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क्या शंकराचार्य हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद? समझिए 73 साल पुराना झगड़ा, दावा और कानूनी अड़चन

शंकराचार्य पद की वैधता पर लंबे समय से विवाद चल रहा है, जो 1941 से शुरू हुआ था. इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बीच मामला अटका हुआ है। इस विवाद ने धार्मिक और राजनीतिक स्तर पर गहरा असर डाला है, और माघ मेला प्रशासन ने स्वामी को नोटिस जारी किया है.

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प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने स्वामी अवमुक्तेश्वरानंद को नोटिस भेजा है (फोटो- ITG)
प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने स्वामी अवमुक्तेश्वरानंद को नोटिस भेजा है (फोटो- ITG)

प्रयागराज में माघ मेला के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों और मेला प्रशासन के बीच टकराव हो गया था. इस विवाद ने तूल पकड़ते हुए राजनीतिक रंग ले लिया. आरोप-प्रत्यारोप के दौर के बीच मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को एक नोटिस भेजा. इसमें लिखा था कि वह किस आधार पर खुद को शंकराचार्य बताते हैं?

मेला प्रशासन की ओर से यह सवाल सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के आधार पर पूछा गया था, जिसमें शंकराचार्य की नियुक्ति और पट्टाभिषेक प्रक्रिया पर रोक की बात थी. बता दें कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद साल 2022 से ही ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य के तौर पर जाने जाते हैं. हालांकि इस पद पर उनकी नियुक्ति शुरू से ही विवादित मानी जाती रही है.

इस विवाद का प्रेत मौनी अमावस्या के दिन प्रयागराज में हुए टकराव के दो दिन बाद फिर जी उठा है. इसी के साथ जब इसका इतिहास खंगालने चलें तो इसका सिरा 20वीं सदी के बीच के दौर यानी 50-60 के दशक में चला जाता है. 

शंकराचार्य की पदवी पर विवाद का इतिहास
कहानी शुरू होती है साल 1941 से. पहले एक जरूरी बात जान लेते हैं कि 1941 से पहले लगभग 168 वर्षों तक ज्योतिर्मठ में शंकराचार्य की गद्दी खाली रही थी. इससे पहले 18वीं सदी में ज्योतिर्मठ पर स्वामी रामकृष्ण तीर्थ काबिज रहे. लेकिन उनके लिए भी कई जगहों पर शंकराचार्य की उपाधि दर्ज नहीं है, लेकिन मठ उनके संरक्षण में था. उनके निर्वाण (मृत्यु) के बाद लगभग 165 वर्षों तक मठ निष्क्रिय रहा. इस दौरान कई साधुओं और गुरुओं ने शंकराचार्य पद पर दावा किया, जिससे 1900 के दशक से ही कई दीवानी मुकदमे दर्ज हुए.

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साल 1941 में ज्योतिर्मठ पीठ को मिले 'शंकराचार्य'
कुछ समय तक बद्रीनाथ मंदिर के रावल को भी ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य माना गया. काफी बाद में तीन और पीठों के शंकराचार्यों ने मिलकर 'स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती' को शंकराचार्य पद के लिए राजी किया और उन्हें इस पद के लिए स्वीकृति भी दी. इस तरह 11 मई 1941 को स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती की नियुक्ति वाराणसी के 'भारत धर्म महामंडल (BDM)' से जुड़े साधु-संतों की ओर से की गई.

इस नियुक्ति को पुरी के शंकराचार्य स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ और शृंगेरी के शंकराचार्य स्वामी चंद्रशेखर भारती का समर्थन था. इसके अलावा गढ़वाल, वाराणसी और दरभंगा के शासकों ने भी उन्हें समर्थन दिया और ब्रह्मानंद सरस्वती सर्वमान्य तरीके से ज्योतिष्पीठ (ज्योतिर्मठ) के शंकराचार्य बने.

1953 में शंकराचार्य का निधन और विवाद की शुरुआत
उनके दौर में ज्योतिर्मठ उत्तर भारत में अद्वैत वेदांत का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा. दिसंबर 1952 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी इस मठ में पहुंचे थे. 20 मई 1953 को स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती ब्रह्मलीन हो गए. 

और यहीं से उस विवाद की भी शुरुआत हुई जो आज तक जारी है. 1953 में ब्रह्मानंद सरस्वती के ब्रह्मलीन होने के बाद उनके शिष्य 'स्वामी हरिहरानंद सरस्वती' को शंकराचार्य पद का प्रस्ताव दिया गया, लेकिन वह इसके लिए राजी नहीं हुए. इसके बाद दावा किया गया कि शंकराचार्य रहे ब्रह्मानंद सरस्वती ने मृत्यु से पांच माह पहले एक वसीयत तैयार की थी, जिसे इलाहाबाद में रजिस्टर्ड बताया गया.

