
ब्रेन स्टोक्स. यह बीमारी धीरे-धीरे हमारे यंग पॉपुलेशन को अपना निशाना बनाती जा रही है. एक रिसर्च के मुताबिक, अब ब्रेन स्ट्रोक की औसत उम्र 43 साल हो गई है, जो पहले 57 साल हुआ करती थी. 40 की उम्र में ब्रेन स्ट्रोक से तीन जनरेशन बर्बाद हो जा रही हैं. आज हम ब्रेन स्ट्रोक के खतरे, लक्षण, इलाज और जागरुकता पर बात करेंगे.
पश्चिम उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर मुरादाबाद में डीएमआर इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंस के डिपार्टमेंट ऑफ न्यूरोलॉजी के हेड ऑफ डिपार्टमेंट (एचओडी) और डॉयरेक्टर डॉ. मंजेश राठी ने Aajtak.in से बात करते हुए ब्रेन स्ट्रोक पर अपनी रिसर्च शेयर की और बताया कि कैसे यह हमारी यंग पॉपुलेशन के सबसे बड़ा खतरा बनती जा रही है.
क्या होता है तीन जनरेशन का पैरालाइसिस?
Aajtak.in से बात करते हुए डॉ. मंजेश राठी ने बताया, 'स्ट्रोक को लेकर मैंने रिसर्च किया है, पहले स्ट्रोक की औसत उम्र 60 साल थी, लेकिन अब स्ट्रोक की औसत उम्र 43 साल हो गई है, यह सबसे खतरनाक है, अगर किसी को 20 से 50 साल के बीच स्ट्रोक हो जाए तो हम इसे तीन जनरेशन का पैरालाइसिस कहते हैं.'
डॉ. मंजेश राठी ने बताया, 'अगर किसी को 40 की उम्र में पैरालिसिस होता है तो वह अपने बच्चों के लिए कुछ नहीं कर पाएगा, दूसरा वह अपने बूढ़े मां-बाप के लिए कुछ नहीं कर पाएगा, यही वजह है कि हम इसे तीन जनरेशन का पैरालिसिस कहते हैं. इस तरह की समस्या पूरे देश में बढ़ती जा रही है. एक बार स्ट्रोक हो गया तो वह पूरे जीवनभर काम नहीं कर पाता है.'
कम उम्र के लोगों में ब्रेन स्ट्रोक के खतरे के बारे में बताते हुए डॉ. मंजेश राठी ने कहा, 'अब स्ट्रोक कम उम्र के लोगों में हो रहा है, जिसे हम स्ट्रोक इन यंग पीपुल कहते हैं, अब हार्टअटैक और स्ट्रोक एक साथ चलते हैं. मरीज को अगर हार्ट अटैक आया और उसका इलाज हो गया तो वह एक-दो हफ्ते में काम करने लायक हो जाता है, लेकिन ब्रेन स्ट्रोक का मरीज कम से 6 महीने से एक साल तक काम नहीं कर पाता है.'
डॉ. मंजेश राठी के मुताबिक ब्रेन स्ट्रोक के चार प्रमुख कारण-
- लाइफ स्टाइल डिस ऑर्डर. आजकल सबकी लाइफस्टाइल चेंज हो गई है. इस वजह किस समय पर खाना खाना चाहिए और किस समय पर सोना चाहिए, इस रूटीन को सही से फॉलो नहीं कर पा रहे हैं.
- डायबिटिज, हाई ब्लड प्रेशर, कोलस्ट्रॉल के मरीजों में ब्रेन स्ट्रोक का खतरा सबसे अधिक रहता है. पहले हम ब्लड प्रेशर 50 साल से ऊपर वालों का चेक करते थे, लेकिन अब हाइपर टेंशन कम उम्र के लोगों को भी होने लगा है.
- साइकोलॉजिकल स्ट्रेस और एक्सपेक्टेंशन बहुत ज्यादा हो गई है. मैंने एक हजार मरीजों लोगों पर रिसर्च किया और पाया कि स्ट्रोक की शिकायत वहां ज्यादा आ रही हैं, जिनकी फैमिली छोटी है. यानी पति-पत्नी जॉब कर रहे हैं और उनके एक या दो बच्चे हैं. उन पर सारा साइकोलॉजिकी स्ट्रेस है. उनकी सोशल सिक्योरिटी नहीं है. जिनके पास बड़ी फैमिली है या ज्वॉइंट फैमिली है, वहां स्ट्रेस के मामले कम आ रहे हैं. मेरे पास जितने केस आ रहे हैं, वह अधिकतर स्माल फैमिली के केस हैं.
