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Film Review: खूब हंसे और खूब फंसे परिणिति-सिद्धार्थ के प्यार में

'हंसी तो फंसी' कमाल की फिल्म है. इसमें वह सब कुछ है, जिसकी चाह लिए हम और आप थिएटर में जाते हैं. अच्छे स्मूद घुमाव लिए कहानी, जबरदस्त एक्टिंग, हंसी के लगातार बरस निहाल करते फव्वारे, सच्ची मुच्ची के लहजे में लिखे गए डायलॉग्स और एक असल संदेश.

'हंसी तो फंसी' का एक सीन... 'हंसी तो फंसी' का एक सीन...

फिल्म रिव्यू: हंसी तो फंसी
एक्टर: परिणिति चोपड़ा, सिद्धार्थ मल्होत्रा, अदा शर्मा, मनोज जोशी, शरत सक्सेना
म्यूजिक: विशाल शेखर
लिरिसिस्ट: अमिताभ भट्टाचार्य, कुमार
डायरेक्टर: विनिल मैथ्यू
ड्यूरेशन: 141 मिनट
स्टार: पांच में से चार स्टार

ये महान भारत भूमि में प्रेम का सत्य सनातन फॉर्मूला है. लड़की हंसी तो फंसी. मगर इस इंडीकेटर के फेर में गड्डी मोड़ने का खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है. क्योंकि हंसी की वजह कुछ भी हो सकती है और फंसी अपने आप में नकारात्मक शब्द है. फिल्म हंसी तो फंसी हमें ये सबक देकर जाती है कि पार्टनर के साथ प्यार को जब फैसले की तराजू पर रखें, तो शारीरिक आकर्षण और समझदारी के बेढब तर्कों के बजाय दिमागी हरकतों के मिलने को ज्यादा वजन दें.

'हंसी तो फंसी' कमाल की फिल्म है. इसमें वह सब कुछ है, जिसकी चाह लिए हम और आप थिएटर में जाते हैं. अच्छे स्मूद घुमाव लिए कहानी, जबरदस्त एक्टिंग, हंसी के लगातार बरस निहाल करते फव्वारे, सच्ची मुच्ची के लहजे में लिखे गए डायलॉग्स और एक असल संदेश. युवाओं को तो यह फिल्म देखनी ही चाहिए, साथ में बड़े-बुजुर्गों और बच्चों को भी. ताकि जिंदगी के सबसे बारीक पेच को समझ सकें. पेच जिसे प्यार और शादी कहते हैं.

फिल्म की कहानी के कुछ सिरे
निखिल बचपन से ही खुरापाती है. उसके पापा आईपीएस हैं और बड़ा भाई आईएएस. मतलब सिविल सर्वेंट्स वाली फैमिली. मगर निखिल एक गुजराती बिजनेस फैमिली की एक्ट्रेस लड़की के फेर में पैसा कमाने के फेर में पड़ जाता है और इवेंट मैनेजमेंट कंपनी शुरू कर देता है. इस लड़की का नाम है करिश्मा और वह घड़ी-घड़ी निखिल को हड़का कर ब्रेकअप का धमकी बम फोड़ती रहती है. करिश्मा की कई बहनों में से एक है मीता, जो बिल्कुल 'बडी टाइप' है. वह जानती है कि लड़कियों की तरह दिखने से ज्यादा जरूरी है कि दिमाग को ज्ञान की तमाम रौशनी दिखाई जाएं. उसके अपने जगत से न्यारे निराले फंडे हैं लाइफ के. वह अपनी बडी़ बहन की शादी के दौरान घर से भाग जाती है. तभी उसकी निखिल से एक छोटी सी मगर याद गली में पता दे जाने वाली मुलाकात होती है.