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एक वसीयत, चार नाम और साजिश!

इस कथित वसीयत में चार नाम थे, जिन्हें क्रम से मठ का उत्तराधिकारी बताया गया था. पहला नाम था, स्वामी शांतानंद सरस्वती का. इसके बाद स्वामी द्वारकेशानंद सरस्वती,  स्वामी विष्णुदेवानंद सरस्वती, और स्वामी परमानंद सरस्वती के नाम शामिल थे.

इसी आधार पर स्वामी शांतानंद सरस्वती ने शंकराचार्य पद ग्रहण किया, लेकिन पुरी, द्वारका और शृंगेरी के शंकराचार्यों के साथ-साथ पूर्व शंकराचार्य ब्रह्मानंद सरस्वती के कई शिष्यों ने उन्हें मान्यता नहीं दी. उनका तर्क था कि आदि शंकराचार्य की ओर निर्धारित ‘मठाम्नाय महानुशासनम्’ में उत्तराधिकारी की नियुक्ति वसीयत से करने की कोई परंपरा नहीं है. असली मुद्दा यही है कि शंकराचार्य की नियुक्ति वसीयत से नहीं हो सकती है.

वसीयत वाली बात पर कई आरोप भी लगे. कहा गया कि यह वसीयत पूरी तरह फर्जी थी और यहीं से आजाद भारत में शंकराचार्य पद का मामला कोर्ट में गया. 

एक पीठ दो शंकराचार्य और बढ़ने लगा विवाद
आगे हुआ यूं कि ज्योतिर्मठ से जुड़े संगठनों और वाराणसी के विद्वानों की समिति ने स्वामी कृष्णबोध आश्रमजी महाराज' का नाम का प्रस्ताव शंकराचार्य के पद के लिए दिया. स्वामी कृष्णबोध आश्रम का निधन 10 सितंबर 1973 को हुआ. उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के तौर पर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वतीजी महाराज का नाम बढ़ाया. स्वरूपानंद सरस्वती को दीक्षा ब्रह्मानंद सरस्वती ने ही दी थी. 

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चूंकि स्वामी शांतानंद सरस्वती पहले से ब्रह्मानंद सरस्वती की ओर से बनाए गए मठ पर काबिज थे, इसलिए स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने पास ही एक जमीन पर नया आश्रम स्थापित किया.  यह स्थल आदि शंकराचार्य के शिष्य तोटकाचार्य की प्राचीन गुफा के पास बताया जाता है.

इस तरह यह मामला इन 30-35 वर्षों में कोर्ट और पीठ के बीच लगातार चलता रहा और विवाद बना रहा. हालांकि इस पदवी को लेकर यह विवाद  8 अप्रैल 1989 से अधिक गहरा गया,  जब ज्योतिषपीठ के वरिष्ठ संत श्रीकृष्ण बोधश्रम के निधन के बाद स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने खुद को उनका उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. 

15 अप्रैल, 1989 ज्योतिष पीठ के वरिष्ठ संत शांतानंद जी ने वासुदेवानंद सरस्वती को अपना उत्तराधिकारी घोषित, कर दिया. इससे एक ही पीठ के दो शंकराचार्य हो गए.

साल 2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला

2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वरूपानंद सरस्वती और वासुदेवानंद सरस्वती दोनों को ही शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया था, कोर्ट ने कहा था- कोई भी योग्य उत्तराधिकारी नहीं है. मामले में सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय का इंतजार किया जाएगा. इस तरह विवाद चलता रहा और 11 सितंबर, 2022 को संत स्वरूपानंद सरस्वती का निधन हो गया. उसके बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अगले दिन खुद को शंकराचार्य घोषित कर दिया. 16 अक्टूबर, 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने अविमुक्तेश्वरानंद पट्टाभिषेक और छत्र चंवर के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी.

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क्या बोले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के वकील?
हालांकि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के वकील ने मंगलवार को उनकी तरफ से इस मामले में पक्ष रखा है. सुप्रीम कोर्ट के वकील पीएन मिश्रा ने कहा, मेला प्रशासन के नोटिस में 14 अक्तूबर 2022 के आदेश का हवाला दिया गया है. प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के जिस आदेश का हवाला दे रहा है, उसके पहले 21 सितंबर 2022 का आदेश है, जिसके ऑर्डर में स्वामी अवमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य बताया गया था.