- खानी-पीने का लाइफस्टाइल भी खराब हो गया है. आजकल हम जंक फूड की ओर ज्यादा जाने लगे हैं. बाहर का खाना अधिकतर पॉम ऑयल से बना होता है. हार्ट के लिए बहुत खतरनाक होता है. पॉम ऑयल ब्रेन में भी और हार्ट में क्लॉटिंग बढ़ाता है. जो लोग बाहर खाना नहीं खाते हैं, उनमें स्ट्रोक्स के खतरे कम हैं..
ब्रेन स्ट्रोक्स के अधिकतर मामले छोटी फैमिली में आ रहे हैं. इसके पीछे सबसे बड़ी साइकोलॉजिकल स्ट्रेस है. ज्वॉइंट फैमिली में साइकोलॉजिकल स्ट्रेस कम होता है. इस वजह से ज्वॉइंट फैमिली में ब्रेन स्ट्रोक्स के मामले कम आ रहे हैं.
डॉ. मंजेश राठी ने Brain Strokes के पांच Symptoms होते हैं-
1. मरीज की जुबान लड़खड़ा रही है, बोलने में दिक्कत आ रही है.
2. मरीज को थोड़ी देर के लिए देखने में दिक्कत आ रही है, आंख की रोशनी कम हो गई है.
3. मरीज को चलने में लड़खड़ाहट आ रही है. जैसे- वह चल रहा है तो लग रहा है कि शराबी की तरह चल रहा है.
4. एक तरफ के हाथ-पैर में कमजोरी आ जाए.
5. एक तरफ के हाथ-पैर में झुनझुनाहट आ जाए.
डॉ. मंजेश राठी ने बताया कि आमतौर पर यह सभी सिम्टम आते हैं और एक-दो मिनट में ठीक हो जाते हैं और हम सोचते हैं कि कोई नस की दिक्कत होगी, लेकिन जब ब्रेन में हल्की-हल्की क्लॉटिंग शुरू होती है, तब यह सिम्टम आते हैं, इसको हम ट्रांजिड इस्केमिक अटैक (टीआईए) बोलते हैं, अगर हम इसे पकड़ ले तो आने वाली बड़ी दिक्कत से बच सकते हैं, अगर डायबिटिज, हाई बीपी, कोलस्ट्रॉल की दिक्कत है तो उसको कंट्रोल कर लें.
Brain Strokes के मरीज को चार घंटे में अस्पताल पहुंचाएं
डॉ. मंजेश राठी ने कहा, 'अगर किसी की ब्रेन की नस बंद हो गई है तो उस मरीज को तीन-चार घंटे में हॉस्पिटल पहुंचा देते हैं तो हमारे पास क्लॉट डिजॉलबिंग इंजेक्शन होता है, जिसे हम लगा देते हैं, लेकिन भारत में दिक्कत है कि स्ट्रोक्स के बाद 99 फीसदी मरीज 4 घंटे में हॉस्पिटल पहुंचता ही नहीं है, आमतौर पर अस्पताल पहुंचने में 24 घंटे लगा देते हैं. उससे पहले फालिज का देसी इलाज कराने लगते हैं.'
43 साल की उम्र में आ रहे हैं Brain Strokes
डीएमआर इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंस के डॉयरेक्टर डॉ. मंजेश राठी ने बताया, 'मुरादाबाद समेत पूरे पश्चिम यूपी के इंडस्ट्रियल एरिया में स्ट्रोक्स के केस तेजी से बढ़ रहे हैं, मैं पहले चेन्नई मेडिकल कॉलेज में था और वहां पर मैंने रिसर्च किया था, वहां भी स्ट्रोक्स के केस तेजी से बढ़ रहे थे. ठीक इसी तरह पश्चिमी यूपी में केस तेजी से बढ़ रहे हैं. 2010 में जब मैंने स्ट्रोक्स पर रिसर्च किया था, तब उस समय औसत उम्र 57 साल थी. अब 2021-22 में जब मैं मुरादाबाद में रिसर्च कर रहा हूं तो स्ट्रोक्स की औसत उम्र 43 साल पहुंच गई है.'
