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आदिवासी CM, एक OBC और एक जनरल डिप्टी सीएम... छत्तीसगढ़ में BJP ने सेट कर दिया 2024 का मंच

छत्तीसगढ़ में सरकार की कमान आदिवासी नेता विष्णुदेव साय के हाथ सौंपने का ऐलान बीजेपी ने कर दिया है. सरकार में एक सामान्य और एक ओबीसी वर्ग से, दो डिप्टी सीएम भी बनाए जाएंगे. बीजेपी का ये दांव महज पावर बैलेंस का फॉर्मूला है या 2024 चुनाव से पहले वोटों का गणित साधने की रणनीति?

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छत्तीसगढ़ के नए मुख्यमंत्री होंगे विष्णुदेव साय (फाइल फोटो)
छत्तीसगढ़ के नए मुख्यमंत्री होंगे विष्णुदेव साय (फाइल फोटो)

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को मिली जीत के बाद छत्तीसगढ़ में सरकार की तस्वीर कुछ वैसी ही है, जैसे कयास लगाए जा रहे थे. आदिवासी, ओबीसी और सामान्य वर्ग, सबको साधने के लिए यूपी की तर्ज पर वन प्लस टू फॉर्मूले की चर्चा थी और ऐसा ही हुआ भी. बीजेपी ने दिग्गज आदिवासी नेता, पार्टी के पुराने कद्दावर विष्णुदेव साय को मुख्यमंत्री बनाने का ऐलान कर दिया है. विजय शर्मा के रूप में सामान्य और अरुण साव के रूप में ओबीसी चेहरे की डिप्टी सीएम पद पर ताजपोशी भी तय हो गई है.

आदिवासी सीएम के साथ दो डिप्टी सीएम बनाने की जरूरत बीजेपी को क्यों पड़ी? इसे लेकर भी छिड़ी हुई है. दरअसल, बीजेपी साल 2003 से लेकर 2018 तक सूबे की सत्ता पर काबिज रही है. इस दौरान डॉक्टर रमन सिंह मुख्यमंत्री थे लेकिन पार्टी को कभी डिप्टी सीएम बनाने की जरूरत नहीं पड़ी. लेकिन तब और अब में फर्क है. 2008 और 2013 के चुनाव में डॉक्टर रमन ही पार्टी का सीएम फेस हुआ करते थे लेकिन इसबार ऐसा नहीं था.

छत्तीसगढ़ के चुनाव में बीजेपी पीएम मोदी का चेहरा आगे कर सामूहिक नेतृत्व के साथ चुनाव मैदान में उतरी थी. बीजेपी ने आदिवासी बाहुल्य इलाकों में जबरदस्त प्रदर्शन किया है और पार्टी के सामने अपना आदिवासी गढ़ बचाए रखने की चुनौती है. लोकसभा चुनाव में भी अब कुछ ही महीने बाकी हैं. ऐसे में बीजेपी नहीं चाहेगी कि आदिवासी-ओबीसी और सामान्य को लेकर वोटों के जिस समीकरण ने उसे सूबे की सत्ता तक पहुंचा दिया, वह किसी भी तरह से खतरे में आए.

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विजय शर्मा और अरुण साव (फाइल फोटो)
विजय शर्मा और अरुण साव (फाइल फोटो)

छत्तीसगढ़ में आदिवासी समाज की आबादी करीब 34 फीसदी है जो क्वांटिफायबल डेटा आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक 41 फीसदी ओबीसी के बाद आबादी के लिहाज से दूसरा सबसे बड़ा वर्ग है. आदिवासी वर्ग से आदिवासी सीएम की मांग भी उठती रही है. छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद अजीत जोगी जरूर पहले मुख्यमंत्री बने थे जो आदिवासी समुदाय से ही आते थे, लेकिन तब से अब तक कोई भी आदिवासी नेता सूबे की सत्ता के शीर्ष पर काबिज नहीं हो सका था.

