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Fire In The Mountains Review: मन हरा करते पहाड़ों पर देह गलाती एक औरत की कहानी, आत्मा झिंझोड़ देती है छोटी सी फिल्म

अजीतपाल सिंह की फिल्म 'फायर इन द माउंटेन्स' सोनी लिव पर आ चुकी है. डेढ़ घंटे की ये छोटी सी फिल्म इतना कुछ कहती है कि इसके खत्म होने के बाद आपको इससे बाहर आने में बहुत समय लगेगा. इसके एक्टर्स का नाम शायद आपने पहले न सुना हो, मगर फिल्म देखने के बाद आपको किरदार हमेशा याद रहेंगे.

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'फायर इन द माउंटेन्स' रिव्यू
'फायर इन द माउंटेन्स' रिव्यू
फिल्म:फायर इन द माउंटेन्स
4/5
  • कलाकार : विनम्रता राय, चंदन बिष्ट, मयंक सिंह, हर्षिता तिवारी
  • निर्देशक :अजीतपाल सिंह

सिनेमा में अक्सर एक चीज की बात होती है- कैरेक्टर स्टडी. यानी किसी फिल्म के किरदार में उसके हालात, माहौल, समाज, जरूरतों और आकांक्षाओं से उपजा हुआ बर्ताव. थोड़ा और आसानी से समझें तो किसी एक किरदार के जरिए एक थीम को एक्सप्लोर करना. डेढ़ घंटे की एक छोटी सी फिल्म 'फायर इन द माउंटेन्स' कैरेक्टर स्टडी की एक पूरी किताब है.

अपनी मद्धम गति से आगे बढ़ती इस कहानी के फोकस में 5 किरदार हैं. ये एक परिवार है. पहाड़ भी इस परिवार की कहानी का एक किरदार है. वो पहाड़, जहां शहरी लोग अपनी थकान, उकताहट और ऊब मिटाने जाते हैं. और जहां से लौटते हुए मन हरा कर लाते हैं. लेकिन उसी पहाड़ पर रहने वाला ये परिवार एक बराबर धधकती आग को जी रहा है. ये आग किसने लगाई, क्यों लगाई और इसे लगाकर क्या पाया ये कहानी इस फिल्म में नहीं है. मगर उस आग में क्या कुछ राख हुआ, 'फायर इन द माउंटेन्स' वही दिखाती है. 

'फायर इन द माउंटेन्स' का एक सीन (क्रेडिट: सोशल मीडिया)

      
फिल्ममेकर अजीतपाल सिंह की वेब सीरीज 'टब्बर' को इंडिया के सबसे बेहतरीन ओटीटी शोज में गिना जाता है. एक परिवार की कहानी कहते इस शो ने दर्शकों को सरप्राइज कर दिया था. लेकिन अजीतपाल की फिल्म 'फायर इन द माउंटेन्स' एक छिपा हुआ नायाब हीरा है. इस फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर जनवरी 2021 में, सनडांस फिल्म फेस्टिवल में हुआ था. लेकिन मेजोरिटी ऑडियंस को ये फिल्म देखने का मौका अब सोनी लिव ने दिया है. अगर आपके पास सब्सक्रिप्शन है, तो 'फायर इन द माउंटेन्स' पूरी तरह आपका डेढ़ घंटा डिजर्व करती है. और सब्सक्रिप्शन नहीं है, तो लेकर देखें क्योंकि ये आपको आपके पैसों की पूरी वैल्यू भी देगी. 

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'फायर इन द माउंटेन्स' एक ऐसी फिल्म है जो स्क्रीन पर खत्म होने के बाद भी, लंबे समय तक आपके अंदर घूमती रहेगी. फिल्म का सिनेमाई ग्रामर जितना खूबसूरत है, इसकी कहानी उतनी ही ज्यादा डिस्टर्बिंग. अजीतपाल सिंह की मास्टरी इस बात में है कि उनकी स्टोरीटेलिंग किरदारों के परिवेश, उनके स्ट्रगल को एक्स्ट्रा अटेंशन के साथ हाईलाईट नहीं करती. बल्कि यहां सारा फोकस किरदारों की रोजमर्रा की जिंदगी पर रहता है. इस जीवन से जो दानव निकलकर आते हैं, उनके नाखून आपको फिल्म खत्म होने के बाद भी अपनी चमड़ी के अंदर गहरे धंसे हुए महसूस होते हैं.

