केन्द्र सरकार के भूमि अधिग्रहण बिल का सीधा असर बिहार में बन रहे आईआईटी पर पड़ने जा रहा है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पटना के नजदीक बिहटा को एजुकेशनल हब बनाने का सपना भी टूट सकता है क्योंकि सरकार ने यहां जो जमीन अधिग्रहण किया था उस पर फिर से किसान और मुआवजे की मांग करते हुये अनशन पर बैठ गये हैं. किसानों की मांग है कि एक परियोजना के लिए अधिग्रहण किए गये जमीनों को एक जैसा मुआवजा मिलना चाहिए.
बिहटा में बन रहे आईआईटी के भवन पर ग्रहण लग गया है पिछले 8 दिनों से यहां कोई काम नहीं हुआ है, निर्माण का काम पूरी तरह से ठप है, मजदूर नदारत हैं. कारण यहां चल रहे किसानों का आंदोलन है पिछले 8 दिनों से किसान यहां आंदोलन कर रहे हैं, धरना दे रहे हैं. 8 किसान उपवास पर बैठे हैं. उनकी मांग है कि सरकार ने उनसे जो जमीन ली है उसका मुआवजा एक जैसा होना चाहिए.
बिहटा के किसान आनंद कुमार का कहना है कि पहले मेरे एक एकड़ जमीन की कीमत 55 हजार रुपये दी गई. अब हाल ही में सरकार ने उनसे 23 डिसमिल जमीन ली तो उसकी कीमत 9 लाख लगाई गई, जबकि दोनों जमीन एक ही परियोजना के लिए है. राज्य सरकार बिहटा में एजुकेशनल हब बनाने के लिए 2007 से जमीन का अधिग्रहण कर रही है. अबतक कुल 1700 एकड़ जमीन का अधिग्रहण हो चुका है जिसमें 500 एकड़ आईआईटी के लिए है.
उस समय से नया कानून बनाकर सरकार बाजार मूल्य से ढाई गुना कीमत किसानों को मुआवजे के रूप में दे रही है. लेकिन समय के साथ-साथ जमीन की कीमत भी बढ़ती गई, इसलिए मुआवजे में एकरूपता नहीं रह गयी. किसान इसी को आधार बनाकर सरकार से और मुआवजे की मांग कर रहे हैं. पिछले आठ दिनों से अपनी मांगों के लेकर धरने पर बैठे किसानों में से दो की हालत खराब होने की वजह से उन्हें पटना मेडिकल कालेज अस्पताल में भर्ती कराया गया है. किसानों से बात करने के लिए सरकार के आलाधिकारी आते हैं लेकिन किसान अपनी मांगों पर अटल हैं.
पटना के डिप्टी कलक्टर मुकेश कुमार किसानों से बातचीत तो करते हैं लेकिन एक परियोजना एक मुआवजा यहां लागू करना संभव नहीं है. फिर भी वो सरकार तक किसानों की बात पहुंचाएंगे. केन्द्र सरकार के भूमि अधिग्रहण कानून और बाद में बिहार सरकार द्वारा दूसरी जगहों पर एक परियोजना एक मुआवजा का नियम लागू होने के कारण किसानों की मांगों को नकारा नहीं जा सकता है क्योंकि सरकार ने भूमि का अधिग्रहण कर उस पर अपने परियोजना की शुरुआत तो कर दी है लेकिन मुआवजे की 80 फीसदी राशि ही अभी भुगतान कर पायी है और ये प्रक्रिया अभी चल ही रही है.
ऐसे में किसान पुरजोर तरीके से अपनी मांगों को उठा रहे हैं. आईआईटी के परिसर को जून 2014 तक पूरा करने का लक्ष्य है. अगर किसानों का विरोध ऐसे ही चलता रहा तो समय पर परियोजना पूरा होना मुश्किल दिखता है.