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यूपी में क्यों हार गई कांग्रेस? जवाब में गिनाए जा रहे हैं ये सात कारण

यूपी में बड़ी हार के बाद कांग्रेस के भीतर बेचैनी नज़र आ रही है. दो दिन खामोश रहने के बाद मीडिया से मुखातिब हुए राहुल गांधी खुद संगठन में बदलाव की बात कर रहे हैं.  संदीप दीक्षित और सत्यव्रत चतुर्वेदी सरीखे नेता सवाल खड़े कर रहे हैं. ऐसे में पार्टी में इस बात पर हर स्तर पर चर्चा है कि, आखिर यूपी में हमसे भूल कहां हुई?

हार से राहुल की भूमिका पर भी उठे सवाल हार से राहुल की भूमिका पर भी उठे सवाल

यूपी में बड़ी हार के बाद कांग्रेस के भीतर बेचैनी नज़र आ रही है. दो दिन खामोश रहने के बाद मीडिया से मुखातिब हुए राहुल गांधी खुद संगठन में बदलाव की बात कर रहे हैं. ओडिशा पंचायत चुनाव में हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए प्रभारी महासचिव बीके हरिप्रसाद इस्तीफ़ा दे चुके हैं. संदीप दीक्षित और सत्यव्रत चतुर्वेदी सरीखे नेता सवाल खड़े कर रहे हैं. ऐसे में पार्टी में इस बात पर हर स्तर पर चर्चा है कि, आखिर यूपी में हमसे भूल कहां हुई?

शुरुआती चर्चा में ये 7 बड़ी वजहें सामने आई हैं...
1. समाजवादी पार्टी के खिलाफ ज़बरदस्त सत्ता विरोधी लहर थी.

2. सपा के खिलाफ एंटी यादव माहौल भी था, भर्तियां हों, ठेकेदारी हो या नियुक्तियां. यादवों को तरजीह मिलने से बाकियों में नाराजगी थी.

3. विकास सिर्फ लखनऊ तक सीमित था, आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे और स्टेट हाईवे को ही सिर्फ जनता ने विकास नहीं माना. शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, उद्योग धंधे के क्षेत्र में अखिलेश सरकार कुछ खास नहीं कर पाई.

4. बसपा पहले से 101 मुस्लिम उम्मीदवारों का ढोल पीटकर दलित-मुस्लिम गठजोड़ पर दांव लगा रही थी, फिर ऐसा संदेश गया कि सपा, कांग्रेस गठजोड़ भी मुस्लिम वोटों को इकठ्ठा करने के लिए और यादव- मुस्लिम गठजोड़ के लिए हुआ है. जिससे नॉन यादव और हिंदू मतदाता इकट्ठा हो गया.

5. पंजाब में हिट रहे, लेकिन यूपी में रणनीतिकार प्रशांत किशोर फ्लॉप हो गए. उनका सपा से गठबंधन का दांव गलत था. गठबंधन भी आखिरी वक़्त में हुआ. निचले स्तर पर कार्यकर्ता आपस में जुड़े नहीं, उलटे कांग्रेस को मिल सकने वाला नॉन यादव, सवर्ण और सरकार से नाराज वोट बीजेपी चला गया. आखिरी तक करीब एक दर्जन सीटों पर सपा और कांग्रेस के उम्मीदवार आमने सामने लड़ रहे थे.

6. रणनीतिकारों को उम्मीद थी कि पश्चिमी यूपी में जाट वोट अजीत सिंह काट लेंगे, जिसका बीजेपी को नुकसान होगा. इसीलिए आरएलडी को अकेला छोड़ दिया गया, लेकिन ये दांव भी उल्टा पड़ गया.

7. मतदान की शुरुआत वाले दिन यानी 11 फरवरी को बनारस में होने वाला रोड शो टालना पड़ गया. आखिरी दिन यानी 6 फरवरी को बनारस में राहुल-अखिलेश की जॉइंट प्रेस कॉन्फ्रेंस रद्द करनी पड़ गई. प्रियंका और सोनिया प्रचार से करीब-करीब दूर रहीं. प्रियंका को लेकर आखिर तक सस्पेंस बना रहा, तो सोनिया की रायबरेली में होने वाली इकलौती रैली भी नहीं हुई.

ऐसे में पंजाब की जीत भी कांग्रेस को यूपी की हार के दर्द से निजात नहीं दिला सकी, तो वहीं मणिपुर और गोवा में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद वो सरकार नहीं बना पा रही. इसलिए फ़िलहाल पार्टी यूपी में गलतियों पर ही चर्चा करती नज़र आ रही है.

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