वकील पीएन मिश्रा के मुताबिक, 14 अक्टूबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने जो ऑर्डर दिया था उसमें सुप्रीम कोर्ट ने 17 अक्टूबर के बाद किसी पट्टाभिषेक पर रोक लगाई थी. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पट्टाभिषेक इससे पहले ही हो चुका था. सुप्रीम कोर्ट के आदेश में भी कई स्थानों पर उन्हें शंकराचार्य के रूप में संबोधित किया गया है.

अब इस पूरे विवाद को बिंदुवार समझें

18 दिसंबर 1952 को स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती ने वसीयत कर स्वामी शांतानंद सरस्वती को उत्तराधिकारी बनाया और 20 मई 1953 स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती का निधन हो गया.

12 जून 1953 को स्वामी शांतानंद सरस्वती को काशी में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य के रूप में स्वीकृति दी गई, लेकिन 25 जून 1953 विरोधी पक्ष ने स्वामी कृष्णबोध आश्रम को शंकराचार्य के रूप में स्वीकार किया और वसीयत के आधार स्वामी शांतानंद की शंकराचार्य पद पर नियुक्ति को गलत बताया.

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मामला कोर्ट में गया और 12 दिसंबर 1955 को सिविल कोर्ट ने स्वामी शांतानंद सरस्वती को उत्तराधिकार का सर्टिफिकेट दिया.

1965–1970 के दौर में चले मुकदमे के बाद अदालत ने स्वामी शांतानंद सरस्वती की शंकराचार्य पद पर नियुक्ति को वैध बताया और उनके खिलाफ हुई अपील भी खारिज कर दी.

28 फरवरी 1980 को स्वामी शांतानंद सरस्वती ने पद त्याग कर स्वामी विष्णुदेवानंद सरस्वती को उत्तराधिकारी बना दिया. 

17 अप्रैल 1989 स्वामी विष्णुदेवानंद सरस्वती ने वसीयत कर स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती को उत्तराधिकारी बनाया और 15 नवंबर 1989 को स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती को शंकराचार्य के रूप में स्वीकार किया गया.  

नवंबर 1989 स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने इसको चुनौती देते हुए मामला फिर से कोर्ट में ले गए. 22 फरवरी 1999 को ट्रायल कोर्ट ने वासुदेवानंद सरस्वती के खिलाफ स्टे ऑर्डर जारी किया. 

27 अप्रैल 2000 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में स्टे ऑर्डर बरकरार रखा.  22 मई 2000 को हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया. मामले में चली लंबी सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने साल 2004 में अपना फैसला सुनाया. इसमें पहले सिविल व डिस्ट्रिक जज के आदेश को निरस्त करके वासुदेवानंद के पक्ष में फैसला आया था. इस पर स्वामी स्वरूपानंद 2005 में सुप्रीम कोर्ट चले गए. 

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यहां सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिविल जज व एडीजे के आदेश यथा स्थिति मेरिट पर सिविल कोर्ट जाएं और वहां मेरिट पर केस को निपटाएं. पांच मई 2015 में वासुदेवानंद के खिलाफ फैसला आया.

फिर वासुदेवानंद का पक्ष हाई कोर्ट गया वहां 22 नवंबर 2017 को आदेश आया था, जिसमें कहा गया कि स्वामी वासुदेवानंद का संन्यास तो वैध है, लेकिन वह सर्विस भी करते थे ऐसे में उनका शंकराचार्य होना अवैध है. वे छत्र, चंवर धारण न करें, जबकि स्वामी शांतानंद के रहते हुए कृष्णबोधाश्रम का पीठासीन होना अवैध है.

हाई कोर्ट ने स्वरूपानंद और वासुदेवानंद सरस्वती सहित कई शंकराचार्यों की नियुक्तियों को अवैध ठहराया था और एक कमेटी बनाकर नए शंकराचार्य की नियुक्ति के निर्देश दिए, जिससे विवाद और गहरा गया.

इस आदेश के बाद दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट गए थे. तब से मामला चल रहा है. इसी बीच स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद, उनके शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने खुद को नया शंकराचार्य घोषित कर दिया, यह कहते हुए कि उनके गुरु ने उन्हें उत्तराधिकारी बनाया था.

उनके इस दावे पर अन्य मठों (जैसे गोवर्धन मठ, पुरी) और धार्मिक संस्थाओं ने आपत्ति जताई और 2022 में उनके पट्टाभिषेक पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी. सुप्रीम कोर्ट में यह मामला अभी भी लंबित है, जहां उनकी नियुक्ति की वैधता पर फैसला आना है.

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