अमेरिका ने हाल में वेनेजुएला पर सैन्य हमला करते हुए वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ लिया. इसके बाद से खुला खेल चल रहा है. ट्रंप के निशाने पर कई देश हैं, जिनमें से एक ग्रीनलैंड भी है. बर्फीली वादियों वाले इस देश की आमतौर पर कोई चर्चा नहीं होती. लेकिन कोविड के आसपास इसका नाम एक स्कैंडल को लेकर उछला था. दरअसल यहां शासन कर रहे डेनमार्क ने साठ के दशक में सैकड़ों लड़कियों को खुफिया तौर पर एक प्रयोग का हिस्सा बना लिया था. इसे कॉइल स्कैंडल कहा गया.
कैसा है ग्रीनलैंड और यहां कौन रहता है
ग्रीनलैंड उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक महासागर के बीच बसा द्वीप है. यह भौगोलिक रूप से उत्तरी अमेरिका महाद्वीप का हिस्सा माना जाता है, लेकिन राजनीतिक तौर पर देखें तो यह डेनमार्क के अधीन स्वायत्त क्षेत्र है. क्षेत्रफल के लिहाज से यह दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है. इसका कुल क्षेत्रफल 21 लाख 66 हजार वर्ग किलोमीटर है.
भौगोलिक विस्तार के मामले में दुनिया के 12वें सबसे बड़े देश की आबादी साठ हजार के आसपास है. इन्हें इनुइट कहते हैं. डेनिश बोलने वाले ये लोग आय के लिए पूरी तरह से पर्यटकों पर निर्भर हैं. वे स्थानीय केक, मछलियां और रेंडियर की सींग से बने सामान बेचते हैं. बेहद ठंडे मौसम में ये कच्चा मांस खाते हुए घरों के भीतर ही बंद रहते हैं. तब कारोबार भी बंद रहता है.
मिशनरियों के पहुंचने से बदली व्यवस्था
ग्रीनलैंड में रहने वाले इनुइट लोग यानी यहां की मूल आबादी पहले छोटे-छोटे समुदायों में रहती थी. 18वीं सदी में डेनमार्क के मिशनरी और व्यापारी वहां पहुंचे और धीरे-धीरे डेनमार्क का असर वहां दिखने लगा. बाद में इसे औपचारिक रूप से डेनमार्क के अधीन मान लिया गया. दूसरे वर्ल्ड वॉर के बाद ग्रीनलैंड की अहमियत बढ़ने लगी क्योंकि यह अमेरिका और यूरोप के बीच रणनीतिक जगह पर है.

यही वो समय था, जब डेनमार्क को अहसास हुआ कि उसके हाथ हीरा लग गया है. इधर ग्रीनलैंड आजादी चाहता था. तब डेनिश सरकार ने रस्सी को ढील तो दी लेकिन उतनी ही, जिससे ग्रीनलैंड खुद को कसा हुआ न पाए और बागी न हो जाए. आज ग्रीनलैंड अपने घरेलू फैसले खुद करता है लेकिन डिफेंस, फॉरेन पॉलिसी और करेंसी अब भी डेनमार्क के पास है.
डेनमार्क की पीएम मेटे फ्रेडरिकसेन ने पिछले साल सितंबर में ग्रीनलैंड से माफी मांगी. उन्होंने अपने संबोधन में देश की महिलाओं और परिवारों से माफी मांगी.
लेकिन किसलिए?
इसके रेशे साठ के दशक से जुड़े हैं. कॉइल स्कैंडल से. ग्रीनलैंड का स्कैंडल दरअसल डेनमार्क की उस पॉलिसी से जुड़ा है जिसे आज बहुत बड़ा मानवाधिकार उल्लंघन माना जाता है. यह मामला 1960 और 1970 के दशक का है, जब डेनमार्क ने ग्रीनलैंड की मूल आबादी को कंट्रोल करने के लिए हजारों इनुइट लड़कियों के शरीर में जबरन कॉइल लगवा दी.
दरअसल डेनिश सरकार को लगने लगा था कि ग्रीनलैंड की आबादी बढ़ी तो वहां की शिक्षा और बाकी जिम्मेदारियां उस पर आ जाएंगी. साथ ही डेनिश खुद को ज्यादा मॉडर्न मानते थे, जबकि ग्रीनलैंड के लोग काफी पिछड़े हुए थे. पिछले हुओं की जनसंख्या ज्यादा न दिखने लगे, तत्कालीन सरकार ने इसके लिए जन्म दर कम करने की ठानी. इसी सोच के साथ एक खौफनाक प्रयोग शुरू हो गया.

