छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र, जो कभी नक्सलवाद का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता था, आज एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है. सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों और रणनीतिक कार्रवाई ने नक्सल नेटवर्क की कमर तोड़ दी है. इसके बाद केंद्र सरकार ने नक्सल मुक्त भारत की घोषणा की है. कुछ महीने पहले बस्तर के जंगलों में चलाया गया 'ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट' इस दिशा में एक बड़ी सफलता के रूप में सामने आया था.
इस ऑपरेशन ने न सिर्फ नक्सलियों के संगठित ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया, बल्कि उनके हथियारों और विस्फोटक तंत्र को भी गंभीर झटका दिया, लेकिन इस सफलता के पीछे एक खतरनाक सच्चाई भी छिपी हुई है. सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट के दौरान कुल 21 मुठभेड़ों में 31 नक्सलियों को ढेर किया गया.
यह हाल के सालों में सबसे प्रभावी एंटी-नक्सल ऑपरेशनों में गिना जा रहा है. इस दौरान भारी मात्रा में हथियार और विस्फोटक सामग्री भी बरामद हुई, 35 आधुनिक हथियार, 450 आईईडी, 899 कॉर्डेक्स वायर बंडल.
सुरक्षा बलों ने 52 डंप साइट्स, 152 बंकर और 12 अस्थायी ठिकानों को भी खोजकर नष्ट किया. इन ठिकानों से सिर्फ हथियार ही नहीं, बल्कि खाने-पीने का सामान, मशीनें और विस्फोटक बनाने के उपकरण भी मिले थे. ये आंकड़े बताते हैं कि नक्सलियों ने इस क्षेत्र में कितनी गहराई से अपनी जड़ें जमा रखी थीं.
इन तमाम हथियारों के डंप को सुरक्षा बलों ने कुर्रईगुटा की पहाड़ियों में नष्ट कर दिया था पर बस्तर के जंगलों में आज भी डी माइनिंग जारी है. हाल ही में सुरक्षा बलों की एक टीम जब कांकेर और नारायणपुर इलाके में डी माइनिंग कर रही थी तो चार जवान उसमें हताहत हुए थे. जिसमें कुछ समय बाद चारों जवान शहीद हो गए थे,सुरक्षा बलों की सूत्रों की माने तो नक्सलियों ने बस्तर के तमाम इलाकों में आईईडी का जाल बिछा रखा है, जो की खतरों से भरा हुआ है.
खासतौर पर छोटी पहाड़ी इलाके और अबूझमाड़ के घने जंगल हैं , जहां सबसे ज्यादा खतरा है. यहां बड़े स्तर पर नक्सलियों ने आईईडी बिछा रखा है. दरअसल कुर्रईगुट्टा और आसपास की पहाड़ियां नक्सलियों की राजधानी थी और यहां हर एक पग पर नक्सलियों ने विस्फोटकों का जाल बिछाया था. जिसकी डी-माइनिंग सुरक्षा बलों ने की लेकिन आज भी खतरा बना है, जिसको लगातार सिक्योरिटी फोर्सेज डी-माइनिंग करके विस्फोटकों को खत्म कर रही हैं.
कुछ इलाकों में आज भी खतरा
सुरक्षा बलों के सूत्रों ने आजतक को जानकारी दी है कि कुर्रईगुट्टा की पहाड़ियों और अबूझमाड़ को जहां पर नक्सलियों ने भारी मात्रा में हथियार डंप छुपा रखे थे, वहां आसपास जगह पर डी माइनिंग किया गया पर अभी भी कई ऐसे इलाके हैं जहां पर डी माइनिंग की जरूरत है, क्योंकि कुर्रईगुटा की पहाड़ियां 50 किलोमीटर लंबी है. यहां की पहाड़ियों में नक्सलियों ने बड़े पैमाने पर आईईडी बिछाए हुए थे.
जहां से हथियारों और विस्फोटकों का जखीरा बरामद किया गया था, अनुमान के मुताबिक, यहां करीब 1300 से 1400 विस्फोटक लगाए गए थे, और कई पहाड़ी की जगह पर करीब 20 से 25 मीटर पर एक विस्फोटक मौजूद था. जिसको डी माइनिंग करके सुरक्षा बलों ने विस्फोटक बरामद किए, कई जगह अभी भी विस्फोटक निकालने की प्रक्रिया चल रही है.
सुरक्षा बलों के सूत्रों की माने तो यह इलाका किसी 'माइनफील्ड' से कम नहीं था. ये आईईडी सिर्फ सुरक्षा बलों को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं थे, बल्कि आम नागरिकों में डर बनाए रखने और इलाके में लंबे समय तक अपने आप को सुरक्षित बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा थे.
