रेप के एक मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अहम फैसला दिया है. अदालत ने कहा है कि महिला जननांग में पेनिट्रेशन के बिना ही अगर इजैक्युलेशन हो जाए तो ऐसे अपराध को ‘बलात्कार का प्रयास’ माना जाएगा और यह IPC की धारा 376 साथ-साथ धारा 511 के अंतर्गत दंडनीय होगा. इसी के साथ अदालत ने एक आदमी की सजा को रेप से बदलकर रेप की कोशिश में बदल दिया है.
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कहा कि यदि पुरुष जननांग को महिला के निजी अंग पर रखा गया हो और उसके बाद बिना पेनिट्रेशन के ही स्खलन हो जाए, तो इसे भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के तहत ‘बलात्कार’ नहीं माना जा सकता है.
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने यह टिप्पणीएक आपराधिक अपील पर सुनवाई के दौरान की. ये लगभग 20 वर्ष पुराना मामला है. इसमें निचली अदालत द्वारा आरोपी को बलात्कार का दोषी ठहराया गया था. मामले के तथ्यों और साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पाया कि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि घटना के दौरान वास्तविक रुप से पेनिट्रेशन हुआ था. जो कि बलात्कार की परिभाषा के लिए आवश्यक तत्व है.
बिना पेनिट्रेशन के स्खलन रेप नहीं: HC
अदालत ने अपने फैसले में IPC की धारा 375 की कानूनी व्याख्या करते हुए कहा कि बलात्कार के अपराध के लिए ‘penetration’ यानी पैठ का होना अनिवार्य है. केवल स्त्री जननांग के संपर्क में पुरुष जननांग का आना या बिना पेनिट्रेशन के स्खलन हो जाना, कानूनन बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता. हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह का कृत्य गंभीर आपराधिक प्रकृति का है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता.
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इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दी गई बलात्कार की सजा को संशोधित करते हुए आरोपी को ‘बलात्कार के प्रयास’ का दोषी ठहराया. कोर्ट ने माना कि आरोपी की मंशा और कृत्य यह दर्शाते हैं कि उसने बलात्कार करने का प्रयास किया, लेकिन वह अपने उद्देश्य में पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सका.
कानूनी प्रावधानों और अपराध के तत्वों का पालन जरूरी: HC
अदालत ने यह भी कहा कि कानून का उद्देश्य अपराध की गंभीरता के अनुरूप सजा सुनिश्चित करना है. ऐसे मामलों में जहां पीड़िता की गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता पर हमला हुआ हो, वहां दोष सिद्ध होने पर सख्त दंड दिया जाना चाहिए, लेकिन सजा तय करते समय कानूनी प्रावधानों और अपराध के तत्वों का पालन भी उतना ही आवश्यक है.
इस फैसले को आपराधिक कानून की व्याख्या के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसमें बलात्कार और बलात्कार के प्रयास के बीच कानूनी अंतर को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है.
रेप की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
गौरतलब है कि रेप की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट का एक अहम फैसला आया है. सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को बदलते हुए कहा है कि ब्रेस्ट पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खींचना "रेप की कोशिश" के बराबर है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को बदल दिया है. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि एक बच्ची के ब्रेस्ट को पकड़ना, उसके पायजामे का नाड़ा खोलना और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना रेप या रेप की कोशिश नहीं है.