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'जजमेंट में ज्यादा देरी हुई तो पब्लिक कानून अपने हाथ में ले सकती है'

जस्ट‍िस में अगर ज्यादा देरी हुई तो इस बात की आशंका है कि जनता कानून को अपने हाथ में ले ले. एजेंडा आजतक 2019 के सत्र 'देर है तो अंधर है' को संबोधित करते हुए पूर्व न्यायाधीश जस्टिस उषा मेहरा ने यह बात कही.

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एजेंडा आजतक के सत्र 'देर है तो अंधेर है'  में है शामिल वक्ता (फोटो: चंद्रदीप कुमार)
एजेंडा आजतक के सत्र 'देर है तो अंधेर है' में है शामिल वक्ता (फोटो: चंद्रदीप कुमार)

  • एजेंडा आजतक में जस्टिस उषा मेहरा ने कहा न्याय में देरी नहीं होनी चाहिए
  • जस्टिस उषा मेहरा ने कहा कि निर्भया मामले में न्याय में देरी हो रही है
  • उन्होंने कहा कि पुलिस की इनवेस्टीगेशन और प्रॉसीक्यूशन ब्रांच अलग कर देनी चाहिए

बलात्कार जैसे जघन्य मामलों में जस्ट‍िस में अगर ज्यादा देरी हुई तो इस बात की आशंका है कि जनता कानून को अपने हाथ में ले ले. एजेंडा आजतक 2019 के सत्र 'देर है तो अंधर है' को संबोधित करते हुए पूर्व न्यायाधीश जस्टिस उषा मेहरा ने यह बात कही. इस सत्र को दिल्ली पुलिस के पूर्व आयुक्त नीरज कुमार, तिहाड़ जेल के पूर्व लॉ अफसर सुनील गुप्ता और मानवाधिकार कार्यकार्त जॉन दयाल ने भी संबोधित किया.

तेजी से न्याय जरूरी

निर्भया कांड का हवाला देते हुए जस्टिस उषा मेहरा ने इस बात को स्वीकार किया कि न्याय में देरी हो रही है. उन्होंने कहा, 'लोगों का अभी भी न्याय पर विश्वास है, लेकिन अगर जुडिशियरी यह रियलाइज नहीं करती कि क्विक जजमेंट दिया जाए तो जनता कानून को अपने हाथ में ले लेगी. यह एक्ट में भी है कि टाइम बाउंड जजमेंट होना चाहिए. जब तक इनवेस्टीगेशन प्रॉपर नहीं हो, ट्रायल सही से नहीं शुरू हो सकता. '

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उन्होंने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट ने सिफारिश की थी कि पुलिस की इनवेस्टीगेशन और प्रॉसीक्यूशन ब्रांच अलग कर देनी चाहिए. ऐसे वैन होने चाहिए जिसमें साइंटिफिक इंस्ट्रुमेंट, फॉरेंसिंक आदि की सुविधा हो. ऐसा शायद वैन तैयार किया गया, लेकिन कहां इस्तेमाल हो रहा पता नहीं. रेप की विक्टिम नॉर्मल अस्पताल में नहीं जानी चाहिए, एक अलग विंग हो एक एक्सपर्ट डॉक्टर, एक्सपर्ट नर्स हो.  

तिहाड़ जेल के पूर्व लॉ अफसर सुनील गुप्ता ने कहा कि अगर निर्भया केस के चारों मुजरिम एक-एक करके मर्सी पेटिशन फाइल करते रहे तो फांसी होने में कम से कम एक-डेढ़ साल की देरी हो जाएगी, क्योंकि एक भी मुजरिम ने मर्सी पेटिशन फाइल कर दी तो बाकी तीनों की सजा रुक जाती है.

क्या पुलिस के जांच और अभियोग विभाग को बांट देना चाहिए

क्या पुलिस के इनवेस्टीगेशन (जांच) और प्रॉसीक्यूशन (अभि‍योग) विभाग को अलग कर देना चाहिए. इस सवाल पर नीरज कुमार ने कहा कि दोनों अलग विभाग हों इसमें कोई विवाद नहीं हो सकता. पुलिस स्टेशन में ही ऐसे दो ब्रांच बनाए जा सकते हैं, ये सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी, लेकिन पुलिस स्टेशन में ज्यादा स्टाफ नहीं होता. उदाहरण के लिए जामिया मिलिया में जब किसी पुलिस स्टेशन के लोग जाएं और इनवेस्टीगेशन वाला कहे कि मैं तो नहीं जाऊंगा तो मुश्किल होगी होगी, यह प्रैक्ट‍िकल नहीं होगा. इस वजह से मैं सहमत नहीं.'

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मानवाधिकार कार्यकर्ता जॉन दयाल ने कहा कि फांसी देना जरूरी नहीं, उम्रकैद दिया जा सकता है. उन्होंने कहा, 'मर्सी पेटिशन को आप देरी मानते हैं, लेकिन यह भी न्याय का ए‍क हिस्सा है. यह पूरा एक सीरीज है, उसके आखिरी प्रक्रिया तक पूरा करना चाहिए. हर पेटिशनर का यह हक है.'

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