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विधानसभा चुनाव से पहले आदिवासी नायकों के नाम पर बीजेपी ने पुरखौती सम्मान यात्रा जैसी यात्राएं निकालीं, अलग-अलग कार्यक्रम किए. अब पार्टी नहीं चाहेगी कि लोकसभा चुनाव जब कुछ ही महीने दूर हैं, आदिवासी मतदाता नाराज होकर फिर छिटक जाएं. ऐसी ही स्थिति छत्तीसगढ़ की सियासत में प्रभावी साहू समाज को लेकर भी थी. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष अरुण साव भी साहू समाज से ही हैं. सीएम की रेस में प्रदेश अध्यक्ष के नाते अरुण का नाम भी था.

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अब बीजेपी के सामने एक तरफ कुआं, दूसरी तरफ खाई जैसी स्थिति थी. साहू को सीएम बनाएं तो आदिवासी नाराज और आदिवासी को सीएम बनाएं तो साहू के छिटकने का डर. बीजेपी ने झारखंड, ओडिशा जैसे राज्यों में भी आदिवासी वोट की अहमियत को देखते हुए आदिवासी कार्ड चलने का निर्णय लिया और साहू समाज के साथ ही अन्य तबकों को संतुष्ट करने के लिए दो डिप्टी सीएम बनाकर पावर बैलेंस की रणनीति अपनाई. पिछले लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक रैली में कहा था कि छत्तीसगढ़ में जो साहू समाज के लोग हैं, गुजरात में यही मोदी कहे जाते हैं.

बीजेपी ने पीएम मोदी का चेहरा आगे कर लड़ा था चुनाव (फाइल फोटोः पीटीआई)
बीजेपी ने पीएम मोदी का चेहरा आगे कर लड़ा था चुनाव (फाइल फोटोः पीटीआई)

कहा ये भी जा रहा है कि बीजेपी को भरोसा था कि अरुण साव को डिप्टी सीएम बनाने के साथ ही पीएम मोदी के चेहरे को आगे कर साहू समाज की नाराजगी के खतरे से पार पाया जा सकता है. लेकिन आदिवासी छिटके तो मुश्किल होगी. एक वजह ये भी है कि छत्तीसगढ़ में लोकसभा की भले ही 11 सीटें हैं, बीजेपी की नजर देशभर की एसटी आरक्षित 41 से 47 सीटों पर है. छत्तीसगढ़ की सीमा सात राज्यों- मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड और उत्तर प्रदेश से लगती है. खास बात ये है कि इन सात राज्यों के वह इलाके भी आदिवासी बाहुल्य हैं जो सूबे की सीमा से सटे हैं.

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बीजेपी के दांव पर क्या कहते हैं जानकार

राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी ने कहा कि 2018 में छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान में हार के बाद झारखंड की हार ने बीजेपी नेतृत्व के लिए वेकअप कॉल की तरह काम किया. बीजेपी ने आदिवासी प्रतीकों के नाम पर यात्राएं कीं, भोपाल के हबीबगंज स्टेशन का नामकरण किया, बिरसा मुंडा की जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने का ऐलान किया. द्रौपदी मुर्मू को उम्मीदवार बनाना हो या बाबूलाल मरांडी को झारखंड बीजेपी का अध्यक्ष बनाया जाना, ये सभी कदम भी बीजेपी की 'लुक एसटी' पॉलिसी का ही अंग थे. अब छत्तीसगढ़ में आदिवासी सीएम का दांव अलग-अलग राज्यों में रहने वाले आदिवासियों के बीच भी बीजेपी की जमीन मजबूत करने में सहायक साबित हो सकता है.

देश में कितनी है आदिवासी आबादी

देश में अनुसूचित जनजाति यानी आदिवासियों की आबादी करीब नौ फीसदी है. एसटी के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 41 से 47 ही है लेकिन आरक्षित सीटों के अलावा भी करीब दो दर्जन सीटों पर आदिवासी मतदाता परिणाम निर्धारित करने में निर्णायक रोल निभाते हैं. बीजेपी की रणनीति आदिवासी सीएम के दांव को 2024 के चुनाव में वोटों के रूप में कैश कराने की होगी. बीजेपी का ये दांव कितना कारगर साबित हो पाता है, ये वक्त बताएगा.

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