कमउम्र लड़कियों को लगा दी गई कॉन्ट्रासेप्टिव कॉइल
ग्रीनलैंड का हेल्थकेयर तब पूरी तरह से डेनिश कंट्रोल में था. यहीं तोड़ निकला. डेनिश डॉक्टरों ने स्कूलों और अस्पतालों के जरिए लड़कियों को टारगेट किया, और उनके शरीर में गर्भनिरोधक कॉइल लगाने लगे. कई लड़कियां सिर्फ 12 से 15 साल की थीं. उन्हें बताया भी नहीं गया कि उनके शरीर में क्या लगाया जा रहा है. ज्यादातर मामलों में पेरेंट्स की रजामंदी भी नहीं ली गई. कुछ को कहा गया कि यह मेडिकल चेकअप है, कुछ को डराया गया कि अगर मना किया तो पढ़ाई फ्री नहीं होगी, या इलाज वैसा नहीं मिलेगा.
कॉइल लगने के बाद कई महिलाओं को तेज दर्द, इंफेक्शन और ब्लीडिंग जैसी दिक्कतें हुईं. लेकिन किसी को भी भनक नहीं थी कि उनके साथ क्या हो चुका है. फर्टाइल उम्र में चाहने के बावजूद कई महिलाएं मां नहीं बन सकीं.
जांच में पता लगा कि उनके शरीर में कॉन्ट्रासेप्टिव डिवाइस है, जो उन्हें गर्भवती होने से रोक रही है. हालांकि बोलने के बाद भी कहीं सुनवाई नहीं हुई और मामला दबा ही रहा. साल 2020 के बाद जब पुराने मेडिकल रिकॉर्ड सामने आए और महिलाओं ने खुलकर बोलना शुरू किया, तब सच बाहर आया. पता चला कि करीब चार हजार लड़कियों और महिलाओं के साथ यह किया गया.
बेहद तेजी से घटी जनसंख्या
उस समय ग्रीनलैंड की कुल आबादी करीब 40 हजार हुआ करती थी. इसमें दोनों जेंडर आधे-आधे थे. यानी लगभग हर छठवीं महिला के साथ ये हुआ. इसके बाद बर्थ रेट तेजी से कम हुई. पहले जहां यहां संतान जन्म की दर 6 थी, तो प्रयोग के तुरंत बाद 2.5 संतानें प्रति महिला हो गईं.

जैसे ही मामला सामने आया, ग्रीनलैंड में गुस्सा फूट पड़ा. डेनमार्क सरकार पर दबाव बढ़ा. साल 2022 में डेनमार्क ने आधिकारिक जांच शुरू की और हाल ही में इस नस्लवादी सोच के लिए माफी मांगी गई. साथ ही कई लोगों या उनके परिवारों को मुआवजा भी मिला. हालांकि यह अब तक साफ नहीं हो सका कि ये प्रयोग किसके इशारे पर हुआ, क्या सत्ता में बैठे तमाम नेताओं को इसकी जानकारी थी, और कैसे दशकों तक इसपर पर्दा पड़ा रहा.
कई और प्रयोग भी चल चुके
ग्रीनलैंड को डेनमार्क ने लंबे समय तक प्रयोगशाला बना रखा था. यहां तक कि ग्रीनलैंड के बच्चों को उठाकर री-एजुकेशन के नाम पर उनकी भाषा और कल्चर से अलग कर दिया गया. वे खुद को डेनिश मानने लगे. यह सब कुछ कथित तौर पर सुधार था लेकिन सच तो यही है कि कॉलोनियल मानसिकता के चलते महिलाओं के शरीर से लेकर बच्चों तक को प्रयोग में झोंक दिया गया.
कॉइल स्कैंडल की वजह से ग्रीनलैंड और डेनमार्क के रिश्तों में आज भी दूरी है.
बाहर से देखने पर दोनों के रिश्ते औपचारिक लगते हैं, लेकिन भरोसे की कमी साफ है. ग्रीनलैंड अपने किसी घरेलू मामले में डेनिश प्रशासन की बिल्कुल नहीं सुनता. स्कैंडल के खुलने के बाद से ग्रीनलैंड की युवा आबादी आजादी की मांग करने लगी. डेनमार्क ने जांच और सुधार की बात जरूर की, लेकिन वो भी काफी सतर्क रहता है कि ग्रीनलैंड में कोई विद्रोही गुट न बन जाए.