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दिल्ली में कोरोना महामारी की गैर-कोविड मरीजों पर कैसे पड़ रही बड़ी मार? हुआ खुलासा

कोविड-19 मरीजों की भरमार देख रहे, राष्ट्रीय राजधानी के निजी और सरकारी अस्पताल, गंभीर गैर-कोविड-19 मरीजों के इलाज के लिए संसाधनों की किल्लत का सामना कर रहे हैं. 

दिल्ली में कोरोना ने भ्रामक रूप ले लिया है (पीटीआई) दिल्ली में कोरोना ने भ्रामक रूप ले लिया है (पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • आजतक/इंडिया टुडे ने आठ अस्पतालों में जांच की
  • कहीं भी ऐप पर दिखाए गए डेटा की पुष्टि नहीं हुई
  • प्रमुख अस्पतालों के सामान्य वॉर्ड भी खचाखच हैं

दिल्ली के एक व्यस्त सरकारी अस्पताल का इमरजेंसी डिपार्टमेंट... एक शख्स सांस लेने के लिए संघर्ष करता हुआ... साथ में अटैंडेंट उसकी छाती और पीठ को मलता हुआ... नहीं, वह कोविड मरीज नहीं है.

फेस मास्क के पीछे हांफते चेहरे वाला ये शख्स संभावित हार्ट अटैक का केस लगता है, लेकिन सरकार संचालित इस हेल्थकेयर सुविधा में क्रिटिकल केयर तो दूर की बात है, उसे ट्रॉली या बेड तक मुहैया नहीं है. 

मरीज के तीमारदार ने कहा, "उन्हें हार्ट की दिक्कत है. उन्हें हार्ट अटैक का खतरा रहता है." 

आजतक/इंडिया रिपोर्टर ने कहा, '' उन्हें तब एक बेड पर लेटना चाहिए था.” 

तीमारदार- "वे कहते हैं कि कोई बिस्तर नहीं है. यही वजह है कि उन्हें इस तरह (बैठे) रखा गया है."  

नॉन-कोविड क्रिटिकल केयर के लिए बेड्स उपलब्ध नहीं 

कोविड-19 मरीजों की भरमार देख रहे, राष्ट्रीय राजधानी के निजी और सरकारी अस्पताल, गंभीर गैर-कोविड-19 मरीजों के इलाज के लिए संसाधनों की किल्लत का सामना कर रहे हैं. 

आजतक/इंडिया टुडे जांच चेक में पाया गया कि स्वास्थ्य सेवा कर्मचारी दयाभावना और समर्पण के साथ ओवरटाइम काम कर रहे हैं. लेकिन कोरोनावायरस हमले की नई लहर से पूरा सिस्टम भारी दबाव में है.    

रिपोर्टर ने उसी इमरजेंसी विंग में बैठे एक और बुजुर्ग मरीज से पूछा, "क्या आप लोगों को कोई बेड नहीं मिल रहा है? आप कब से इंतजार कर रहे हैं?"  

जवाब मिला- "कल से"  

रिपोर्टर- "समस्या क्या है?"  

मरीज- "यह हार्ट फेल है, वे यहां (कुर्सी पर) दवा दे रहे हैं." 

संकट में इमरजेंसी  

ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर मानते हैं कि गैर-कोविड केसों की मांगों को पूरा करने के लिए संसाधनों की भारी कमी है. 

 डॉक्टर से जब पूछा गया कि क्या छाती की दर्द वाले किसी मरीज को क्या भर्ती कराया जा सकता है, तो उसने जवाब दिया- "कोई खाली बेड नहीं है. यहां तक कि हार्ट पेशेंट्स भी 3-4 दिनों से यहां बैठे हैं क्योंकि वहां कोई बेड नहीं है. दो-तीन दिनों से यहाँ इंतज़ार कर रहे मरीजों को कोई बेड नहीं मिल रहा है. मैं कैसे कंफर्म कर सकता हूँ कि आपको दो, तीन या चार दिनों में बेड मिल जाएगा?" 

