नवजात शिशु के लिए मां का दूध अमृत से कम नहीं माना जाता है, क्योंकि बीमारी से बचाव के लिए मां का दूध रामबाण होता है. इस महत्व को जानते हुए एक अधेड़ महिला अपने पोते के लिए ‘मां’ बन गई. मां को खो चुके पोते को दादी स्तनपान करा रही है.
आदिवासी बहुल भीमपुर ब्लॉक के पाट गांव निवासी दिनेश की पत्नी अनसेरी बाई ने लगभग दो माह पूर्व एक बेटे को जन्म दिया था. बेटे के जन्म के मात्र 15 दिन बाद ही मां का देहांत हो गया. घर में दादी रामप्यारी बाई सहित अन्य परिजन नवजात को चम्मच की सहायता से गाय और बकरी का दूध पिलाने लगे, लेकिन इससे नवजात की सेहत बिगड़ने लगी. परिजन उसे उपचार के लिए भीमपुर अस्पताल ले गए. हालत ठीक न होने पर चिकित्सकों ने नवजात को जिला अस्पताल रेफर किया, जहां नवजात का वजन मात्र दो किलो 50 ग्राम होने के कारण उसे पोषण पुर्नवास केंद्र में रखा गया.
जिला अस्पताल बैतूल की पोषण आहार विशेषज्ञ शालिनी चौधरी ने नवजात की दादी को स्तनपान कराने के लिए राजी किया और इसके लिए आवश्यक परामर्श दिया जिससे मात्र तीन दिन बाद ही लगभग 50 वर्ष उम्र की रामप्यारी बाई के स्तनों में दूध उतरने लगा. चूंकि दादी को अभी काफी कम मात्रा में दूध हो रहा है, इसलिए बच्चे को स्तनपान के समय एक बारीक नली की सहायता से बाहर का दूध भी पिलाया जा रहा है.
चिकित्सकों का कहना है कि नवजात की सेहत में तेजी से सुधार हो रहा है. छह दिनों में ही नवजात का वजन 150 ग्राम बढ़कर दो किलो दो सौ ग्राम हो गया है.
नवजात को नया जीवनदान देने वाली दादी रामप्यारी बाई बताती है कि उनकी छह संतान हैं जिनमें चार बेटियां और दो बेटे हैं. उसकी सबसे छोटी संतान की उम्र लगभग 12 वर्ष हो गई है फिर भी पोते को स्तनपान कराने को वह अपना सौभाग्य और ईश्वर का चमत्कार मान रही है.
शालिनी चौधरी ने बताया कि स्तनों में दूध उतरने का सीधा संबंध मस्तिष्क से है. यदि कोई महिला दूसरे के बच्चे की भी आत्मीयता से पालन-पोषण करे तो ऑक्सीटोसिन हार्मोन बढ़ जाता है जिससे उस महिला के स्तनों में दूध उतर आता है. रामप्यारी बाई के साथ संभवत: यही हुआ, जिससे मात्र छह दिनों में ही नवजात की हालत काफी सुधर गई है और उसका वजन भी लगभग 150 ग्राम बढ़ गया है.