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चूहों की कुर्बानी नहीं होगी? अब लैब में होगी सांप के जहर की परीक्षा, इलाज भी होगा सस्ता

अब नई इन-विट्रो तकनीक से लैब में ही जहर और एंटी-वेनम की प्रभावशीलता जांची जाएगी, जिससे लागत कम होगी और जानवरों की कुर्बानी भी घटेगी. CSIR-CCMB और BFI के वैज्ञानिकों के अनुसार यह बदलाव एंटी-वेनम रिसर्च का भविष्य है और इससे ग्रामीण इलाकों में सस्ते और भरोसेमंद इलाज की उम्मीद बढ़ेगी.

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Snake: Many people seek treatment for snake bites. These cases increase during the rainy season. Many people seek treatment for snake bites. These cases increase during the rainy season.
Snake: Many people seek treatment for snake bites. These cases increase during the rainy season. Many people seek treatment for snake bites. These cases increase during the rainy season.

सांप के काटने पर अगर इंसान को तत्काल इलाज मिल जाए तो उसकी जान बचाना आसान हो जाता है. ये इलाज काफी महंगा होता है, साथ ही इसे तैयार करने के लिए अब तक सैकड़ों चूहों की कुर्बानी दी जाती थी. लैब में इसे परखने में लंबा वक्त लगता था और ये प्रोसेस भी काफी महंगा था. लेकिन, विज्ञान अब उस मोड़ पर खड़ा है जहां एंटी-वेनम (व‍िष न‍िवारक दवा) की टेस्टिंग जानवरों के बजाय लैब में हो सकती है, वो भी तेज, सस्ती और ज्यादा भरोसेमंद तरीके से.

क्या है पुराना तरीका और उसमें दिक्कत क्या थी?

CSIR-CCMB के लैकोन्स (LaCONES) के चीफ साइंटिस्ट डॉ. कार्तिकेयन वासुदेवन लंबे समय से एंटी वेनम पर काम कर रहे हैं. उन्होंने aajtak.in से बातचीत में कहा कि अब तक एंटी-वेनम की ताकत परखने के लिए ED50 टेस्ट किया जाता था. इसमें जहर और एंटी-वेनम के मिश्रण को चूहों में इंजेक्ट किया जाता था और देखा जाता था कि कितने चूहे बचते हैं. जिस डोज से 50 फीसदी चूहे जिंदा रह जाते, वही ED50 कहलाता.

इस एक ही प्रक्रिया में एक बैच की टेस्टिंग के लिए करीब 760 चूहों का इस्तेमाल होता था. अलग-अलग जहर, अलग अनुपात और बार-बार दोहराए जाने वाले प्रयोगों की वजह से यह तरीका न सिर्फ महंगा था, बल्कि नैतिक सवाल भी खड़े करता था.

अब क्या बदल रहा है?

डॉ वासुदेवन ने बताया कि अब नई इन-विट्रो टेस्टिंग तकनीक में पूरे जानवर की जगह लैब में ही शरीर की जैविक प्रक्रियाओं की नकल की जाती है. जैसे जहर खून को कैसे जमाता है,  मांसपेशियों या एंजाइम्स पर उसका क्या असर होता है और एंटी-वेनम उसे कितनी प्रभावी तरह से रोक पाता है. इन सभी पहलुओं को अलग-अलग लैब टेस्ट्स से परखा जाता है और फिर नतीजों को मिलाकर ये अंदाजा लगाया जाता है कि असली शरीर में क्या होगा.

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क्यों अहम है ये बदलाव?

डॉ. कार्तिकेयन वासुदेवन कहते हैं, 'इन-विट्रो टेस्टिंग एंटी-वेनम रिसर्च का भविष्य है. इससे हम जहर के असर को ज्यादा वैज्ञानिक और सटीक तरीके से समझ सकते हैं, बिना हर बार जानवरों पर निर्भर हुए. ये न सिर्फ नैतिक रूप से बेहतर है, बल्कि क्वालिटी कंट्रोल को भी मजबूत बनाता है.'

सस्ती दवा और ज्यादा जानें बचने की उम्मीद

ब्लॉकचेन फॉर इंपैक्ट (BFI) के CEO डॉ. गौरव सिंह के मुताबिक ये बदलाव सिर्फ लैब तक सीमित नहीं है, इसका सीधा असर मरीजों तक पहुंचेगा. डॉ गौरव सिंह ने कहा कि एंटीवेनम की जांच हमेशा से वैज्ञानिक और नैतिक दृष्टिकोण से कठिन रही है क्योंकि ये जानवरों पर होने वाले परीक्षणों पर निर्भर रहती है. इसी कारण हमने ऐसे सरल, लैब-आधारित परीक्षण विकसित किए हैं, जिनसे जानवरों के उपयोग में 50 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है और उत्पादन लागत लगभग 30 प्रतिशत तक घट गई है. इससे दवाएं जल्दी और कम लागत में बन पाती हैं, जो ग्रामीण इलाकों के लिए बेहद लाभकारी है, जहां सांप के काटने से सबसे अधिक मौतें होती हैं. BFI में हमारा लक्ष्य देश में विकसित शोध को प्रयोगशाला से सीधे लोगों तक पहुंचाना है.

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