ईरान-अमेरिका युद्ध की आहट से ग्लोबल एनर्जी मार्केट में हलचल मची हुई है. देश में एलपीजी सिलेंडर को लेकर हाहाकार मचा हुआ है. लोगों को घंटों तक लाइन में लगने के बाद भी सिलेंडर नहीं मिल पा रहा है. लेकिन सरकार कह रही है कि गैस की कोई दिक्कत नहीं है, सप्लाई पूरी है. ऐसे में सवाल उठता है कि फिर ये सिलेंडर कहां चले गए?
सरकार ने आशंका जताई है कि कालाबाजारी हो रही है. इसी को लेकर आजतक की टीम ने दिल्ली के कई इलाकों में स्टिंग ऑपरेशन किया है. इस दौरान कालाबाजारी का जो सच सामने आया, उससे हर कोई हैरान रह गया. कहीं किसी दुकान में, तो कहीं किसी झुग्गी और कहीं किसी घर में दर्जनों गैस सिलेंडर रखे हैं, जिन्हें महंगे दामों पर बेचा जा रहा है. इससे आम जनता को लूटने के साथ-साथ सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा पैदा हो रहा है.
जांच में दिल्ली के कई स्थानों का पता चला, जहां कालाबाजारी करने वाले बड़ी संख्या में सिलेंडर जमा कर रहे थे. यहां बिना बुकिंग स्लिप के उन्हें बेचा जा रहा है और डिलीवरी से पहले थोड़ी-थोड़ी गैस भी निकाली जा रही थी. यह खुलासा ऐसे समय में हुआ है जब एलपीजी की उपलब्धता को लेकर उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ रही है.
बढ़ती मांग और उपभोक्ताओं की चिंता
बता दें कि 11 मार्च को पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने घोषणा की कि घरेलू एलपीजी सिलेंडरों की न्यूनतम डिलीवरी अवधि 21 दिनों से बढ़ाकर 25 दिन कर दी जाएगी. सरकार ने यह भी दोहराया कि प्रति परिवार सालाना 15 सिलेंडरों की सीमा लागू रहेगी. अधिकारियों ने इसे आपूर्ति को लेकर पैदा हुई चिंताओं के बीच मांग को नियंत्रित करने के लिए एक अस्थायी कदम बताया.
सरकार के अनुसार एलपीजी या फ्यूल ऑयल की वास्तविक कमी नहीं है.
हालांकि, उपभोक्ताओं और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के बीच घबराहट में की जा रही खरीद और चिंता ने जमीनी हकीकत को अलग बना दिया है. कई महानगरों में गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारों और कमर्शियल सिलेंडर की कमी के कारण रेस्तरां बंद होने की खबरें सामने आने लगी हैं.
नरेला के एक घर में छिपे दर्जनों सिलेंडर
आजतक की जांच टीम का पहला पड़ाव उत्तर दिल्ली के नरेला स्थित स्वतंत्रता नगर था. यहां एल-762 नंबर का घर, जो एक नामी प्राइवेट स्कूल के पीछे स्थित है. बाहर से बिल्कुल आम घर जैसा दिखाई देता है. प्रवेश द्वार पर एक छोटी-सी परचून की दुकान चलती है और इलाके में सामान्य आवाजाही रहती है. लेकिन अंदर जाने पर तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है.
घर के अंदर करीब 50 एलपीजी सिलेंडर एक साथ रखे हुए मिले, जिससे साफ हुआ कि यह स्थान अवैध गैस सिलेंडर कारोबार का अड्डा बना हुआ है. आजतक की टीम को सूचना मिली थी कि यहां से एक संगठित कालाबाज़ारी नेटवर्क चल रहा है. टीम की सबसे पहले मुलाकात गोपाल नाम के व्यक्ति से हुई, जिसने शुरुआत में किसी भी सिलेंडर की उपलब्धता से इनकार कर दिया.
जब उससे पूछा गया कि क्या एक सिलेंडर खरीदा जा सकता है, तो उसने साफ कहा कि कोई सिलेंडर उपलब्ध नहीं है और सुझाव दिया कि यदि शाम तक सप्लाई आ गई तो फिर कोशिश की जा सकती है. लेकिन जब टीम ने घर के अंदर दिखाई दे रहे सिलेंडरों की ओर इशारा किया, तो गोपाल का लहजा बदल गया. उसने कहा कि बिना वैध बुकिंग स्लिप के सिलेंडर नहीं दिया जा सकता.
