महिलाओं को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला लिया है. कोर्ट ने कहा है कि अगर पत्नी कमाने में सक्षम है तो भी पति उसे गुजारा भत्ता देने से इनकार नहीं कर सकता, क्योंकि ज्यादातर मामलों में पत्नियां परिवार के लिए अपना करियर छोड़ देती हैं.
दरअसल, निचली अदालत ने एक आर्मी अफसर को अपनी पत्नी को 33 हजार रुपये हर महीने गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था. पति ने निचली अदालत के इसी फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. पति का कहना था कि उसकी पत्नी पहले टीचर रही है, इसलिए वो कमाने में सक्षम है, इसलिए उसे गुजारा भत्ता देने का आधार नहीं बनता.
हाई कोर्ट ने पति की इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि क्योंकि पत्नी कमाने में सक्षम है, इसलिए उसे गुजारा भत्ता देने का आधार नहीं बनता, ये सही नहीं है. कई बार पत्नियां परिवार के लिए अपना करियर छोड़ देती हैं.
हाई कोर्ट ने पति की उस दलील को भी खारिज कर दिया जिसमें उसने कहा था कि वो एक आर्मी अफसर है इसलिए इसका फैसला आर्म्ड ट्रिब्यूनल करेगा. इस पर कोर्ट ने कहा कि आर्मी के आदेश सीआरपीसी की धारा 125 के प्रावधानों से बढ़कर नहीं हो सकते है. ये नहीं कहा जा सकता कि सेना के जवान सिर्फ आर्मी ऑर्डर के तहत आते हैं और धारा 125 उनपर लागू नहीं होती.
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हालांकि, कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में थोड़ा सुधार करते हुए गुजारा भत्ते की रकम कम कर दी, क्योंकि पत्नी के साथ अब बच्चे नहीं रहते. कोर्ट ने आदेश दिया है कि पति हर महीने 14 हजार 615 रुपये देगा. ये आदेश 1 अप्रैल 2017 से लागू होगा. कोर्ट ने कहा कि 2015 से बच्चे पति के साथ रह रहे हैं, इसलिए पत्नी को उसका ही हक मिलेगा.
हालांकि, याचिकाकर्ता पति ने हाई कोर्ट के इस फैसले का भी विरोध करते हुए कहा कि उसकी पत्नी के संबंध दूसरे आर्मी अफसर के साथ थे, इसलिए वो उसे गुजारा भत्ता नहीं दे सकता. वहीं, पत्नी ने कहा कि उसका पति अपनी जिम्मेदारी से नहीं भाग सकता. पत्नी ने आरोप लगाया कि उसके पति ने हमेशा उसे और बच्चों को नजरअंदाज किया और जब उसने अलग रहने का फैसला लिया तो व्यभिचार (एडल्ट्री) का आरोप लगा दिया.
इसके बाद हाई कोर्ट ने कहा कि व्यभिचार है या नहीं, इस पर सबूतों के आधार पर ही फैसला लिया जा सकता है. कोर्ट ने कहा कि अदालत इस समय सिर्फ गुजारा भत्ते की रकम तय कर रही है.