कहानी के किरदार
'फायर इन द माउंटेन्स' कहानी है 'चंद्रा' की. फिल्म शुरू होती है तो पहले फ्रेम में आपको चंद्रा (विनम्रता राय) के पैर दिखते हैं, दौड़ते हुए. उत्तराखंड के पहाड़ों में बसे मुनस्यारी में चंद्रा होमस्टे चलाती है, ऐसा कहा जा सकता था. लेकिन उसके पति, धरम (चंदन बिष्ट) का दावा है कि घर उसका है. इनका बेटा प्रकाश (मयंक सिंह) एक एक्सीडेंट के बाद से व्हीलचेयर पर है. सड़क इनके गांव तक नहीं जाती और प्रकाश को हर हफ्ते डॉक्टर के पास ले जाना पड़ता है. तो चंद्रा, प्रकाश को अपनी पीठ पर उठाकर सड़क तक लाती और ले जाती है. 

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'फायर इन द माउंटेन्स' की चंद्रा (क्रेडिट: सोशल मीडिया)

धरम उस किस्म का आदमी है जो पैसे कमाने की कोशिश में एक के बाद एक कई छोटे-छोटे बिजनेस ट्राई कर चुका है. एक पैम्फलेट में मुर्गीपालन पर सरकारी सब्सिडी की स्कीम देखकर वो दो मुर्गियां घर ले आता है. चंद्रा और धरम की एक बेटी भी है, कंचन, जो पढ़ने में बहुत होशियार है. उसके नंबर बहुत अच्छे आते हैं. एक सीन में वो अपनी चोटी एक रस्सी से बांधकर पढ़ती नजर आती है. इसी घर में धरम की विधवा बहन (सोनल झा) भी रहती है. परिवार की डोर में बंधे इन किरदारों की डेली लाइफ ही कहानी को आगे बढ़ाती है.

महत्वाकांक्षाएं, उम्मीद और दिल तोड़ने वाली सच्चाइयां
धरम एक ऐसा आदमी है, जो खुद ही अपनी नाकामियों का सबसे बड़ा विक्टिम है. वो शराबी हो चुका है और उसका विश्वास चीजों को सही से समझने से ज्यादा, दैविक शक्तियों में है. उसका मानना है कि देवता उसके परिवार से रूठे हुए हैं. इसलिए वो अपने घर पर एक अनुष्ठान करवाना चाहता है, जिसे जागर कहते हैं. उसका मानना है कि इससे उसका बेटा प्रकाश भी चलने लगेगा. लेकिन जागर के लिए भी मोटा खर्च लगेगा, जिसका इंतजाम धरम की खुद की कमाई से तो हो ही नहीं सकता. वो चाहता है कि चंद्रा जो भी पैसे जुटाती है, वो जागर के लिए दे दे. चंद्रा का इनकार उसे सबसे बड़ी अड़चन लगता है क्योंकि उसे लगता है वो देवताओं के काम में बाधा डाल रही है. 

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'फायर इन द माउंटेन्स' के धरम और कंचन (क्रेडिट: सोशल मीडिया)

कंचन इस परिवार में बदलाव की एक उम्मीद है. पढ़ाई में उसकी शानदार परफॉरमेंस और कुछ करने का जज्बा देखकर, उसके पेरेंट्स ने उसके लिए बंदिशें वैसी नहीं रखी हैं जैसी इस तरह के ट्रेडिशनल समाज में होती है. ये छोटी सी फ्रीडम उसके एम्बिशन का ईंधन है, जिसकी एनर्जी का इस्तेमाल वो 'टुकटुक' ऐप पर वीडियोज बनाने में करती है. इन वीडियोज में कंचन का एक अलग अवतार है जो उसके अपने माहौल के हिसाब से अल्ट्रा फैशनेबल है. लेकिन कहानी में थोड़ा आगे बढ़ने पर उसका ये एम्बिशन रिस्की भी लगने लगता है. 

