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एक दिन आएगा, जब परिमा को फूलों से डर नहीं लगेगा

एक सीन है जिसे लिखते हुए एकबारगी हम भी हिचके थे. कितनी बातें कीं, कितना सोचा, पढ़ा और सुना और यूं तो लेखक अंत तक पूरे निश्चित नहीं होते, लेकिन जितने होते हैं, उसमें लगा कि जो घटना इतनी नाकाबिले बर्दाश्त है, उसी की कहानी कहते हुए उससे बचकर कहां जाएंगे?

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परिमा ने खुद को विक्टिम नहीं माना (Photo: ITG)
परिमा ने खुद को विक्टिम नहीं माना (Photo: ITG)

एक नेम प्लेट है, 'अस्सी' में परिमा के घर के बाहर. जिस पर लिखा है- ध्रुव, परिमा और विनय का घर और फूल बने हैं, फूल जो परिमा को बहुत पसंद थे, और जिनसे उसे अब डर लगता है.

परिमा की कहानी कहने जब हम निकले तो हमें नहीं पता था कि परिमा एक दिन हमें राह दिखाने लगेगी. पिछले कुछ समय में कई सारी भावुक कर देने वाली प्रतिक्रियाएं मिलीं, प्रेम मिला और एक नई चीज जो मिली, वो ये कि औरतें इसे फिल्म से अलग, फिल्म के पार देख रही हैं, लेकिन मस्ट वॉच जिन्होंने कहा, एक शब्द उनकी भी प्रतिक्रियाओं में बार-बार आया कि फिल्म `डिस्टरबिंग` है. मेरी पहचान के कुछ लोगों ने, कुछ दोस्तों ने कहा कि वे देखना चाहते हैं लेकिन इसीलिए हिचक रहे हैं तो मन में कई सवाल आए, बातें आईं.

दरअसल एक सीन है - जिसे लिखते हुए एकबारगी हम भी हिचके थे. कितनी बातें कीं, कितना सोचा, पढ़ा और सुना और यूं तो लेखक अंत तक पूरे निश्चित नहीं होते, लेकिन जितने होते हैं, उसमें लगा कि जो घटना इतनी नाकाबिले बर्दाश्त है, उसी की कहानी कहते हुए उससे बचकर कहां जाएंगे? हम सिर्फ अपराध कथा कहने थोड़े ही निकले हैं और यह सिर्फ शारीरिक हिंसा नहीं है, यह उतनी नहीं है, जितनी अखबार के एक कॉलम में रोज छपती है. यह किसी की आत्मा के, उसके अस्तित्व के साथ हिंसा है.

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सच्चाई दिखाती है फिल्म 'अस्सी'

ये ताकत के सबसे कुरूप इस्तेमालों में से एक है. इसे कहने का कोई आसान तरीका हमें तो समझ नहीं आया. हमें बस इतना समझ में आया कि हम उस कार में कुछ देर रहेंगे, लेकिन उसमें शरीर नहीं देखेंगे. हम बस उन लड़कों की आंखें देखेंगे, उनकी बातें सुनेंगे, उनकी हंसी सुनेंगे, वे आम लड़के, जो हमारे भाई, बेटे, पड़ोसी या दोस्त हो सकते हैं. जिनके अपने जीवन में उन्हें प्रेम करने वाली, उन पर भरोसा करने वाली औरतें हैं. आखिर हम यहां पहुंचे कैसे- या हमेशा से यहीं हैं? इसके बाद हम जाएंगे कहां? और सजा पूरा न्याय हो सकती है क्या? क्योंकि खबर में तो पढ़के तो लगता है कि सजा ही न्याय है, पर आप उस कार में परिमा के साथ रहे हैं, तो भी ऐसा लगेगा क्या? यह भी तलाश रही हमारी, इस फिल्म को लिखते बनाते हुए. जवाब नहीं पता. जवाब शायद सबके अलग अलग होंगे.

लिखते-लिखते और लिखने के बाद किरदार और कहानियां अपनी यात्रा पर निकल जाते हैं, आजाद हो जाते हैं और कुछ समय बाद तुम उन्हें जिंदा लोगों की तरह देखते हो. अब लगता है कि शायद परिमा ने ही हमसे कहा कि हमें कुछ देर कार में उसके साथ रहना होगा, तभी हम उसके आगे की कहानी सुना पाएंगे, जो असल में पूरी फिल्म है.

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जिसमें परिमा विक्टिम होने से इनकार कर देती है, शायद दूसरों की निगाह से खुद को देखने से इनकार कर देती है. अपनी कहानी को निराशा की कहानी बनने देने से इनकार कर देती है. कोर्ट में तो जो होगा, सो होगा, पर उसे स्कूल वापस जाना है. प्रतिशोध की उसे फुरसत नहीं. ये घाव बहुत गहरे हैं, उसे मालूम है उनका असर वो रोज झेलती है, लेकिन जीवन को फिर से संजोया जा सकता है, ये भी उसे याद है.

हमें अंधेरे को आंखों में आंखें डालकर देखना था, उसके बिल्कुल पास जाके, क्योंकि उसे देखे बिना फिल्मी उम्मीद की बात तो की जा सकती है, पर उसके बिना असली उम्मीद की कोशिश बेमानी सी है. अब लगता है कि हम शायद उसी की तलाश में निकले थे. असली उम्मीद, जो हमें परिमा के जीने ने दिखाई. वो हमें हाथ पकड़कर ले गई कोर्ट में, स्कूल में, जो हमें उसके पति विनय ने दिखाई. यह एक प्रेम कहानी भी हो सकती थी, परिमा और विनय की. शायद है भी. वो नेम प्लेट जिस पर लिखा है - ध्रुव, परिमा और विनय का घर. उस पर अभी भी फूल हैं, हमेशा रहेंगे. उसे उन्होंने गर्मियों की एक शाम पिछली गली के बाजार में बनवाया था. और मुझे लगता है कि एक दिन आएगा, जब परिमा को फूलों से डर नहीं लगेगा.

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(नोटः गौरव सोलंकी फिल्म `अस्सी` के लेखक हैं)
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