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Opinion: नीतीश कुमार का मास्टर स्ट्रोक

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पद छोड़कर यह जताया कि वे लोकतंत्र के उच्च मानदंडों में विश्वास करते हैं और नैतिकता उनके लिए बड़ी चीज है. इसमें कोई शक नहीं कि नीतीश कुमार एक प्रतिबद्ध और ईमानदार मुख्यमंत्री के रूप में जाने जाते रहे हैं और इसमें भी कोई दो राय नहीं कि उन्होंने बिहार को 'अंधेरे युग' से बाहर निकाला है.

नीतीश कुमार नीतीश कुमार

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पद छोड़कर यह जताया कि वे लोकतंत्र के उच्च मानदंडों में विश्वास करते हैं और नैतिकता उनके लिए बड़ी चीज है. इसमें कोई शक नहीं कि नीतीश कुमार एक प्रतिबद्ध और ईमानदार मुख्यमंत्री के रूप में जाने जाते रहे हैं और इसमें भी कोई दो राय नहीं कि उन्होंने बिहार को 'अंधेरे युग' से बाहर निकाला है.

राष्ट्रीय जनता दल के 15 वर्षों के कुशासन का जो दंश बिहार ने झेला है उससे उन्होंने राहत दिलाई. बिहार को अराजकता और लूट से बाहर निकलने में उन्होंने पूरी कोशिश की. इसलिए उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं रही. इससे शायद उनमें अति आत्मविश्वास पैदा हो गया और उन्होंने अपनी संप्रभुता को मजबूत करने के लिए बड़ा कदम उठाया.

पिछले साल उन्होंने नरेंद्र मोदी के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी से नाता तोड़ लिया, ठीक वैसे ही जैसे कभी नवीन पटनायक ने किया था. यह अति आत्मविश्वास से उपजा ऐसा कदम था कि उसके बाद नीतीश कुमार आगे का रास्ता ही खो बैठे. अपने कंधों पर डेढ़ दर्जन मंत्रालयों का भार लिए वह राजकाज चलाने की कोशिश करते रहे. यह बेहद कठिन था और परिणाम यह रहा कि वहां सरकारी काम काज में भारी शिथिलता आई और भ्रष्टाचार बढ़ा.

नरेन्द्र मोदी के तूफान में उनका कमजोर होता किला लगभग ढह गया. नीतीश कुमार राजनीति के साधारण खिलाड़ी नहीं हैं. उन्होंने लालू प्रसाद जैसे मंझे हुए राजनीतिज्ञ को एक बार नहीं कई बार मात दे दी है. ऐसे में उनसे यह उम्मीद करना कि वे हाथ पर हाथ रखे रह जाएंगे, बेवकूफी होगी. उन्होंने वो किया जो किसी के जहन में नहीं था. आनन-फानन में इस्तीफा देकर उन्होंने बाजी पलट दी.

इसके पहले कि बीजेपी उन पर जोरदार हमले कर सके या पार्टी में असंतोष के स्वर ऊंचे हो जाएं, उन्होंने मास्टर स्ट्रोक खेल दिया. इसके जरिये उन्होंने वाह-वाही पा ली बल्कि अपनी पार्टी को टूटने से बचा लिया, साथ ही सरकार को गिरने से. उन्होंने ऐसा माहौल पैदा किया जिससे पार्टी के बागी नेता तो धराशायी हो गए बल्कि आक्रामक हो रही बीजेपी भी हैरान रह गई.

अब वह पर्दे के पीछे रहकर सरकार चला सकते हैं और यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि उनके प्रतिद्वंद्वी आसानी से सत्ता पर काबिज न हो सकें. पार्टी में उन्होंने ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं कि पार्टी का कोई भी नेता अब असंतोष की बात न कर सके. नीतीश कुमार यह जानते हैं कि आगे का रास्ता इतना आसान नहीं है. लेकिन फिलहाल उन्होंने एक बढ़िया इंतजाम कर लिया है जिससे पार्टी के हाथों से सत्ता न जाने पाए.

बिहार में मोदी का तूफान अभी चल रहा है और ऐसे में सिर झुकाकर ही उसका मुकाबला करना राजनीति और वक्त का तकाजा है. नीतीश कुमार इस तूफान के कमजोर पड़ने का इंतजार कर रहे हैं. अगले साल बिहार में चुनाव होंगे तब तक के लिए उन्होंने बाजी अपने हाथों में ले ली है. अब यह बीजेपी के कौशल और सामर्थ्य पर निर्भर करता है कि वह इस चाल की क्या काट निकालती है.

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