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लालू की सियासी विरासत संभालने के लिए तेजस्वी कितना तैयार हैं?

आरजोडी के मुश्किल भरे दौर में तेजस्वी बिहार की राजीनीति में खुद को स्थापित करने में कहां तक कामयाब हो पाते हैं और उसमें उनकी पार्टी के नेता किस हद तक उनकी मदद कर पाते हैं, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा?

लालू के बाद तेजस्वी पर RJD दांव? लालू के बाद तेजस्वी पर RJD दांव?

लालू यादव को चारा घोटाला मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद आरजेडी के सियासी भविष्य को लेकर चर्चाएं जोरों पर हैं. माना जा रहा है कि आरजेडी की कमान संभालने और लालू यादव की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने का जिम्मा तेजस्वी यादव के कंधों पर होगा.

ऐसे में सवाल उठता है कि तेजस्वी इस जिम्मेदारी को उठाने में कितना तैयार है. आरजोडी के मुश्किल भरे दौर में तेजस्वी बिहार की राजीनीति में खुद को स्थापित करने में कहां तक कामयाब हो पाते हैं और उसमें उनकी पार्टी के नेता किस हद तक उनकी मदद कर पाते हैं, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा?

बिहार यात्रा से बनाई अपनी पहचान

महागठबंधन से जब नीतीश कुमार ने नाता तोड़कर बीजेपी के संग सरकार बनाई, तो तेजस्वी यादव ने उनके खिलाफ माहौल बनाने के लिए सड़क पर उतरे थे. इसके जरिए उन्होंने बिहार की यात्रा किया औऱ जगह-जगह नीतीश और बीजेपी के खिलाफ जमकर बोले. इस यात्रा से तेजस्वी को सियासी पहचान मिली. डिप्टी सीएम रहते हुए इतनी पहचान वो नहीं बना सके, जितनी सरकार से अलग होने के बाद बनी.

आरजेडी के महासचिव अशोक सिंह ने आजतक से बातचीत करते हुए कहते हैं कि लालू प्रसाद के इंसाफ के लिए तेजस्वी के नेतृत्व में पूरी पार्टी जनता की अदालत जाएगी. प्रदेश भर की यात्रा होगी और बीजेपी की साजिशों को बेनकाब किया जाएगा. लालू यादव को उनकी विचाराधारा के चलते और एक साजिश के तहत लालू के परिवार को परेशान किया जा रहा है. इससे प्रदेश की जनता में आक्रोश है.

तेजस्वी के फैसलों में लालू की झलक

तेजस्वी यादव अपनी पिता लालू प्रसाद यादव के विचाराधारा के नक्से कदम पर चल रहे हैं. इसकी झलक महागठबंधन से नाता टूटने के बाद दिखी. नीतीश कुमार और बीजेपी की साझा सरकार बन जाने के बाद जिस तरह तेजस्वी यादव ने विधानसभा में अपना भाषण दिया उसमें लालू की झलक लोगों को नजर आई. वरिष्ठ पत्रकार काशी प्रसाद यादव कहते हैं कि जिस प्रकार लालू अपने भाषणों में ओबीसी, दलित और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की बात करत थे उसी तरह तेजस्वी भी सामाजिक न्याय और धर्म-निरपेक्ष की बात को पुरजोर तरीके से उठाते हैं.

तेजस्वी की असल चुनौती

तेजस्वी के लिए संगठन को संभालने और पार्टी को एकजुट रखने की असली परीक्षा से अब गुजराना होगा. कोर्ट के फैसला आने से पहले ही लालू ने तेजस्वी को अपने उत्ताराधिकारी को तौर पर पेश करना शुरू कर दिया था. जबकि कई वरिष्ठ लालू के इस फैसला के खिलाफ थे, ऐसे में तेजस्वी के सामने ऐसे नेताओं के साथ संतुलन बनाकर चलना एक चुनौती है. पार्टी के नेता अशोक सिंह कहते हैं कि तेजस्वी के अंदर वो सारी काबलियत है, पार्टी चलाने की. वो वरिष्ठ नेताओं का सम्मान करना जानता है और युवा को साथ लेकर चलना भी. इन सबके बावजूद पूरी पार्टी है जो सड़क से सांसद तक संघर्ष करने को तैयार है.

विपक्ष के निशाने पर होंगे तेजस्वी

लालू की नमौजूदगी में तेजस्वी पार्टी की कमान संभालते हैं तो विरोधी दलों के सीधे निशाने पर होंगे. ऐसे वक्त में उन्हें समझबूझकर सियासी कदम बढ़ाने होंगे. वरिष्ठ पत्रकार काशी यादव मानते हैं कि तेजस्वी से लेकर उनके परिवार के कई लोग जांच के घेरे में है. ऐसे में दबाव में आकर कोई गलत फैसला भी ले सकते हैं, जिससे उन्हें बचकर चलने की जरूरत होगी. क्योंकि लालू ही देश में ऐसे एकलौते नेता हैं, जिन्होंने किसी भी रूप में बीजेपी के साथ नहीं गए हैं. तेजस्वी भी उसी राह पर चल रहे हैं ऐसे मे उन्हें इस तरह की दबाव के लिए पहले से ही तैयार रहना होगा.

ऐसे समय में कौन खड़े होंगे साथ

तेजस्वी के लिए असल दोस्त पहचान और आगे साथ चलने के लिए यही वक्त है. लालू के जेल जाने के बाद उनके साथ कौन साथ कौन सा दल साथ खड़ा होता है और कौन दूर जाता है. क्योंकि बुरे दौर में इंसान की परछाई भी साथ छोड़ देत है. तेजस्वी के लिए ये वक्त ऐसा है, जब उन्हें भविष्य के दोस्त की पहचान करनी होगी. मान जा रहा है तेजस्वी ने अपने साथी की तलाश भी कर ली है. पिछले दिनों कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ डिनर किया और उनके अध्यक्ष की ताजपोशी के समय प्रधानमंत्री का रूप देखा. ये बात गवाही दे रहा है कि तेजस्वी ने भविष्य का पार्टनर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ चलने का मन बनाया है.

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