सूत्रों के मुताबिक इन सबके पीछे नक्सलियों का मकसद यह था कि जब नक्सली कमांडर यह जगह छोड़कर के जाएं तो यहां पर कोई भी सिक्योरिटी फोर्सज आए तो उनको काफी नुकसान पहुंचे. सुरक्षा बल ने यहां हर कदम रखते हुए डी माइनिंग कर रहे हैं लेकिन कई ऐसे इलाके हैं जहां अभी भी हथियारों के डंप ढूंढे जा रहे हैं और डी माइनिंग की जा रही है. आज भी सुरक्षा बलों को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है.
जानकारों के मुताबिक, उनके मुताबिक नक्सलियों ने जब दबाव में आकर अपने ठिकाने छोड़े, तो उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से आईईडी बिछाए. इसका मकसद था सुरक्षा बलों की मूवमेंट को धीमा करना, डी-माइनिंग को मुश्किल बनाना, इलाके में मनोवैज्ञानिक डर बनाए रखना. यानी, भले ही नक्सली शारीरिक रूप से पीछे हट गए हों, लेकिन उनका खतरा अभी भी जमीन के नीचे जिंदा है.
आईईडी क्या है और क्यों है इतना खतरनाक?
आईईडी यानी इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस, एक ऐसा विस्फोटक होता है जिसे स्थानीय संसाधनों से तैयार किया जाता है. नक्सली इसे जिलेटिन, बारूद, तार, बैटरी और अन्य सामग्री से बनाते थे. इनकी सबसे खतरनाक बात यह है कि इन्हें कहीं भी छुपाया जा सकता है. ये प्रेशर, रिमोट या टाइमिंग से एक्टिव हो सकते हैं, कई बार मेटल डिटेक्टर से भी पकड़ में नहीं आते. यही वजह है कि आईईडी नक्सल युद्ध का सबसे घातक हथियार माना जाता है.
डी-माइनिंग: सबसे मुश्किल काम
अब सबसे बड़ी चुनौती है जमीन में दबे आईडी (बारूदी सुरंगों) को ढूंढकर हटाना. इसे ही डी-माइनिंग कहा जाता है. सुरक्षा बल इसके लिए खास टीम, डॉग स्क्वॉड और मशीनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन यह काम आसान नहीं है. जंगल बहुत घने हैं, कई जगह रास्ते भी नहीं हैं और पहाड़ी इलाका होने की वजह से हर कदम पर खतरा बना रहता है. जवानों को धीरे-धीरे आगे बढ़ना पड़ता है और हर इंच जमीन को चेक करना होता है.
बारिश के मौसम में मुश्किल और बढ़ जाती है. जमीन नरम हो जाती है, जिससे कभी-कभी आईईडी पकड़ में आ जाते हैं, लेकिन कई बार ये और ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं या अपनी जगह बदल लेते हैं. इस वजह से डी-माइनिंग का काम बहुत धीमा और जोखिम भरा है, लेकिन लोगों की सुरक्षा के लिए इसे लगातार जारी रखना जरूरी है.
डी-माइनिंग अभियान के दौरान आईईडी विस्फोट की चपेट में आने से कांकेर डीआरजी (DRG) के 4 सदस्य घायल हो गए थे. जिसमे 3 जवान इंस्पेक्टर सुखराम वट्टी, कॉन्स्टेबल कृष्णा कोमरा, बस्तर फाइटर कॉन्स्टेबल संजय गढपाले अत्याधिक ज़ख़्मी होने से घटना स्थल पर शहीद हो गए. 1 जख़्मी जवान बस्तर फाइटर कॉन्स्टेबल परमानंद कोर्राम को बेहतर उपचार के लिए रायपुर ले जाया गया था, जहां उपचार दौरान उनका निधन हो गया.
बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पट्टिलिंगम के अनुसार पिछले कुछ महीनों में आत्मसमर्पित माओवादी कैडरों द्वारा दी गई जानकारी और अन्य इनपुट के आधार पर माओवादियों की ओर से पूर्व में छिपाकर रखे गए सैकड़ों आईईडी बस्तर रेंज में पुलिस, सुरक्षा बलों ने बरामद कर निष्क्रिय किए. 2 मई की दुर्भाग्यपूर्ण घटना में, जब कांकेर जिला पुलिस दल आईईडी को निष्क्रिय कर रहा था, तभी वह आकस्मिक रूप से विस्फोटित हो गया, जिसके कारण कुल 4 पुलिस बल के सदस्यों की मृत्यु हो गई.
बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई में बड़ी सफलता जरूर मिली है, लेकिन अभी इसे पूरी जीत नहीं कहा जा सकता. जमीन में दबे सैकड़ों आईईडी अब भी खतरा बने हुए हैं. नक्सली भले ही पीछे हट गए हों, लेकिन उनका बिछाया हुआ जाल अभी खत्म नहीं हुआ है. यही छिपा खतरा आज भी बस्तर के लिए बड़ी चिंता बना हुआ है.