प्रकाश इस कहानी का सबसे साइलेंट किरदार है. लेकिन आर्ट में उसकी खूब दिलचस्पी लगती है. वो मिठाई का खूब शौकीन है. वो अपनी मां को बहुत प्यार करता है. जब चंद्रा उसे अपनी पीठ पर लादकर पगडंडी से गुजरती है, तो एक खास मोड़ पर रुकती है जहां पर एक पेड़ है. प्रकाश इस पेड़ के फूल तोड़कर अपनी मां के बालों में लगाता है. उसकी मां ही शायद परिवार में एकमात्र व्यक्ति है जो उसे समझती है. लेकिन कहानी में एक दिल तोड़ देने वाले मोमेंट के बाद वो अपनी मां के बालों में ये फूल लगाना छोड़ देता है. ये मोमेंट 'फायर इन द माउंटेन्स' के सबसे हार्ड हिटिंग सीन्स में से एक है. फिल्म में कई जगह उसके साथी बच्चे उसे बुरी तरह बुली करते हैं और तब आपकी सिम्पथी उसके साथ होती है. लेकिन एक टाइम के बाद आपको प्रकाश बुरा भी लगेगा.

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'फायर इन द माउंटेन्स' का प्रकाश (क्रेडिट: सोशल मीडिया)

चंद्रा इस पूरी कहानी में सबसे सुलझा हुआ किरदार और ट्रेडिशनल नैतिकता का पिलर है. वो इसलिए क्योंकि उसका एम्बिशन पैसे या तरक्की से नहीं जुड़ा है. वो जो कुछ कर रही है, अपने परिवार के लिए ही कर रही है. इस 'स्विट्जरलैंड होमस्टे' का सारा काम वही देखती है. फिल्म के पहले सीन में वो एक टूरिस्ट परिवार को अपने होमस्टे में लाने के लिए ही भाग रही थी. वो लिटरली एक-एक पैसा जोड़ती है. इन पैसों से वो प्रकाश का इलाज करवाना चाहती है और अपने घर तक सड़क बनवाना चाहती है. ताकि प्रकाश को हर हफ्ते नियम से डॉक्टर के पास ले जा सके और उसके होमस्टे में और ज्यादा टूरिस्ट आएं. 

पूरी कहानी का एक बड़ा हिस्सा प्रकाश के इलाज से जुड़ा है. लेकिन उसके हैंडीकैप से जुड़ा एक राज जब खुलता है, तो आप स्तब्ध रह जाते हैं. इस पूरी चक्की में चंद्रा लगातार पिसती सी लगती है. फिल्म के एंटी-क्लाइमेक्स तक आते-आते आपको लगने लगता है कि हर एक व्यक्ति चंद्रा को ठग रहा है. ये ठगना इस हद तक है जहां आप बेचैन होने लगते हैं कि ये चंद्रा अपने लिए कोई क्रांति क्यों नहीं करती, आवाज क्यों नहीं उठाती. चंद्रा के फ्रस्ट्रेशन की चीख, आपको अपने अंदर गूंजती महसूस होती है. जबकि विडंबना ये है कि वो ऐसा कोई क्रांतिकारी कदम नहीं उठाती. ऐसा नहीं है कि नैतिकता के पैमाने पर चंद्रा भी एकदम खरी है. 

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धरम की विधवा बहन, जो खुद इस घर में अपने फ्रस्ट्रेशन को एक बाहरी की तरह जी रही है, उसके साथ चंद्रा का बर्ताव गलत लगता है. लेकिन यहां चंद्रा के रिएक्शन, ट्रेडिशनल सोसाइटी में रहने से गढ़े हुए लगते हैं. 'फायर इन द माउंटेन्स' आपको लगातार सही-गलत और ट्रेडिशनल-मॉडर्न के इस भंवर में फंसाती है. लेकिन क्या चंद्रा का ये लगातार घुटता जा रहा मन कभी कोई विस्फोट करेगा? और करेगा तो क्या असर होगा? क्या पहाड़ के इस सामाजिक तानेबाने में इस विस्फोट का कोई स्कोप है भी?

परफॉरमेंस और स्टोरीटेलिंग 
'फायर इन द माउंटेन्स' की कास्ट में ऐसे एक्टर्स हैं जिनका नाम भी शायद आपने पहले न सुना हो. लेकिन ये फिल्म देखने के बाद इनका चेहरा आप कभी नहीं भूल पाएंगे. विनम्रता राय की चंद्रा आपके अंदर उन इमोशंस को परफेक्टली अपील करती है, जो ये किरदार डिजर्व करता है. उनकी बंधी हुई बॉडी लैंग्वेज, खोई हुई आंखें, कंट्रोल्ड टोन और अंडरप्ले किए एक्सप्रेशन इस किरदार को एकदम अलग लेवल पर ले जाते हैं. चंदन की आंखें और बोली तो धरम को परफेक्टली रचती ही हैं. उनका बॉडी स्ट्रक्चर, इस किरदार को बहुत सूट करता है. प्रकाश के रोल में नजर आए मयंक की ब्रिलियंस उन सीन्स में दिखती है जब वो व्हीलचेयर में हैं. हर्षिता की एनर्जी कंचन के लिए एकदम परफेक्ट है. दोनों बच्चों की परफॉरमेंस खास तौर से याद रखने लायक है. 