मीता लौटती है सात साल बाद, जब निखिल की करिश्मा से सगाई हो चुकी है और दोनों परिवार मुंबई में शादी के लिए जुटे हैं. मीता करिश्मा को पिछले वाकये और उसके चलते परिवार में हुए हंगामे की वजह से घर नहीं ले जा सकती है. तो मीता पड़ती है निखिल के पल्ले. मगर मीता लौटी क्यों. वह बीच बीच में चाइनीज में बात क्यों करती है, पलकें क्यों झपकाती है. गोलियां क्यों खाती है और सबसे बड़ी बात, वह घर से भागी ही क्यों थी. और निखिल का क्या, जो अपने करियर को लेकर कन्फ्यूज्ड है और करिश्मा उससे शादी के पहले एक बड़ा प्रोजेक्ट हासिल करने की शर्त सी रखती है. इन सब सवालों के जवाब मिलते हैं औऱ जिंदगी की तमाम परतें एक एक कर नमूदार होती हैं.

एक्टिंग कैसी है सबकी
परिणिति चोपड़ा का मैं फिर से फैन नहीं एसी बन गया हूं इस फिल्म को देखकर. मीता का टॉम बॉय लुक. फिर गर्ली लुक और इन सबके पैरलल गोलियां खाने के बाद सामने आता किरदार. सबमें उन्होंने जिंदगी भर दी है अपनी एक्टिंग से. पलक झपका के, जीभ निकालकर एक गीला टॉवेल मांगना हो या फिर बस में बैठकर निखिल को प्यार पर ज्ञान देना या फिर अपनी फैमिली से मिलने की बेचैनी, उन्होंने हर पल को भरपूर जिया है. सिद्धार्थ मल्होत्रा हैंडसम दिखते हैं और अच्छी बात ये है कि सिर्फ हीरो नहीं, एक्टर भी हैं वह. निखिल के केयरिंग, कुछ कन्फ्यू्ज्ड और कुछ कर गुजरने की चाह रखने वाले के रोल में उन्होंने अपने तईं पूरी कोशिश की है. एक अच्छी बात ये है कि हंसी तो फंसी की कमाल की एक्टिंग वाली लिस्ट में सिर्फ यही दो नाम नहीं आते. मीता के पिता के रोल में मनोज जोशी हों या निखिल के पिता के रोल में शरत सक्सेना, सबकी टाइमिंग बहुत खूब है. करिश्मा के रोल में अदा शर्मा भी अपने किरदार के किनारों को काफी हद तक सहेजने में कामयाब रही हैं. इसके अलावा निखिल के दोस्त-रिश्तेदार और मीता के परिवार वाले भी छोटे छोटे रोल्स में ही अपनी बेहतरीन आमद दर्ज कराते हैं.

क्या-क्या धांसू है फिल्म में
डायरेक्टर विनिथ मैथ्यू ने फिल्म की रफ्तार कहीं भी कम नहीं होने दी. उनको शाबासी इसलिए भी कि रफ्तार के फेर में रिश्तों की बारीकियां भी गुम नहीं होने देते वह. फिल्म की कहानी एक दम फ्रेश है. डायलॉग्स में अनुराग कश्यप का खिलंदड़पन लुभाता है. सीआईडी जोक्स का सीक्वेंस हो या फिर कानपुर आयडल होने का दावा करने वाले निखिल के भाई की मीता के इर्द गिर्द हरकतें. सब कुछ फिल्म के रंग चटख कर देती हैं.

अमिताभ भट्टाचार्य और कुमार की कलम से निकले और विशाल शेखर के म्यूजिक से सजे गाने कहीं से भी ठूंसे गए नहीं लगते. हंसाने के लिए कुछ भी अश्लील नहीं किया जाता और आखिर में फिल्म को जबर फिल्मी ट्विस्ट नहीं दिए जाते.

फिल्म 'हंसी तो फंसी' जरूर देखनी चाहिए. ये एंटरटेनिंग हैं. यूथफुल है, रिफ्रेशिंग है और इसमें स्टोरी और एक्टिंग दोनों शानदार हैं.

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