियों का सामना करने के बाद पूनम ने अपना संगठन उद्दीप सोशल वेलफेयर सोसाइटी शुरू किया. अब उन्होंने अपनी विकलांगता को अपनी ताकत में बदल दिया है. आज वह दिव्यांगों के अधिकारों के लिए खड़ी हैं. उद्दीप सोशल वेलफेयर सोसाइटी दिव्यांगों के लिए समानता सहित महिला सशक्तीकरण और ग्रामीण विकास के लिए लगातार 7 साल से काम कर रही है.

चुनौतियों का करना पड़ा सामना


इतने बड़े और कठिन मकसद के लिए राह आसन नहीं रही. पूनम कहती हैं कि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अभियान के लिए फंड जुटाना था. अपने कुछ दोस्तों की मदद से शुरूआत में कुछ राशि तो जमा की लेकिन वो पर्याप्त नहीं थी. साथ ही ग्रामीणों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना भी एक कठिन कार्य है, क्योंकि आमतौर पर ग्रामीणों को व्हीलचेयर प्राप्त करने के लिए भुगतान करने के लिए कहा जाता था जो वास्तव में सरकारी योजनाओं के तहत उनके लिए मुफ्त है. पूनम बतातीं हैं कि जब वह दिव्यागों को बैसाखी और व्हीलचेयर बांटती हैं तो जरूरतमंदों के लिए यह विश्वास करना कठिन होता है कि यह सब मुफ्त में दिया जा रहा है. 

सरकार से लगाई गुहार

पूनम का कहना है कि सरकार दिव्यागों की जरूरत के सामान पर भारी टैक्स वसूल रही है. उनका मानना है कि व्हीलचेयर और इसके जैसे दूसरे सामानों को जीएसटी के दायरे से बाहर रखना चाहिए. बता दें कि जीएसटी कानून विकलांगता सहायक उपकरणों जैसे बैसाखी, व्हीलचेयर, वॉकिंग फ्रेम, ट्राइसाइकिल, ब्रेल पेपर, ब्रेल टाइपराइटर और ब्रेल घड़ियों और कई अन्य वस्तुओं पर 5 प्रतिशत का कर लगाता है. बैसाखी, कृत्रिम अंग और हियरिंग एड (सुनने वाली मशीन) सहित आर्थोपेडिक उपकरणों पर 12 प्रतिशत टैक्स लगता है. इसके अलावा विकलांग व्यक्तियों के लिए एडेप्टेड कारों पर 18 प्रतिशत टैक्स लगता है.


 

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