कुछ हिचकिचाहट के बाद गोपाल ने रिपोर्टरों को इस पूरे नेटवर्क के कथित मुख्य संचालक से मिलवाया, जिसे स्थानीय लोग इने के नाम से जानते हैं.
घर के अंदर एक कमरे में दर्जनों सिलेंडर रखे हुए थे और इने के हाथ में डिलीवरी स्लिपों का एक पुलिंदा था. उसने कहा कि सिलेंडर केवल स्लिप के आधार पर ही दिए जा सकते हैं, लेकिन साथ ही यह भी संकेत दिया कि वह किसी भी स्लिप को फाड़कर किसी के नाम पर इस्तेमाल कर सकता है.
जब रिपोर्टरों ने डिजिटल भुगतान करने की कोशिश की, तो इने ने मना कर दिया. उसका कहना था कि ऑनलाइन भुगतान स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस लेन-देन में किसी और की बुकिंग स्लिप का इस्तेमाल करना पड़ता है. उसने साफ कहा कि भुगतान नकद में ही करना होगा.
बातचीत के दौरान एक और दिलचस्प बात सामने आई. इने और उसके साथी मुख्य रूप से इंडेन कंपनी के सिलेंडरों का कारोबार कर रहे थे और उन्होंने रिपोर्टरों द्वारा लाए गए भारत गैस के सिलेंडर से उसे बदलने से इनकार कर दिया. बातचीत का अंत इस सहमति के साथ हुआ कि अगर रिपोर्टर नकद पैसे और इंडेन सिलेंडर लेकर वापस आएंगे तो उन्हें सिलेंडर दे दिया जाएगा.
जसोला विहार में सिलेंडर जमाखोरी का नेटवर्क
जांच का अगला पड़ाव दक्षिण दिल्ली का जसोला विहार था, जहां इलाके में दो अधिकृत एलपीजी एजेंसियाँ संचालित होती हैं. एजेंसी पर कर्मचारियों ने बिना बुकिंग रसीद के सिलेंडर देने से सख्ती से मना कर दिया. लेकिन एजेंसी से कुछ ही मीटर दूर रिपोर्टरों को बिल्कुल अलग गतिविधि देखने को मिली. एजेंसी के पास एक संकरी गली में कई एलपीजी सिलेंडर छोटी-छोटी झोपड़ियों में रखे हुए मिले. पूछताछ करने पर प्रवीण नाम के एक डिलीवरी कर्मचारी ने पहले दावा किया कि सिलेंडर खाली हैं और ग्राहकों तक पहुंचाने के लिए रखे गए हैं. लेकिन यह सफाई ज्यादा देर टिक नहीं पाई.
थोड़ा दबाव डालने पर प्रवीण ने स्वीकार किया कि सिलेंडर उसके मालिक के हैं और रिपोर्टरों को अपने बॉस सनी से संपर्क करने की सलाह दी. रिपोर्टरों ने सनी को फोन किया और बताया कि उनके पास एक खाली सिलेंडर है लेकिन कोई बुकिंग स्लिप नहीं है. सनी ने पूछा कि सिलेंडर किस कंपनी का है और क्या कोई बुकिंग रसीद है. जब बताया गया कि कोई रसीद नहीं है, तब भी सनी ने सही कीमत मिलने पर सिलेंडर की व्यवस्था करने की बात मान ली. आखिरकार रिपोर्टरों को 1500 रुपये में एक घरेलू एलपीजी सिलेंडर बेच दिया गया, जबकि उस समय सिलेंडर की आधिकारिक कीमत 913 रुपये थी. लेकिन जांच में इससे भी अधिक चिंताजनक बात सामने आई.
बातचीत के दौरान प्रवीण ने स्वीकार किया कि वह हर सिलेंडर से थोड़ी-सी गैस निकाल लेता है. जब उससे पूछा गया कि कितनी गैस निकाली जाती है, तो उसने बताया कि आमतौर पर हर सिलेंडर से लगभग आधा किलो से तीन-चौथाई किलो तक गैस निकाल ली जाती है. इसका मतलब है कि ऐसे सिलेंडर खरीदने वाले ग्राहकों को न केवल अधिक कीमत चुकानी पड़ती है बल्कि उन्हें अधभरे सिलेंडर भी मिलते हैं.
