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गुजरात दंगों पर बहस करते हुए कोर्ट में भावुक हुए कबिल सिब्बल, बोले- मैं भी उसी नफरत का शिकार

कपिल सिब्बल बोले कि दंगे भड़कने पर गोधरा में तो तुरंत कर्फ्यू घोषित कर दिया गया था, लेकिन अहमदाबाद में, 12 बजे रात तक कर्फ्यू घोषित नहीं किया गया था. वहां हजारों लोग सुबह 7 बजे तक जमा हो गए थे. कोई भी पुलिस अधिकारी तुरंत कर्फ्यू घोषित कर सकता था ताकि हिंसा से बचा जा सके.

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कपिल सिब्बल (फाइल फोटो) कपिल सिब्बल (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • सुप्रीम कोर्ट में गुजरात दंगों को याद कर भावुक हुए सिब्बल
  • रुंधे हुए गले में सुनाई बीती याद

गुजरात में 2002 दंगों के मामले में जाकिया जाफरी की याचिका पर बहस करते हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल भावुक हो गए. उनका गला रुंध गया, आंखें भर आईं. उन्होंने 1947 में देश के बंटवारे के समय दंगों का हवाला देते हुए अपना दर्द भी बयां किया. उन्होंने कहा, 'मैंने पाकिस्तान में अपने नाना-नानी को खोया... मैं भी उसी नफरत का शिकार हूं.'

सिब्बल ने आगे कहा कि NHRC की तरफ से दाखिल याचिका को देखें तो साफ हो जाता है कि SIT का मकसद सिर्फ गुलबर्गा ही नहीं था. धार्मिक भावनाएं भड़का कर लोग अपनी सत्ता की फसल के लिए उपजाऊ मिट्टी तैयार करते हैं. धार्मिक भावनाएं भड़काने की ऐसी घटनाएं ज्वालामुखी के लावा की तरह होती है. जहां भी लावा जाता है वहां सब कुछ जल जाता है. ऐसी घटनाएं भविष्य के लिए उन्माद की जमीन तैयार करती हैं.

सिब्बल ने कहा जब इस मामले की शिकायत कोर्ट ने दर्ज की तो इसके बाद कोर्ट ने कहा था कि मामले की जांच करें. आरोपी पर मुकदमा चलाएं या क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करें. इसके बाद मामले की जांच सीलबंद रिपोर्ट के जरिए पेश की गई. इस मामले की जांच से जुड़े दस्तावेजों में से 64 बक्सों में बंद 55,000 पन्ने तो किसी भी अदालत में पेश ही नहीं किए गए. सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने आदेश में कई दस्तावेज शिकायतकर्ताओं को उपलब्ध कराने को कहा था. लेकिन हमें आज तक वो मिले ही नहीं.

उन्होंने कहा कि साबरमती एक्सप्रेस के गोधरा पहुंचने से पहले ही प्रॉब्लम शुरू होने की खुफिया रिपोर्ट मिली थी. लेकिन उसकी भी जांच नहीं की गई. कई लोगों के भड़काऊ बरताव करने की भूमिका की भी जांच नहीं की गई. शवों के पोस्टमार्टम और अंत्येष्टि की प्रक्रिया भी संदिग्ध थी, क्योंकि कहा गया कि रेलवे प्लेटफार्म पर भी पोस्टमार्टम करने की बातें हुई थीं. जांच की जाती तो और पता चलता. लेकिन जांच ही नहीं हुई.

दंगे भड़कने पर गोधरा में तो तुरंत कर्फ्यू घोषित कर दिया गया था, लेकिन अहमदाबाद में, 12 बजे रात तक कर्फ्यू घोषित नहीं किया गया था. वहां हजारों लोग सुबह 7 बजे तक जमा हो गए थे. कोई भी पुलिस अधिकारी तुरंत कर्फ्यू घोषित कर सकता था, ताकि हिंसा से बचा जा सके. त्रिशूल से लैस कारसेवकों के लौटने और सांप्रदायिक तनाव की उपस्थिति के बारे में राज्य की खुफिया रिपोर्टों को नजरअंदाज कर दिया गया था.
 


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