 उच्च स्तर पर बैठे आधिकारिक वर्ग को जीवन-रक्षक केयर में कमी के बारे में पता है. 

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का कहना है, "अभी हम जिस प्रमुख समस्या का सामना कर रहे हैं, वह दिल्ली में आईसीयू बेड की संख्या को लेकर है. 20 अक्टूबर के बाद, दिल्ली में कोविड केसों की संख्या बहुत अधिक दर से बढ़ रही है. हमारे पास दिल्ली में पर्याप्त कोविड बेड हैं, लेकिन कमी आईसीयू बेड की है." बुधवार को, मुख्यमंत्री ने संवाददाताओं को बताया कि अगले कुछ दिनों में शहर के विभिन्न अस्पतालों में 660 से अधिक क्रिटिकल-केयर बेड्स जोड़े जाएंगे. 

केंद्र सरकार ने भी केंद्रीय सरकारी अस्पतालों में लगभग 750 अतिरिक्त बेड्स उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया है और दिल्ली के 100 निजी अस्पतालों में बेड्स के इस्तेमाल का आकलन करने के लिए कई टीमों का गठन किया है. 

हालांकि अभी के लिए, राजधानी में गैर-कोविड रोगियों को अगर तत्काल लाइफ सेविंग केयर की जरूरत हो तो उन्हें परेशानी हो सकती है.  

सामान्य वार्ड्स में एक बेड पर कई मरीज 

सिर्फ आईसीयू ही नहीं, यहां तक कि प्रमुख अस्पतालों के सामान्य वार्ड भी खचाखच हैं. 

एक केंद्रीय सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों ने आजतक/इंडिया टुडे को बताया कि मेन गैर-कोविड वार्ड्स में तीन से चार मरीज एक ही बेड साझा कर रहे हैं. 

एक डॉक्टर ने कहा, "देखो भाई, बीमार मरीज को ICU की आवश्यकता होगी. लेकिन ICU में कोई बेड नहीं है. कोरोना वार्ड में कोई बेड नहीं है. लेकिन हम मरीज को सामान्य वार्ड में ले सकते हैं. हम सामान्य वार्ड में एक ही बेड पर तीन-चार रोगियों को ले सकते हैं, लेकिन आईसीयू में एक बेड पर एक मरीज की पॉलिसी है.” 

एक अन्य सरकारी अस्पताल में भी बेड का संकट समान रूप से गंभीर था जहां सामान्य वार्ड मरीजों से भरा हुआ था.  

एक डॉक्टर ने माना, "यहां कोई बेड नहीं है. हम सामान्य वार्ड के बारे में बात कर रहे हैं, लेकिन अगर आपको लगता है कि आपको अपने मरीज को भर्ती करवाना है, तो यहां एडमिशन संभव नहीं है. हम सिर्फ जांच कर सकते हैं और दवा दे सकते हैं." 

आईसीयू या इमरजेंसी डिपार्टमेंट में भी कोई बेड उपलब्ध नहीं थे. 

डॉक्टर ने कहा, "हम कल भी एक भी मरीज को भर्ती नहीं कर सके क्योंकि कोई बेड नहीं था." 

प्राइवेट अस्पतालों में भी विकट स्थिति  

दिल्ली के कुछ प्रमुख निजी अस्पताल भी समान विकट स्थिति से जूझ रहे हैं. 

खचाखच प्राइवेट फैसिलिटी में एक डॉक्टर ने कहा, "यह एक आपात स्थिति है,  सर. लेकिन अब यह मुश्किल है क्योंकि सभी बेड्स भरे हुए हैं."  

इस डॉक्टर से छाती में दर्द की शिकायत वाले एक मरीज को एडमिट करने की संभावना के बारे में पूछा गया था. 

रिपोर्टर- "इमरजेंसी में भी नहीं?"  

डॉक्टर- "आप इसे खुद देख सकते हैं, सर. मुझे बताइए कि क्या आपको कोई मिल सकता है. हम केवल एक कुर्सी (मरीज को) दे सकते हैं और इमरजेंसी मैनेजमेंट कर सकते हैं." 