संगम विहार में फलता-फूलता काला बाजार
जांच के तीसरे चरण में टीम दक्षिण दिल्ली के संगम विहार पहुँची, जहाँ एक समान पैटर्न देखने को मिला. एक स्थानीय गैस एजेंसी पर कर्मचारियों ने बिना वैध बुकिंग स्लिप के सिलेंडर देने से फिर इनकार कर दिया. कर्मचारियों ने कहा कि ग्राहकों को उसी एजेंसी से सिलेंडर लेना होगा जहाँ उनका कनेक्शन पंजीकृत है. लेकिन एजेंसी से थोड़ी ही दूरी पर छोटे-छोटे दुकानों में एलपीजी सिलेंडर खुलेआम बेचे जा रहे थे. रिपोर्टरों ने बर्फ वाली गली में स्थित एक दुकानदार हरीश से संपर्क किया.
शुरुआत में हरीश ने कहा कि उसके पास कोई अतिरिक्त सिलेंडर नहीं है. लेकिन थोड़ी बातचीत के बाद उसने 19 किलोग्राम का कमर्शियल सिलेंडर 4200 रुपये में देने की पेशकश की. इसके बाद हरीश ने रिपोर्टरों से अपनी मां से बात करने को कहा, जिन्होंने वही कीमत दोहराई और दावा किया कि सिलेंडर पूरी तरह भरा हुआ है. उनके अनुसार, उन्होंने पहले दो ऐसे सिलेंडर खरीदे थे जिनमें से एक पहले ही बेच दिया गया था.
2000 रुपये में सिलेंडर बेचने वाला एक और डीलर
संगम विहार में जांच के दौरान रिपोर्टरों की मुलाकात एक और कथित कालाबाज़ारी करने वाले डीलर प्रिंस से हुई. फोन पर संपर्क करने के बाद प्रिंस अपने एक साथी के साथ दुकान पर आया. संभावित पुलिस छापे से बचने के लिए दुकान के शटर बंद रखे गए थे. जब शटर थोड़ा ऊपर उठाया गया, तो अंदर कई सिलेंडर दिखाई दिए. प्रिंस के साथी ने पहले दावा किया कि कोई स्टॉक नहीं है और दिखाई देने वाले सिलेंडर खाली हैं. लेकिन बाद में उसने कहा कि शाम तक दो सिलेंडर का इंतजाम किया जा सकता है. आखिरकार रिपोर्टरों ने प्रिंस से 2000 रुपये में एक सिलेंडर खरीदा और भुगतान यूपीआई के माध्यम से किया.
छोटे गैस सिलेंडरों की अवैध रिफिलिंग
जांच में इलाके में चल रही एक और व्यापक अवैध गतिविधि का भी खुलासा हुआ- छोटे एलपीजी सिलेंडरों की रिफिलिंग. ये सिलेंडर आमतौर पर 4 से 6 किलो गैस वाले होते हैं और सड़क किनारे चाय की दुकानों, छोटे ढाबों और कम आय वाले परिवारों द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं, जिनके पास औपचारिक एलपीजी कनेक्शन नहीं होता. स्थानीय दुकानदार खुलेआम इन सिलेंडरों को 150 रुपये प्रति किलो की दर से भरने की पेशकश कर रहे थे. ग्राहकों को बताया गया कि वे अपनी जरूरत के अनुसार एक या दो किलो गैस भी भरवा सकते हैं.
अब उठ रहा ये बड़ा सवाल
यह जांच राजधानी में एलपीजी आपूर्ति श्रृंखला को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है. गैस एजेंसियां दावा करती हैं कि बिना उचित बुकिंग स्लिप के सिलेंडर जारी नहीं किए जा सकते. लेकिन उन्हीं एजेंसियों से कुछ ही मीटर दूर बड़ी संख्या में सिलेंडर खुलेआम काले बाजार में उपलब्ध हैं. यह आशंका पैदा होती है कि असली ग्राहकों के लिए भेजे गए सिलेंडर वितरण श्रृंखला में कहीं न कहीं डायवर्ट किए जा रहे हैं. उपभोक्ताओं के आर्थिक शोषण के अलावा यह रैकेट गंभीर सुरक्षा जोखिम भी पैदा करता है. अवैध भंडारण, अनधिकृत रिफिलिंग और गैस की चोरी घनी आबादी वाले इलाकों में दुर्घटनाओं और विस्फोट का कारण बन सकती है.
फिलहाल एक सवाल अनुत्तरित है कि अगर गैस एजेंसियां बुकिंग नियमों का सख्ती से पालन कर रही हैं, तो इतनी बड़ी संख्या में एलपीजी सिलेंडर आखिर काले बाजार तक पहुंच कैसे रहे हैं?
(नरेला, नई दिल्ली से राजेश खत्री की अतिरिक्त रिपोर्टिंग के साथ)