विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए इक्विटी रेगुलेशन को लेकर झारखंड में भी सियासी और सामाजिक हलचल तेज हो गई है. जहां एक ओर ओबीसी और आदिवासी संगठनों ने इस नियम का खुलकर समर्थन किया है, वहीं दूसरी ओर सवर्ण वर्ग के छात्र और शिक्षक इसके विरोध में सड़कों पर उतर आए हैं. स्थिति उस समय और तनावपूर्ण हो गई जब रांची विश्वविद्यालय के आर्यभट सभागार के बाहर रेगुलेशन के समर्थक और विरोधी आमने-सामने आ गए और एक-दूसरे के खिलाफ जमकर नारेबाज़ी हुई.
रेगुलेशन के समर्थन में उतरे ओबीसी और आदिवासी छात्रों का कहना है कि यह नियम लंबे समय से चले आ रहे भेदभाव को रोकने के लिए जरूरी है. समर्थकों ने सवाल उठाया कि जब आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया गया, तब किसी ने विरोध नहीं किया, तो अब इक्विटी रेगुलेशन आने पर सवर्ण वर्ग ही सड़कों पर क्यों उतर रहा है. उनका दावा है कि विश्वविद्यालय परिसरों में भेदभाव के मामलों में 118 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है, ऐसे में इस कानून को गलत ठहराना उचित नहीं है.
वहीं, रेगुलेशन का विरोध कर रहे शिक्षकों और छात्रों का कहना है कि नए नियमों में सजा का प्रावधान भय का माहौल पैदा करता है. उनका तर्क है कि बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के आरोपित को दोषी मानने की प्रवृत्ति न केवल सवर्ण शिक्षकों बल्कि विद्यार्थियों के हित में भी नहीं है. विरोध करने वालों की मांग है कि इक्विटी कमिटी में फॉरवर्ड वर्ग का भी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए और नियमों में आवश्यक संशोधन किए जाएं, ताकि किसी भी वर्ग के साथ अन्याय न हो.
समर्थक पक्ष इन आशंकाओं को खारिज करता है. उनका कहना है कि डरने वाले वही लोग हैं जिन्होंने कभी शोषण किया है. समर्थकों का आरोप है कि कुछ शिक्षक कक्षाओं में छात्रों को आपत्तिजनक और अपमानजनक संबोधन करते रहे हैं, और इसी वजह से वे इस कानून से असहज महसूस कर रहे हैं. उनके अनुसार, यह रेगुलेशन भेदभाव को बढ़ाने के बजाय उसे रोकने का काम करेगा.
रांची विश्वविद्यालय के प्रांगण में दोनों पक्षों को एक साथ बैठाकर संवाद की कोशिश भी की गई, जहां शिक्षकों और छात्रों ने खुलकर अपने विचार रखे. हालांकि, इक्विटी कमिटी में फॉरवर्ड वर्ग के प्रतिनिधित्व की कमी और सजा के प्रावधान को लेकर असंतोष साफ दिखाई दिया.