उसी अस्पताल के एडमिशन डिपार्टमेंट के एक ड्यूटी मैनेजर ने अतिरिक्त गैर-कोविड रोगियों को लेने में असमर्थता व्यक्त की. उसने कहा, "यह एक लंबा इंतजार है. एक बेड तुरंत उपलब्ध नहीं होगा. गैर-कोविड केसों के लिए वेटिंग लिस्ट में कम से कम 20-25 लोग हैं."  

यह पूछने पर कि मरीज एडवांस में इलाज के पैसे जमा करने को तैयार है, मैनेजर ने दोहराया कि अनेक मरीज पहले से ही कतार में हैं.  

मैनेजर ने कहा, "सर, यह पैसे का मामला नहीं है. अकेले इमरजेंसी में दस लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं.हम पिछले चार दिनों से उन्हें बेड नहीं दे पा रहे हैं." 

एक अन्य निजी अस्पताल के इमरजेंसी विंग के एक सुपरवाइजर ने बताया कि किस तरह से प्रकोप ने फैसिलिटी को ब्रेकिंग पॉइंट पर ला दिया है.  

सुपरवाइजर ने कहा, "आपने मरीज़ की जो हालत बताई है उसमें उसे तत्काल ऑपरेशन थियेटर में पहुंचाना पड़ सकता है. मैं मरीज को कहां ले जाऊंगा, अगर मेरे पास बेड नहीं है? मैं कैसे उसके जीवन को बिना बेड के कैसे और बड़ी समस्या में डाल सकता हूं.”  

उसने आगे कहा, "बिल्कुल खाली बेड नहीं हैं सर. दूसरी इमरजेंसी में स्थिति और भी खराब है. कॉरिडोर में बेड (मरीजों के साथ) रखे गए हैं. लॉबी तक का पूरा कॉरिडोर बेड (मरीजों वाले) के साथ भरा हुआ है."  

एक अन्य निजी अस्पताल के एक डॉक्टर ने कबूल किया कि उन्हें गैर-कोविड रोगियों को वापस करना पड़ा क्योंकि फैसिलिटी पूरी तरह भरी हुई है. 

डॉक्टर ने कहा, "हमारे पास बेड न होने की वजह से मरीजों को वापस भेजने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. वहां 35 मरीज हैं, लेकिन हमारे पास मॉनिटर की कमी है. हम कैसे मैनेज कर सकते हैं? इसलिए, उन्हें मरीजों को किसी अन्य अस्पताल ले जाने के लिए कहना ही समझदारी है.” 

कोविड बेड्स की संख्या पर सवाल? 

यहां तक कि कोरोना केसों के लिए, सरकार का दिल्ली कोरोना ऐप (जो शहर में बेड्स की उपलब्धता पर रीयल टाइम अपडेट देने का दावा करता है) गलत डेटा दिखा रहा है. 

आजतक/इंडिया टुडे ने आठ अस्पतालों में जांच की- चार सरकारी और चार निजी अस्पतालों में – कहीं भी ऐप पर दिखाए गए डेटा की पुष्टि नहीं हुई. 

नवंबर में दिल्ली में दुनिया की सबसे खराब स्थिति   

इंडिया टुडे की डेटा इंटेलीजेंस यूनिट (DIU) के 16 नवंबर को प्रकाशित एक विश्लेषण के मुताबिक कोरोनावायरस केसों को लेकर दिल्ली की जो खराब स्थिति है, वो संभवत दुनिया के किसी भी शहर ने अभी तक नहीं देखी.  

इस महीने की शुरुआत के बाद से,  राष्ट्रीय राजधानी में कई दिन ऐसे रहे जो दैनिक कोविड केसों की अधिक संख्या को लेकर दस सबसे खराब दिनों में शामिल रहे जो दुनिया के किसी भी अन्य शहर ने अनुभव किए. 

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