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अजीतपाल के बारे में एक चीज यहां बताने लायक है कि वो उन्होंने फिल्ममेकिंग खुद से सीखी है, बिना किसी फिल्म इंस्टिट्यूट गए. लेकिन 'फायर इन द माउंटेन्स' सबूत है कि जो समय उन्होंने इंस्टिट्यूट में खर्च नहीं किया, उसे दुनिया समझने में लगाया है. जिस परिवार की कहानी उन्होंने फिल्म में कही है, उसके संसार को बुनने वाले एक-एक धागे की समझ अजीतपाल की स्टोरीटेलिंग में दिखती है.

फिल्म की टेक्निकल ब्रिलियंस
कैमरे के पीछे डोमिनिक कॉलिन का काम कमाल का है. वो एक तरफ पहाड़ों की अद्भुत सीनरी को पूरी ग्लोरी में कैप्चर करते हैं, तो 'स्विट्ज़रलैंड होमस्टे' के एक-एक कोने को उसकी पूरी घुटन के साथ कैप्चर करते हैं. फिल्म के बीच में, जब आपके सामने कहानी के सारा पज़ल रख दिए गए हैं, तब कॉलिन का कैमरा होमस्टे के बोर्ड पर पड़ता है, जिसके नाम में 'T' गायब है (Swizerland) और उसपर कीड़े बैठे हुए हैं. इस फिल्म को इस तरह शूट किया गया है कि इसमें डाक्यूमेंट्री सी ऑथेंटिसिटी भी लगती है, जबकि है ये एक फीचर ड्रामा ही. दरवाजों और खिड़कियों या दरख्तों के बीच, फ्रेम के अंदर फ्रेम वाली सेटिंग किरदारों की टेंशन को बनाए रखती है.

परीक्षित झा और साइमन प्राइस की एडिटिंग 'फायर इन द माउंटेन्स' को एक कसी हुई फिल्म बनाते हैं. इसका खोल पहाड़ की रिलैक्स लाइफ का है, लेकिन कहानी के अंदर का खलल लगातार एक बराबर पेस पर बना रहता है और यही वजह है कि क्लाइमेक्स से ठीक पहले चंद्रा ही नहीं, बाकी किरदारों की घुटन भी आपको बेचैन करती है. डेढ़ घंटे की इस फिल्म में कोई भी सीन बेमतलब या किसी एक हिस्से को एक्स्ट्रा हाईलाइट देने वाला नहीं है. और इसमें मोहनदास का साउंड डिजाईन वो खूबसूरत टच है जो पहाड़ों पर महसूस होने स्पेस और माहौल को उभारता है. 

'फायर इन द माउंटेन्स' में एक छोटी सी कमी बस ये लगती है कि प्रकाश के किरदार को थोड़ा और एक्सप्लोर किया जा सकता था. उसके कैरेक्टर का बड़ा ट्विस्ट आपको फिल्म में पता चलेगा. लेकिन इस ट्विस्ट के बाद आप ये जानना चाहेंगे कि उसके किरदार की मोटिवेशन क्या है, उसकी साइकोलॉजी क्या है. 

कुल मिलाकर 'फायर इन द माउंटेन्स' एक ब्रिलियंट कैरेक्टर स्टडी है. इसकी सबसे बड़ी खासियत ये है कि फिल्म आपको कहानी से सिम्पथी फील कराने, या इन हालात से घिन पैदा कराने की कोशिश नहीं करती. अजीतपाल की ब्रिलियंट स्टोरीटेलिंग आपको एक खिड़की से ये कहानी दिखाती है और फिल्म खत्म होने पर आपको ऐसा लगेगा जैसे कहानीकार उठकर चला गया है. अंत में कहानी का पूरा खलल, सारा कनफ्लिक्ट आपका है. ये आप पर है कि आप उसे फेमिनिज्म के नजरिए से देखें, या समाज के पिछड़ेपन के चश्मे से! 

 

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