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आर डी बर्मन को अखबार की हेडलाइन लगा था 'मेरा कुछ सामान' गाना, आशा भोसले की वजह से सिर्फ 15 मिनट में बनी धुन!

'मेरा कुछ सामान' सिर्फ गाना नहीं, एक कल्ट है. जिस यंग जेनरेशन ने आशा भोसले का कोई गाना नहीं सुना होगा, उन्हें भी ये गाना पता होता है. इस आइकॉनिक गाने को धुन में पिरोना कंपोजर आर डी बर्मन के लिए बहुत मुश्किल था. लेकिन आशा जी की वजह से इसकी धुन केवल 15 मिनट में बन गई थी.

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'मेरा कुछ सामान' गीत ऐसे बना था! (Photo: Screengrab)
'मेरा कुछ सामान' गीत ऐसे बना था! (Photo: Screengrab)

आशा भोसले के गाए गीत वक्त के इम्तिहान पर पूरी तरह खरे उतरे हैं. 70 सालों तक, आशा की आवाज ने हर इमोशन को एक सदाबहार नगमा बना दिया. बीते 70 सालों में लगभग हर दशक में आपको आशा का कोई न कोई गाना मिल जाएगा, जो जाने-अनजाने कभी न कभी आपकी प्लेलिस्ट में रह चुका है. इनमें इजाजत फिल्म के गाने 'मेरा कुछ सामान' का अपना एक कल्ट है.

करीब दो दशकों तक इस गाने को फिल्म फैन्स में 'अंडररेटेड' माना जाता रहा. मगर पिछले कुछ सालों में लोगों ने 'मेरा कुछ सामान' को ऐसा डिस्कवर किया कि जिस जेनरेशन ने आशा के करियर का पीक नहीं देखा, उनमें भी ये आशा की पहचान है. गाने के इमोशनल लिरिक्स Gulzar ने लिखे हैं, कंपोज R. D. Burman ने किया था. लेकिन फिर भी इस गाने के बनने में आशा का ही रोल सबसे बड़ा है क्योंकि उन्होंने सिर्फ इसे गाया नहीं था, बल्कि इसकी धुन बनने में भी बड़ा रोल निभाया था. वो भी तब, जब बॉलीवुड लेजेंड आर डी बर्मन ने इसके लिरिक्स देखकर सिर पकड़ लिया था.

'मेरा कुछ सामान' के लिरिक्स देखकर भड़क गए थे बर्मन
इजाजत फिल्म का ये गाना तो आपने सुना ही होगा. ये बाकी गानों से अलग इसलिए है क्योंकि गुलजार ने इसे एक गीत की तरह नहीं, नज़्म की तरह लिखा था. लाइनों के अंत में सुर का कोई मेल ही नहीं था— 'एक सौ सोलह चांद की रातें, एक तुम्हारे का तिल. गीली मेहंदी की खुशबू, झूठ-मूठ के शिकवे कुछ. झूठ-मूठ के वादे भी सब याद करा दो. सब भिजवा दो, मेरा वो सामान लौटा दो'. इस तरह के गाने को कोई धुन कैसे देता भला!

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इजाजत के डायरेक्टर गुलजार ने फिल्म के गीत भी खुद ही लिखे थे. कई साल पहले एक इंटरव्यू में गुलजार ने बताया था कि जब वो लिरिक्स लेकर बर्मन के सामने पहुंचे, तो उन्होंने माथा पकड़ लिया! भड़कते हुए बर्मन ने कहा— कल को तुम अखबार की हेडलाइन ले आओगे और बोलोगे कि इसकी धुन बना दो!

गुलजार और बर्मन की इस मुलाकात के वक्त आशा जी भी मौजूद थीं. उन्होंने लिरिक्स देखे और इसमें 'वो भिजवा दो' हिस्सा गुनगुनाना शुरू कर दिया. आशा जिस धुन में गुलजार के लिरिक्स गुनगुना रही थीं, बर्मन ने उसी टुकड़े को पकड़कर मात्र 15 मिनट में पूरा गीत बुन डाला.

इजाजत उस समय बहुत मेनस्ट्रीम फिल्म नहीं थी. इसलिए फिल्म और इसके गानों तक पहुंचने में जनता को थोड़ा वक्त लगा. 'मेरा कुछ सामान' के लिए गुलजार को बेस्ट लिरिक्स और आशा भोसले को बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर का नेशनल अवॉर्ड मिला था. उस वक्त इस गाने को अपने 'वक्त से आगे का गाना' कहा गया था. ये बात पूरी तरह सच साबित हुई है. आज जब बॉलीवुड फैन्स आशा जी को नम आंखों से विदाई दे रहे हैं, तो उन्हें याद करते हुए 'मेरा कुछ सामान' बार-बार जुबान पर आ रहा है.

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