दुनिया में लगभग 85 करोड़ लोगों को किसी न किसी तरह की किडनी से संबंधित बीमारी है. भारत में 13.8 करोड़ वयस्क क्रॉनिक किडनी डिजीज से जूझ रहे हैं, जो दुनिया में चीन (15.2 करोड़) के बाद दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है. वहीं यह संख्या तेजी से बढ़ रही है क्योंकि डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और खराब लाइफस्टाइल इसके मुख्य कारण हैं. कई रिपोर्ट्स में इसे 'साइलेंट किलर' कहा गया है क्योंकि शुरुआती लक्षण नजर नहीं आते. कई स्थितियों में मरीजों को किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है. यह केवल एक सर्जरी नहीं होती बल्कि बल्कि मरीज को डायलिसिस के दर्दनाक चक्र से बाहर निकालने की भी एक प्रोसेस होती है.
जब दोनों किडनियां काम करना बंद कर देते हैं, तब शरीर के टॉक्सिन्स को निकालने के लिए ट्रांसप्लांट ही सबसे अच्छा उपाय होता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस पूरी प्रोसेस में कितना समय लगता है? अस्पताल में भर्ती होने से लेकर ऑपरेशन थिएटर से बाहर आने तक का सफर कैसा होता है? आइए, डिटेल में समझते हैं.
नेचर नेफ्रोलॉजी की रिपोर्ट के मुताबिक, किडनी ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया सर्जरी से कई हफ्ते पहले शुरू हो जाती है. इस प्रोसेस में सबसे पहले मरीज और डोनर के ब्लड ग्रुप का मिलान किया जाता है. फिर ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन (HLA) टाइपिंग और क्रॉस-मैचिंग टेस्ट होते हैं ताकि ये देख सकें कि शरीर नई किडनी को एक्सेप्ट करेगा या नहीं.
फिर यदि किडनी डोनर और रिसीवर के बीच सभी मेडिकल पैरामीटर्स सही होते हैं, तभी डॉक्टर्स आगे की प्रोसेस करते हैं. इसके साथ ही मरीज की फिजिकल स्ट्रेंथ, इंफेक्शन आदि से संबंधित भी कई टेस्ट किए जाते हैं.
किडनी ट्रांसप्लांट की मुख्य सर्जरी में आमतौर पर 3 से 5 घंटे का समय लगता है. सर्जरी से पहले जनरल एनेस्थीसिया दिया जाता है. इसके बाद सर्जन पेट के निचले हिस्से में चीरा लगाते हैं और नई किडनी लगाते हैं.
इस सर्जरी की खास बात ये है कि पुरानी या खराब किडनियों को तब तक नहीं निकाला जाता जब तक कि वे संक्रमण या हाई ब्लड प्रेशर का कारण न बन रही हों. नई किडनी की धमनियों और नसों को मरीज की ब्लड वेसिल्स से डोड़ा जाता है और उसके यूरिन पाइप को मरीज के मूत्राशय से जोड़ दिया जाता है ताकि यूरिन पास होने लगे.
सर्जरी सफल होने के बाद मरीज को लगभग 5 से 7 दिन तक हॉस्पिटल में ही ऑब्जर्वेशन में रखा जाता है. ऑपरेशन के बाद के शुरुआती 24 से 48 घंटे काफी अहम होते हैं क्योंकि इसी दौरान डॉक्टर यह देखते हैं कि नई किडनी ने काम करना शुरू किया है या नहीं.
किडनी डोनर को आमतौर पर 3 से 4 दिनों में छुट्टी मिल जाती है लेकिन रिसीवर मरीज को पूरी तरह रिकवर होने और अपनी नॉर्मल लाइफस्टाइल में आने में 6 से 12 हफ्ते का समय लग सकता है. इस दौरान इम्यूनोसप्रेस्टेंट दवाएं दी जाती हैं ताकि शरीर नए ऑर्गन को एक्सेप्ट कर ले.
ऑपरेशन के बाद जब मरीज डिस्चार्ज हो जाता है तो भी सावधानी की जरूरत होती है. मरीज को खान-पान, साफ-सफाई और दवाओं का स्ट्रिक्ट शेड्यूल फॉलो करना पड़ता है. शुरू के कुछ महीनों में इंफेक्शन का खतरा सबसे ज्यादा होता है इसलिए भीड़भाड़ वाली जगहों से बचने की सलाह दी जाती है.
इसके अलावा नियमित फॉलो-अप और सही लाइफस्टटाइल के साथ एक ट्रांसप्लांट की गई किडनी 12 से 20 साल या उससे भी अधिक समय तक बेहतर काम कर सकती है.