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कुछ लड़कों की क्यों होती है लड़कियों जैसी पतली आवाज! डॉ. सरीन ने बताया कारण और सुधारने का तरीका

18 साल की उम्र में भी अगर आवाज भारी न हो, तो यह महज एक संयोग नहीं बल्कि सेहत से जुड़ा गंभीर संकेत हो सकता है. डॉ. शिव सरीन की यह कहानी बताती है कि कैसे शरीर का बढ़ता वजन और मोटापा पुरुषों के टेस्टोस्टेरोन लेवल को प्रभावित करता है.

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कुछ लड़कों की अवाजा इतनी पतली होती है कि वो उसके कारण काफी शर्मिंदगी महसूस करते हैं. (Photo: AI Generated)
कुछ लड़कों की अवाजा इतनी पतली होती है कि वो उसके कारण काफी शर्मिंदगी महसूस करते हैं. (Photo: AI Generated)

पुरुष और महिला दोनों की आवाजों में फर्क होता है. उदाहरण के लिए पुरुषों की आवाज थोड़ी भारी और महिलाओं की थोड़ी पतली होती है. लेकिन आपने देखा होगा कई लड़के-पुरुष ऐसे होते हैं जिनकी आवाज काफी पतली होती है जिस कारण कई बार उनका मजाक भी बनाते हैं कि उनकी आवाज तो लड़कियों के जैसी है. लेकिन क्या आप जानते हैं उनकी इस पतली आवाज का कारण क्या होता है? लिवर स्पेशलिस्ट डॉ. शिव कुमार सरीन ने अपनी बुक में इस बारे में विस्तार से बताया है और साथ ही इसे ठीक करने का तरीका भी बताया है. तो आइए इस समस्या के कारण और इलाज के बारे में जानते हैं.

18 साल उम्र, कमर 44 इंच

डॉ. सरीन ने अपनी बुक में बताया कि चंडीगढ़ के एक शख्स उनके पास गॉल ब्लैडर के इलाज के लिए उनके पास आए थे और उनके साथ उनका 18 साल का बेटा अमरेंद्र भी आया था. अमरेंद्र का वजन काफी ज्यादा था और उसकी कमर लगभग 44 इंच थी. उसका कद और शरीर तो भारी था लेकिन उसकी आवाज और शारीरिक लक्षण उसकी उम्र से मेल नहीं खा रहे थे.' 

'जब उन्होंने उससे बात की तो वे हैरान रह गए. 18 साल की उम्र होने के बावजूद अमरेंद्र की आवाज बहुत पतली और महिलाओं जैसी थी. उसके चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ का नामोनिशान नहीं था और शरीर पर बाल भी नहीं थे. यह साफ संकेत था कि उसमें 'सेकेंडरी सेक्सुअल कैरेक्टर्स' की ग्रोथ समय पर नहीं हुई थी.'

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डॉक्टर ने जब अमरेंद्र की जांच की, तो पता चला कि उसका BMI 37 था और वह 'ग्रेड-2 फैटी लिवर' से पीड़ित था. सबसे चौंकाने वाली बात तब सामने आई जब उसका सीरम टेस्टोस्टेरोन लेवल चेक किया गया. पुरुषों में इसका सामान्य लेवल 270-1070 ng/dL होता है लेकिन अमरेंद्र में यह महज 92 ng/dL था. 

डॉ. सरीन के अनुसार, ओबेसिटी टेस्टोस्टेरोन लेवल को कम करती है. फैट सेल्स पुरुष हार्मोन को फीमेल हार्मोन में बदलने लगते हैं. रिसर्च बताती है कि कमर का घेरा अगर 4 इंच बढ़ता है तो टेस्टोस्टेरोन कम होने की संभावना 75 प्रतिशत तक बढ़ जाती है.

लड़कों में पतली आवाज का वैज्ञानिक कारण

द जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंडोक्रिनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म (JCEM) और ह्यूमन रिप्रोडक्शन की रिसर्च के अनुसार, पुरुषों की आवाज का भारी होना पूरी तरह से टेस्टोस्टेरोन हार्मोन पर निर्भर करता है. किशोरावस्था में यह हार्मोन गले के वॉयस बॉक्स (Larynx) को बढ़ाकर वोकल कॉर्ड्स को मोटा कर देता है. हालांकि जब शरीर में फैट की मात्रा अधिक हो जाती है तो यह फैट केवल चर्बी नहीं बल्कि एक एक्टिव अंग की तरह काम करने लगता है. इसमें मौजूद एरोमाटेज एंजाइम पुरुष हार्मोन टेस्टोस्टेरोन को महिला हार्मोन एस्ट्रोजन में बदलने लगता है. 

वैज्ञानिकों का मानना है कि जब एस्ट्रोजन बढ़ता है तो वॉयस बॉक्स की ग्रोथ रुक जाती है और आवाज मर्दाना होने के बजाय पतली रह जाती है. इसके अलावा, मोटापा मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस को मिलने वाले संकेतों को भी कमजोर कर देता है, जिससे टेस्टोस्टेरोन का उत्पादन ही कम हो जाता है.

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टेस्टोस्टेरोन हुआ था कम

अमरेंद्र को जो समस्या थी उसे हाइपोगोनाडिज्म (Male Obesity-Associated Secondary Hypogonadism) कहा जाता है. हाई इंसुलिन लेवल की वजह से टेस्टोस्टेरोन कम हो जाता है जिससे बच्चों के ग्रोथ पीरियड के दौरान उनके प्राइवेट पार्ट्स की वृद्धि कम हो सकती है, फोकस में कमी आ सकती है और भविष्य में स्पर्म काउंट भी कम हो सकता है. 

डॉ. सरीन ने चेतावनी दी कि यदि युवावस्था में ही वजन कम नहीं किया गया तो आगे चलकर इरेक्टाइल डिसफंक्शन और इनफर्टिलिटी जैसी समस्याएं हो सकती हैं. अमरेंद्र को एंडोक्रिनोलॉजिस्ट और डाइटिशियन की सलाह दी गई. उसने अपनी लाइफस्टाइल बदली, वेट ट्रेनिंग की और डाइट में बदलाव किए. 1 साल के अंदर न सिर्फ उसका वजन कम हुआ, बल्कि उसकी आवाज भी भारी (मर्दाना) हो गई.

आज अमरेंद्र काफी फिट है जिसने साबित किया कि सही समय पर लिया गया फैसला और डिसिप्लिन शरीर के बिगड़े हार्मोनल संतुलन को फिर से पटरी पर ला सकता है.

क्या है इस समस्या का इलाज?

मेडिकल साइंस से इसका सबसे प्रभावी इलाज दवाओं की अपेक्षा लाइफस्टाइल में बदलाव है. रिसर्च बताती हैं कि 5-10 प्रतिशत वजन कम करने से ही एरोमाटेज एंजाइम का प्रभाव कम हो जाता है और टेस्टोस्टेरोन का लेवल नेचुरल रूप से सुधरने लगता है. 

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एक्सपर्ट्स के अनुसार, रेसिस्टेंस ट्रेनिंग (जैसे वजन उठाना) और हाई-प्रोटीन डाइट शरीर की इंसुलिन संवेदनशीलता को बेहतर बनाते हैं जो हार्मोनल संतुलन को फिर से सुधारने में मदद करते हैं. यदि इन नेचुरल तरीकों से सुधार नहीं होता तभी एंडोक्रिनोलॉजिस्ट हार्मोन थेरेपी की सलाह देते हैं लेकिन रिसर्च स्पष्ट रूप से कहती हैं कि परमानेंट सुधार के लिए वजन कंट्रोल करना जरूरी है.

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