दिल्ली हाईकोर्ट ने वृद्धावस्था और विधवा पेंशन को विधायक के जरिए रिलीज करने से जुड़े केस में दिल्ली सरकार के फैसले को निरस्त कर दिया है. पेंशन पाने की प्रकिया अब पहले की तरह ही लागू होगी. पेंशन लेने वाले लोग सरकारी पोर्टल पर ही जाकर अप्लाई कर सकते है. दिल्ली सरकार ने ऑनलाइन पेंशन बंद कर दी थी. इतना ही नहीं सोशल वेलफेयर ऑफिस को भी सरकार ने बंद कर दिया था. पेंशन के लिए विधायक कार्यालय में ही जाकर अप्लाई करना पड़ रहा था. पासवर्ड भी विधायक कार्यालय से ही अप्लाई करने पर मिलता था.
इस वजह से लोगों का पब्लिक ट्रांसपोर्ट से विधायक के दफ्तर तक पहुंचना मुश्किल हो रहा था. एक आरोप ये भी था कि विधायक कार्यालय में पार्टी से जुड़े लोगों को ही लाभ दिया जा रहा था. पेंशन को लेकर इन ऑफिसों में कोई भी शेड्यूल नहीं बना था. इस वजह से वृद्ध और विधवाएं पेंशन के लिए धक्के खाने के लिए मजबूर थीं. जिसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार के सोशल वेलफेयर विभाग सचिव से पिछली सुनवाई पर जवाब मांगा था, जिस पर ही उन्होंने कहा था कि आधार कार्ड की अनिवार्यता से लोगों को परेशानी हो रही थी. इसलिए तय किया गया कि यह पेंशन विधायक के माध्यम से रिलीज की जाए.
लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि विधायक के माध्यम से पेंशन लेने में लोगों को ज्यादा परेशानी हो रही है. हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पहले के मुकाबले अब ज्यादा परेशानी है, इसलिए दिल्ली सरकार को पोर्टल को ही बेहतर करने के प्रयास करने चाहिए. हाईकोर्ट ने सुझाव दिया कि पोर्टल को ऑटो मोड में भी ओपन रहने दिया जाए. जिससे अगर किसी बेनिफिशरी की मृत्यु हो जाए तो पोर्टल में अप्लाई करने का स्पेस ख़ुद बन जाए. इससे राजनीतिक हस्तक्षेप भी हटेगा और अप्लाई करने वाले व्यक्ति को भी ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा.
दरअसल, दिल्ली सरकार ने विधवा और बुजुर्गों को आसानी से पेंशन उपलब्ध कराने के लिए आधार की अनिवार्यता को खत्म करने का फैसला किया था. सरकार की सोच थी कि आधार कार्ड की अनिवार्यता से लोगों को परेशानी हो रही थी. लेकिन दिल्ली सरकार के फैसले के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई. याचिका के जरिए दिल्ली सरकार के पेंशन रिलीज करने के एक मात्र अधिकार इलाके के विधायक को सौंपे जाने को लेकर किए गए सरकार के फैसले को चुनौती दी गई.
याचिका में दिल्ली सरकार की डोर स्टेप डिलीवरी को भी उदाहरण के तौर पर कोर्ट के सामने पेश किया गया. याचिकाकर्ता का कहना था कि एक तरफ तो सरकार डोर स्टेप डिलीवरी के जरिए बेहतर सुविधाएं और लोगों की समस्या जल्द सुलझाने का दावा कर रही है. वहीं वृद्धों और विधवाओं के लिए खुद सरकार परेशानी का सबब बन रही है. हाई कोर्ट ने इस पर दिल्ली सरकार से हलफनामा मांगा और दिल्ली सरकार के वकील ने हलफनामे के तहत कोर्ट को बताया कि पेंशन योजना में शिकायतों के आधार पर ही यह फैसला लिया गया था.
लेकिन हाई कोर्ट सरकार के हलफनामे से असंतुष्ट था. कोर्ट का कहना था कि यह एक सरकारी स्कीम है. ऐसे में दिल्ली सरकार अपने विधायक को ऐसे अधिकार भला कैसे दे सकती है और वो भी पहले आओ पहले पाओं के आधार पर. कोर्ट का कहना था कि अगर सरकार को कुछ शिकायतें मिली हैं तो उसका समाधान सोशल वेलफेयर विभाग द्वारा किया जाना चाहिए. इसीलिए हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार के इस फैसले को निरस्त कर दिया.