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Exclusive: IIT की नौकरी छोड़ लेखक बने गौरव सोलंकी ने बता दी ‘अस्सी’ फिल्म की कहानी!

20 फरवरी को रिलीज होने जा रही रहस्यमयी फिल्म ‘अस्सी’ का ट्रेलर बॉर्डर 2 के साथ आएगा. राइटर गौरव सोलंकी ने आजतक से एक्सक्लूसिव बातचीत में फिल्म की कहानी, टाइटल की अहमियत और सोशल मैसेज पर खुलकर बात की.

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अस्सी फिल्म के राइटर ने बता दी कहानी (Photo: ITG)
अस्सी फिल्म के राइटर ने बता दी कहानी (Photo: ITG)

20 फरवरी को एक फिल्म रिलीज होने वाली है जिसकी अनाउंसमेंट सिर्फ उसके टाइटल 'अस्सी' से की गई. ना ही फिल्म की कास्ट, ना डायरेक्टर, ना प्रोड्यूसर और किसी और तरह की जानकारी रिवील की गई. फिल्म ने शोबिज वर्ल्ड में खलबली मचा दी. बॉर्डर 2 फिल्म के साथ ही इसका ट्रेलर जारी होने वाला है. इससे पहले फिल्म के राइटर गौरव सोलंकी ने आजतक से एक्सक्लुसिव बातचीत की. गौरव ने फिल्म के कुछ अहम फैक्ट्स शेयर किए और बताया कि कैसे ये बेहद खास फिल्म है. पढ़ें पूरा इंटरव्यू... 

-अस्सी फिल्म में क्या खास है?

गौरव बोले- अस्सी एक बहुत ही क्रूशियल नंबर है जो आपको ट्रेलर से ही समझ में आ जाएगा. फिल्म का जो टाइटल है वही इसकी आत्मा है. इसलिए हम चाहते थे कि जब फिल्म की बात हो तो इसी के आसपास हो. फिल्म की राइटिंग पर बात हो रही है, ये बड़ी खुशी की बात है. फिल्म की कहानी एक कोर्टरूम ड्रामा है. एक बहुत ही फास्ट पेस, इंवेस्टिगेटिव, थ्रिलिंग फिल्म हमने बनाई है. जो कि सोशल रिएलिटी पर भी बात करती है. हमारे समाज और आज के समय के लिए बहुत रेलेवेंट है. इसकी कहानी बहुत सारी चीजों से इंस्पायर्ड है, जो भी हम देखते पढ़ते और सुनते रहते हैं.

'हम सबने फिल्म के लिए बहुत मेहनत की है, इस फिल्म का किंग ही इसकी कहानी है. यहां ऐसा है कि हमने बहुत उम्दा एक्टर्स को लिया है. जो कि ट्रेलर में दिख ही जाएगा. फिल्म की कास्ट कहानी को बहुत ऊपर लेकर गए हैं.'

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-अस्सी को राइटर के नाम से क्यों प्रमोट किया गया?

गौरव बोले- ये अनुभव सिन्हा का आईडिया था. वो हमारे काम को और लेखन को बहुत वैल्यू करते हैं. वो चाहते थे कि सबसे पहले राइटिंग की बात होनी चाहिए. फिल्म के लिए भी ये बहुत अच्छा रहेगा. आप देखेंगे कि जब भी फिल्मों की बात होती है, या जो रिव्यूज होते हैं- उनमें राइटिंग के लिए महज एक लाइन लिख दी जाती है. फिल्म की कहानी ही उसका बैकबोन होती है, जब कोई पिक्चर बननी शुरू होती है तो सबसे पहले वो कागज पर होती है. तो सिर्फ मेरे लिए नहीं बल्कि मुझे लगता है कि सब राइटर्स के लिए ये प्राउड मोमेंट है कि फिल्म की चर्चा राइटिंग से शुरू हो रही है. किसी फिल्म को सम्मान उसकी कहानी के जरिए मिल रही है. कभी-कभी ऐसा होता है कि लेखक को क्रेडिट और पैसे के लिए स्ट्रगल करना पड़ता है. ऐसा नहीं कि राइटर्स को कभी सम्मान नहीं मिला या ये पहली बार हो रहा है, पर हां हमारी एक कोशिश जरूर है. उसे बढ़ावा देने की. उम्मीद है ये काम करेगा. 

अनुभव सिन्हा से कैसे जुड़े?

गौरव ने कहा- वो बड़ी दिलचस्प शुरुआत रही, मैं तब सुधीर मिश्रा के साथ काम कर रहा था. अनुभव और सुधीर की बहुत पुरानी दोस्ती है. वो उनके ऑफिस आया करते थे. पहली मुलाकात वहीं हुई. सुधीर भाई से उन्होंने कहा कि एक ऐसा राइटर बताओ जो स्क्रिप्ट और लिरिक्स दोनों लिख सके, तो सुधीर ने मेरा नाम सजेस्ट किया. क्योंकि उस समय वो एक म्यूजिकल फिल्म लिख रहे थे, हालांकि वो प्रोजेक्ट फिर नहीं बना. लेकिन हमारी बातें आर्टिकल 15 पर पहुंच गई. उन दिनों वो मुल्क के पोस्ट प्रोडक्शन में लगे थे. उस फिल्म के भी एक आखिर के सीन को मैंने री-राइट किया. फिर हमने आर्टिकल 15 पर साथ काम किया और बड़े ही ऑर्गेनिक तरीके से हमारा रिश्ता बना. हम दो और फिल्मों पर काम कर रहे हैं. 

