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डराना छोड़ दे तो क्या हिल सकती है अमेरिका की गद्दी, क्यों लंबे समय से वर्ल्ड ऑर्डर में नहीं हुआ बड़ा फेरबदल?

अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अरेस्ट करते हुए वहां अपनी सेना की तैनाती कर दी. डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि नई और मजबूत सरकार बनते तक यूएस वहां रहेगा. ड्रग तस्करी के आरोप के आधार पर हुए यूएस एक्शन का कई देश विरोध कर रहे हैं, लेकिन कोई भी इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सका. वॉशिंगटन ग्लोबल पावर है, जिसके आगे किसी का बस नहीं चलता.

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डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी लीडर बतौर बेहद आक्रामक रुख अपनाते दिख रहे हैं. (Photo- Reuters)
डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी लीडर बतौर बेहद आक्रामक रुख अपनाते दिख रहे हैं. (Photo- Reuters)

दूसरे विश्व युद्ध के बाद वर्ल्ड ऑर्डर बदला और एक नई ताकत सीधे सुपरपावर बन गई. ये अमेरिका था. तब से लगभग आठ दशकों से कोई देश या संयुक्त शक्ति यूएस को अपनी जगह से नहीं हिला सकी. अमेरिका महज आरोपों के आधार पर वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अरेस्ट कर चुका और सत्ता परिवर्तन की बात कर रहा है, इसके बाद भी दुनिया आलोचना से ज्यादा कुछ कर नहीं पा रही. कौन से कारण हैं, जो अमेरिका को इतना शक्तिशाली बनाते हैं? क्या ये महज डॉलर का रुतबा है, या फिर सेना, या भूगोल?

दूसरे वर्ल्ड वॉर के बाद अमेरिका ग्लोबल पावर बनकर उभरा. इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि युद्ध ने यूरोप और एशिया की ज्यादातर बड़ी ताकतों को तबाह कर दिया था, जबकि अमेरिका की जमीन पर लड़ाई नहीं हुई. उसकी फैक्ट्रियां सुरक्षित रहीं और युद्ध के दौरान अमेरिकी उद्योग ने हथियार और सामान बनाकर जबरदस्त आर्थिक ताकत हासिल कर ली.

युद्ध खत्म होने तक दिखने लगा था कि वर्ल्ड ऑर्डर बदल सकता है. पहले सोवियत संघ सबसे मजूबत था, जिसके बाद यूरोप के कुछ देश आते थे. लेकिन शीत युद्ध के आखिर में सोवियत संघ 15 टुकड़ों में टूट गया. रूस अब नया उत्तराधिकारी था. ताकतवर लेकिन बंटवारे की वजह से पहले से कमजोर. यूरोप के बड़े देश जैसे जर्मनी और फ्रांस जंग में बर्बाद हो चुके थे. यूरोप की इकनॉमी सिकुड़कर 18 प्रतिशत हो चुकी थी, जबकि जापान की आधी रह गई थी. 

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japan second world war (Photo- Getty Images)
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान के अलावा कई यूरोपीय देश भी तबाह हो चुके थे. (Photo- Getty Images)

चीन और भारत अभी इकनॉमिक बूम से दूर थे. बचा अमेरिका. उसके पास काफी सारा गोल्ड था और डॉलर इंटरनेशनल करेंसी बन गया. आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक जैसे संस्थान बने, जिनमें अमेरिका की अहम भूमिका थी. यूएन को भी उसने काफी सारी फंडिंग की और तय किया कि इंटरनेशनल मंच हमेशा उसके पक्ष में रहे. 

सैन्य ताकत ने देश को अलग स्तर पर पहुंचा दिया. वह पहला और अकेला देश था जिसने परमाणु बम बनाया और इस्तेमाल भी किया. इसके बाद नाटो जैसे सैन्य गठबंधनों के जरिए उसने यूरोप की सुरक्षा की जिम्मेदारी ले ली. मार्शल प्लान के तहत अमेरिका ने युद्ध से तबाह यूरोपीय देशों की आर्थिक मदद दी. इससे उसका वहां रसूख बढ़ा. उसने पक्का किया कि तबाह हो चुके देश किसी भी तरह से रूस से नजदीकी न बढ़ाएं. 

एक तरफ वो दबदबा बढ़ा रहा था, दूसरी तरफ लोकतंत्र और पूंजीवाद के मॉडल को बढ़ावा देकर उसने खुद को फ्री वर्ल्ड के नेता की तरह पेश किया. ताकत से खिंचते हुए ज्यादातर सभी देश उसके पाले में आ गए. रूस अकेला दुश्मन था, जो कमजोर पड़ा हुआ था. तो इस तरह धुआं छंटने के बाद साफ दिखने लगा कि अमेरिका ग्लोबल ताकत बन चुका है. 

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white house (Photo- Pexels)
अमेरिका के महाशक्ति बने रहने के पीछे डॉलर या सैन्य ताकत के अलावा कूटनीति भी काम करती है. (Photo- Pexels)

लगभग आठ दशक बाद दुनिया में कई बदलाव हो चुके. इस बीच ये सवाल आता है कि  क्या अमेरिका की ताकत कमजोर पड़ रही है या वर्ल्ड ऑर्डर अब भी वैसा ही है. 

अमेरिका अब भी दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकत है. उसके पास सबसे ज्यादा मिलिट्री बेस हैं, नाटो जैसा मजबूत गठबंधन है और डॉलर अब भी ग्लोबल फाइनेंस की रीढ़ बना हुआ है. टेक्नोलॉजी के मामले में भी अमेरिका आगे है. इस लिहाज से उसकी ताकत  कमजोर नहीं दिखती.

लेकिन दूसरी तरफ चुनौतियां भी हैं. चीन और भारत  आर्थिक और रणनीतिक तौर पर बड़ी शक्ति बन चुके. रूस ने यूक्रेन युद्ध के जरिए दिखाया कि वह पश्चिमी दबदबे को चुनौती दे सकता है. मिडिल ईस्ट में अमेरिका का असर पहले जैसा नहीं रहा और ग्लोबल साउथ के कई देश अमेरिका से दूरी बना रहे हैं. सबसे बड़ी बात कि वर्ल्ड ऑर्डर एकध्रुवीय नहीं रहा. यह ज्यादा मल्टीपोलर होता जा रहा है, जहां अमेरिका सबसे ताकतवर खंभा तो है लेकिन अकेला मुखिया नहीं.

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