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लकड़ी खरीदने तक के पैसे नहीं, ब्लैक में सिलेंडर तो दूर की बात... सूरत लेबर कॉलोनी से ग्राउंड रिपोर्ट

सूरत की रामेश्वर मजदूर बस्ती में मिडिल ईस्ट युद्ध का असर साफ दिख रहा है. काम की कमी और महंगाई के चलते मजदूर पलायन कर रहे हैं. जो बचे हैं, वो गैस न मिलने के कारण लकड़ी के चूल्हे पर खाना बना रहे हैं. बस्ती में सन्नाटा और बंद घर इस संकट की गवाही दे रहे हैं.

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 सूरत की मजदूर बस्ती में पसरा सन्नाटा (Photo: Sanjay Singh J Rathod/ITG)
सूरत की मजदूर बस्ती में पसरा सन्नाटा (Photo: Sanjay Singh J Rathod/ITG)

गुजरात के सूरत शहर की चमक-दमक से कुछ किलोमीटर दूर एक ऐसी सच्चाई सामने आ रही है, जो चौंकाने के साथ-साथ परेशान करने वाली भी है. औद्योगिक इलाके सचिन जीआईडीसी के पास स्थित रामेश्वर नाम की मजदूर बस्ती में इन दिनों सन्नाटा पसरा हुआ है. यह वही बस्ती है जहां कभी सुबह होते ही काम पर जाने की हलचल और बच्चों की आवाजें गूंजती थीं, लेकिन अब यहां खाली घर और बंद दरवाजे नजर आते हैं.

आजतक की टीम जब इस बस्ती में पहुंची, तो हालात बेहद मुश्किल दिखाई दिए. जिन हाथों में पहले औजार हुआ करते थे, अब उन्हीं हाथों में सूखी लकड़ियां हैं. मजदूर खुले आसमान के नीचे मिट्टी के चूल्हे बनाकर खाना पकाने को मजबूर हैं. यह मजबूरी किसी शौक की नहीं, बल्कि पेट की आग बुझाने की है.

मजदूर बस्ती में पसरा सन्नाटा, घरों पर लटके ताले

इस बस्ती की तंग गलियों में जगह-जगह लकड़ियों के ढेर दिखाई देते हैं, जिन्हें मजदूर आसपास के जंगली इलाकों से बीनकर लाते हैं. मिट्टी के चूल्हे छतों और रास्तों पर बने हुए हैं. यहां रहने वाले मजदूर बताते हैं कि पहले उन्हें ब्लैक में गैस सिलेंडर मिल जाता था, लेकिन अब सरकारी सख्ती के कारण वह भी मिलना बंद हो गया है.

मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध का असर इस बस्ती में साफ तौर पर देखा जा सकता है. काम की कमी और बढ़ती महंगाई ने मजदूरों की हालत खराब कर दी है. बस्ती में रहने वाले ज्यादातर मजदूर अपने गांवों को लौट चुके हैं. जो लोग बचे हैं, वे किसी तरह दिन गुजार रहे हैं.

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यहां के मकान मालिकों के मुताबिक, पिछले कुछ दिनों में करीब 40 प्रतिशत मजदूर कमरे खाली कर चुके हैं. कई कमरों पर ताले लटक रहे हैं और कई कमरे बिना ताले के खाली पड़े हैं. पहले जहां सुबह-शाम मजदूरों की आवाजाही रहती थी, अब वहां सन्नाटा और मायूसी छाई हुई है.

गैस की किल्लत, लकड़ी के चूल्हे पर बन रहा खाना

मजदूरों का कहना है कि पांच किलो का गैस सिलेंडर अब उन्हें नहीं मिल रहा है. ब्लैक में जो सिलेंडर मिल रहा है, उसके दाम इतने ज्यादा हैं कि वे उसे खरीद नहीं सकते. जब रोजमर्रा के खाने के लिए ही संघर्ष करना पड़ रहा हो, तो महंगा गैस सिलेंडर लेना उनके लिए संभव नहीं है.

इसी वजह से मजदूर झाड़ियों से लकड़ी बीनकर लाते हैं और उसी से चूल्हा जलाकर खाना बनाते हैं. यह दृश्य शहर के विकास के पीछे छिपे उस संघर्ष को दिखाता है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. यह सिर्फ एक बस्ती की कहानी नहीं है, बल्कि उस श्रमशक्ति की सच्चाई है जो शहरों को खड़ा करती है. अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो यहां से और मजदूर पलायन करेंगे और यह बस्ती पूरी तरह खाली हो सकती है.

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