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- राइटिंग के लिए IIT पास होकर हाई पेड जॉब छोड़ दी. आप खुद कहते हैं कि राइटिंग से सिर्फ घर नहीं चलता. फिर कैसे मुंबई जैसे शहर में कैसे मैनेज करते हैं?

गौरव ने कहा- ये कोई वेल पेड जॉब नहीं है, इंडस्ट्री में. अगर आप बाकी लोगों से कम्पेयर करेंगे तो ऐसा लगेगा. लेकिन जब कोई छोटे से शहर से बंबई आता है तो वो एक बहुत लंबा समय होता है स्ट्रगल का, जिसमें समय लगता है सही आदमी तक पहुंचने में, या अपने काम को पहुंचाने का. आप जो लिखते हैं, वो बन जाए और पूरी तरह तैयार हो जाए, सबसे बड़ा स्ट्रगल वही होता है. राइटर्स के बारे में बातचीत बहुत कम होती है, उनके इंटरव्यूज भी बहुत कम होते हैं. जब हम फिल्मों की बात करते हैं तो एक्टर्स की बात ही होती है. पर मुझे लगता है धीरे-धीरे समय बदल रहा है. 

'जब मैंने जॉब छोड़ी थी, तब से लेकर अब में बहुत बदलाव आ चुका है. अब तो सोशल मीडिया जैसे रास्ते भी हैं. अब तो दो-तीन लोग मिलकर फनी, इमोशनल रील बनाते हैं. आज आपके पास अपना टैलेंट दिखाने के कई जरिए हैं. लेकिन आज से 12 साल पहले जब मैं आया था. 2011 में जब मैं बंबई आया था तब मुझे एक क्लेरिटी थी कि टीवी नहीं करना है, फिल्म करना है. तो सफर मुश्किल रहा है, लेकिन मुझे ये पता था कि करना यही है, इसके लिए संघर्ष करना पड़े, या कम पैसों में भी गुजारा करना पड़े, कर लेंगे. क्योंकि मैं एक ऐसे रास्ते पर था जब मैं आईआईटी करने के बाद एक अच्छी नौकरी कर रहा था, अच्छे पैसे कमा रहा था. मेरे पास ऑप्शन था कि आराम से 10 साल वो कर सकता था. लेकिन मुझे महसूस हुआ कि ये मैं और नहीं कर सकता.'
  
-आपने तांडव, आर्टिकल 15 जैसी कहानियां लिखी हैं. इनकी इंस्पिरेशन कहां से आती है, क्या आपने भी कभी भेदभाव झेला है या अपने आसपास देखा है?

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लेखक की नजर एक ऑब्जरवर की होती है. जब मैं छोटा था तो हमारी गली एक सफाई करने वाले थे, जब भी वो आकर किसी के घर में पानी मांगते थे तो उनको अलग बर्तन में पानी दिया जाता था. पानी के लिए कोई मना नहीं करता था लेकिन बर्तन अलग होता था. तब मैं छोटा बच्चा था तो मुझे ये चीज बड़ी खटकती थी. फिर आसपास देखते थे कि कैसे लोग नाम पूछते ही सरनेम पूछते हैं, उसका मकसद क्या होता है. इस तरह की सोशल रिएलिटीज से बहुत पाला पड़ा है, जब आप छोटे शहर की गलियों में पले हों तो आपको इनका एहसास हो जाता है. फिर आपके काम में भी इनकी झलक आने लगती है.  

'अस्सी का इंस्पिरेशन भी हमें ऐसे ही मिला. बहुत सारी घटनाएं ऐसी हो रही थीं जो मुझपर और अनुभव पर लगातार असर डाल रही थीं. और एक कलाकार के पास तरीका यही होता है कि वो अपने काम के माध्यम से किसी को जागरुक करे. खुशकिस्मती से हमने सोचते-सोचते एक कोर्टरूम ड्रामा और थ्रिलर कहानी के जरिए अपनी बात कहने का रास्ता निकाला. फिर हमें जब एक बार क्लेरिटी आई तो हमने बहुत जल्दी लिखी और बनाई. मुझे लगता है कि ये फिल्म जेन जी, परिवारों को और बाकी सभी को देखनी चाहिए. पूरे देश को देखनी चाहिए, ये एक बहुत जरूरी फिल्म है.'

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- एआर रहमान ने कहा कि 'बॉलीवुड में कम्यूनल डिफ्रेंसिस हैं, अब नॉन-क्रिएटिव लोग फैसले ले रहे हैं', आप इससे कितने सहमत हैं?

गौरव ने कहा कि- मुझे नहीं लगता कि इंडस्ट्री में कोई कम्यूनल है. ये एक ऐसी इंडस्ट्री है जो सबको शामिल करके चलती है. मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ. 

- बड़ी बात हो जाती है जब एक ऑस्कर विनिंग म्यूजिक कम्पोजर जब कहते हैं कि उन्हें बॉलीवुड में 8 साल तक काम नहीं मिला, ऐसे में आपको कभी इनसिक्योरिटी ने घेरा है.

गौरव बोले कि- मुझे कभी कोई इनसिक्योरिटी नहीं हुई. मैं तो पहले ही एक रास्ते को छोड़कर यहां आया हूं. मेरे पास तो हमेशा से प्लान बी रहा है, आईआईटी की डिग्री है मेरे पास, तो कभी कुछ नहीं हुआ तो बच्चों को पढ़ा लूंगा. लेकिन लिखता रहूंगा. लिखने के लिए तो कभी संसाधनों की जरूरत नहीं होती. लेकिन अभी मेरे पास बहुत सारा काम है, सब कुछ बहुत अच्छा है. मेरी प्लेट्स फुल हैं. 

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