Brain Strokes का इलाज क्या है?
डॉ. मंजेश राठी ने बताया, 'सबसे जरूरी बात है कि जिन पांच Symtoms को मैंने पहले बताया है, उन्हें पहले पकड़ लीजिए. एक से दो साल पहले ही Symtoms आने लगते हैं. जिनको डायबिटिज, हाई बीपी, हार्ट की प्रॉबल्म है, उन्हें साल में एक बार अपनी चेकअप जरूर करानी चाहिए. हॉस्पिटल में स्ट्रोक्स यूनिट होता है, वहां पर आकर चेक कराते रहे.'
डॉ. मंजेश राठी ने कहा, 'स्ट्रोक्स से बचने का सबसे बड़ा रामबाण इसका प्रिवेंशन है. अगर स्ट्रोक आ गया तो मरीज 4 घंटे के अंदर हॉस्पिटल पहुंचता है तो वह गोल्डन चांस होता है. चार घंटे के बाद तो ब्रेन ऑल रेडी डैमेज हो चुका होता है. डैमेज ब्रेन को ठीक करने का प्रोसेस बहुत स्लो होता है और 6 से 8 महीने लग जाते हैं.'
केवल 10 रुपये में Brain Strokes का प्राइमरी इलाज
डॉ. मंजेश राठी ने कहा, 'अगर आप चार घंटे में हॉस्पिटल नहीं पहुंच पा रहे हैं तो तीन चीजें जरूरी हैं. पहली- बीपी, डायबिटिज को चेक करना. दूसरा- मरीज को स्ट्रोक है तो उसे समय पर ब्लड थीनर टैबलेट दिए जा सकते हैं, बहुत से ब्लड थीनर टैबलेट आते हैं. जैसे- Aspirin. तीसरी- एक कोलस्ट्रॉल की टैबलेट, जैसे- Atorvastatin. यह दोनों टैबलेट बमुश्किल 10 रुपये की आती हैं, प्राइमरी लेवल पर आप 10 रुपये में ही स्ट्रोक्स के खतरे को कम कर सकते हैं, लेकिन डॉक्टर से सलाह के बाद ही कोई भी दवा लें.
मुरादाबाद में जागरुकता अभियान चला रहे हैं डॉ. मंजेश राठी
पश्चिम यूपी में न्यूरोलॉजी के बड़े डॉक्टरों में शुमार डॉ. मंजेश राठी का कहना है, 'Brain Strokes को लेकर पूरे देश में जागरुकता का अभाव बहुत ज्यादा है. स्ट्रोक्स इतनी बड़ी बीमारी है, जो यंग पॉपुलेशन को खत्म कर रही है. हम लोग खुद गांवों-गांवों में स्ट्रोक्स को लेकर जागरुकता अभियान चला रहे हैं.'
डॉ. मंजेश राठी ने आगे बताया, 'हम लोग स्ट्रोक्स के लिए सीएमयू (कांटिन्यू मेडिकल एजुकेशन) करते हैं, गांव-गांव और शहर-शहर जाकर डॉक्टरों को जागरुक करते हैं... मरीज सबसे पहले यहीं पहुंचते हैं... हम हर रविवार को करते हैं... मुरादाबाद के आसपास के 250 किलोमीटर की परिधि में शाम को 6 बजे से रात में 11 बजे तक जागरुकता अभियान चलाते हैं. हमने हेल्पलाइन नंबर भी बनाकर रखा है, जिसका नंबर है- 9068814535.'

कौन हैं डॉ. मंजेश राठी?
कई नामचीन अवॉर्ड से सम्मानित डॉ. मंजेश राठी मुरादाबाद में डीएमआर इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंस में न्यूरोलॉजी विभाग के एचओडी और निदेशक. न्यूरोफिज़िशियन डॉ. मंजेश राठी ने कटक के एससीबी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई की है. इसके बाद झांसी के एमएलबी मेडिकल कॉलेज से एमडी (पीडियाट्रिक्स) और एसबीएमसीएच मेडिकल कॉलेज से डीएम (न्यूरोलॉजी) की पढ़ाई की है. Brain Strokes को लेकर जागरुकता अभियान के साथ ही डॉ. मंजेश राठी हर साल 100 कॉलेज स्टूडेंट्स की आर्थिक मदद भी करते हैं. असम में उनका ई-न्यूरोलॉजी सेंटर भी है.